भारत की सबसे बड़ी और विश्व की कुछ बड़ी इस्लामी शिक्षण संस्थाओं में शामिल दारुल उलूम देवबंद की खबरें हिन्दी और अंग्रेज़ी मीडिया में आम तौर पर नहीं के बराबर छपती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस संस्था में हिन्दी और अंग्रेज़ी के अखबार जाते ही नहीं। यहाँ की खबरें तभी प्रकाशित होती हैं जब चुनाव के समय मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए कोई नेता इस संस्था का दौरा करता है या फिर जब यहाँ से कोई फतवा जारी होता है। इन दिनों दारूल उलूम एक बार फिर फिर सुर्खियों में है। यह सही है की उर्दू के अखबारों की तरह दारुल उलूम की खबरें अंग्रेज़ी या हिन्दी के अखबारों में ज्यादा नहीं छप रहीं हैं, मगर इस बार छप ज़रूर रहीं हैं। इसकी एक बड़ी वजह है इस संस्था के नए वीसी मौलाना ग़ुलाम वास्तनवी के मुंह से गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ। मगर हिन्दी और अंग्रेज़ी के अखबारों में एक जैसी ही खबर आ रही है। चूंकि नए वीसी ने गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी की तारीफ की इसलिए उनको हटाने की मांग हो रही है। मगर सही खबर कुछ और ही है।
दारुल उलूम में इन दिनों बवाल मचा हुआ है, पढ़ाई-लिखाई ठप है और वहाँ का माहौल तो गरम है ही, हर वो व्यक्ति चिंता में है जिसे मुसलमानों के इस सबसे बड़े मदरसे में दिलचस्पी है। मौलाना वास्तनवी के पीछे आखिर लोग क्यों पड़े हुये हैं, आखिर वो कौन लोग हैं जो उनके पीछे लगे हैं, वास्तवनी ने पहले परेशान हो कर इस्तीफा देने का निर्णय कर लिया था, अब वो क्यों कह रहे हैं कि मेरा निर्णय अंतिम नहीं है और मुझे रखने या नहीं रखने का फैसला गवर्निंग काउंसिल को करना है। यह सब आखिर हो क्यों हो रहा हैं और वो कौन-कौन से मौलाना हैं जो इस गंदे खेल में शामिल हैं, आइये आपको बताते हैं।
पिछले दिनों जनाब मर्गूबुर्रहमान रहमान की मौत के बाद गुजरात के मौलाना ग़ुलाम मोहम्मद वास्तनवी को यहाँ का मोहतमीम यानी कुलपति बनाया गया। उनके कुलपति बनते ही देवबंद में जो बवाल शुरू हुआ है वो धीरे-धीरे उग्र रूप लेता जा रहा है और वास्तनवी के इस्तीफे की पेशकश के बाद भी कम नहीं हुआ है। वास्तनवी का विरोध कई कारणों से हो रहा है। पहला उन पर यह इल्ज़ाम है कि वो चूंकि बड़े अमीर मौलाना हैं इसलिए उन्होंने अपने पक्ष में वोट खरीद लिया और इस बड़े ओहदे पर क़ाबिज़ हो गए। उनके विरोध की दूसरी बड़ी वजह है उनका अखबारों में प्रकाशित वो बयान जिसमें उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की। उनके विरोध की तीसरी और सबसे बड़ी वजह यह है कि उनकी एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसमें गुजरात में एक प्रोग्राम के दौरान वो किसी को एक मूर्ति भेंट कर रहें हैं। सामान्य तौर पर आम मुसलमानों को मौलाना वास्तनवी के विरोध के यही तीन कारण समझ में आ रहे हैं।
अब बात करते हैं पहले कारण की। वास्तनवी पर आरोप है कि उन्होंने पैसे के बल पर यह पद हासिल किया है। जो लोग ऐसा आरोप लगा रहें हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि यह संभव नहीं है। मजलिस-ए-शूरा यानी गवर्निंग काउंसिल में देश के बड़े-बड़े मौलाना शामिल हैं। उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो पैसा लेकर वोट करेंगे। और अगर ऐसा है भी तो फिर ऐसे लोगों को गवर्निंग काउंसिल में क्यों रखा गया है। विरोध की
दूसरी वजह हजारों मुसलमानों के हत्यारे नरेंद्र मोदी की तारीफ है। जहां तक नरेंद्र मोदी का सवाल है सिर्फ मुसलमान ही नहीं दूसरे धर्म के लोग भी यह समझते हैं कि गुजरात दंगे में मोदी का भी रोल रहा है। कोई भी सच्चा मुसलमान जिसे अपनी क़ौम से और मानवता से मोहब्बत होगी वो मोदी को भला कैसे माफ कर देगा। हर किसी को पता है कि गुजरात दंगे में पूरी कमान मोदी के हाथ में थी, यह सब उन्हें पता था कि राज्य में मुसलमानों को कत्ल किया जा रहा है। महिलाओं की इज्ज़त लूटी जा रही है और बच्चों को अनाथ किया जा रहा है। इसलिए यह सब जानते हुये कोई भी अच्छा आदमी मोदी की तारीफ नहीं कर सकता। जहां तक राज्य में मोदी के कामों का सवाल है तो इस से किसी को इनकार नहीं हो सकता कि विकास के जो काम मोदी ने किए हैं वो कोई दूसरा मुख्यमंत्री नहीं कर सका।
रहा सवाल किसी को मूर्ति भेंट करने का तो चूंकि मौलाना वास्तनवी गुजरात के हैं और वहाँ वो कई प्रकार के बिजनेस में शामिल हैं, इसलिए किसी प्रोग्राम में उन्होंने किसी को मूर्ति भेंट की होगी। यह इस्लाम के हिसाब से गलत है इसलिए उन्हें इस सिलसिले में माफी मांग लेनी चाहिए। देवबंद के पुराने छात्र और देवबंद को अच्छी तरह से समझने वाले बताते हैं कि वसतानवी के विरोध की असली वजह यह तीन बिन्दु नहीं हैं। सच्चाई यह है कि चूंकि दारुल उलूम भारत का सब से बड़ा इस्लामी इदारा है। यहाँ से जारी बयान का असर न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के दूसरे मुल्कों के मुसलमानों पर भी होता है, इसलिए कुछ खास लोग ऐसे हैं जो हमेशा इस बड़ी संस्था पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहते हैं। अब चूंकि वास्तनवी का इस पर कब्जा हो गया है इसलिए उनके खिलाफ तरह-तरह के बयान जारी किए जा रहे हैं। संस्था में पढ़ाई-लिखाई के माहौल को ठप करके वास्तनवी को देवबंद से भागने के लिए मजबूर किया गया। फिलहाल वास्तनवी ने इस्तीफे की पेशकश तो कर दी है मगर उन्हें पूरे भारत से और खासतौर पर गुजरात से जो समर्थन मिल रहा है उसके बाद उन्होंने अपना फैसला बदल लिया है।
देवबंद के साथ-साथ पूरे देश के मुसलमान जिन्हें इस संस्था से लगाव है आज दो गिरोहों में बंट गए हैं। एक वो हैं जो वास्तनवी के साथ हैं और दूसरे वो हैं जो उनका विरोध कर रहे हैं। अलबत्ता कुछ विरोध करने वाले ऐसे हैं जो यह नहीं कह रहे कि उनको पद छोड़ देना चाहिए, मगर उनका यह कहना सही है कि मोदी की तारीफ और मूर्ति भेंट करने वाली बात उचित नहीं है, इसके लिए उन्हें मुसलमानों से माफी मांगनी चाहिए। बाक़ी जो दूसरे विरोध करने वाले हैं उनके साथ एक बड़ी समस्या यह है कि वो वास्तनवी का विरोध तो कर रहे हैं, मगर खुल कर सामने नहीं आ रहे हैं। विरोध करने वाले तो इस हद तक गिर गए हैं कि उन्होंने उर्दू के एक अखबार को वास्तनवी का विरोध करने के लिए पूरा ठेका ही दे दिया है। पिछले कई दिनों से इस अखबार में पहले पृष्ठ पर सिर्फ वास्तनवी के खिलाफ ही खबरें प्रकाशित हो रही हैं। इस अखबार में देश की दूसरी सभी बड़ी खबरें इन दिनों गायब रहती हैं, इसमें सिर्फ यही छप रहा है कि वास्तनवी ने यह गलत किया और वो गलत किया। कभी उन्हें आरएसएस का एजेंट कहा जा रहा है तो कभी उनके खिलाफ फतवा जारी करके यह कहा जा रहा है कि मूर्ति भेंट करने के बाद अब वो मुसलमान ही नहीं रहे। खबर यह है कि उर्दू के दो अखबारों ने एक बड़े मौलाना के दफ्तर में एक सौदेबाज़ी की कि अगर वास्तनवी इस दोनों अखबार को एक-एक लाख रूपया दे दें तो हम उन के खिलाफ खबर नहीं छापेंगे। मगर वास्तनवी ने ऐसा नहीं किया और यही वजह है कि उनके विरोध में खबर और लेख के छपने का सिलसिला जारी है।
यानी अगर इन दो अखबारों को लाख-लाख रूपये मिल जाते तो मोदी की तारीफ भी गलत नहीं होती और एक मौलाना के जरिये किसी को मूर्ति भेंट करना भी इस्लाम के विरुद्ध नहीं होता। ज़रा ग़ौर कीजिये इस बात पर। कितना घिनौना खेल खेला जा रहा है इस संस्था के नाम पर। कमाल की बात तो यह है कि वास्तनवी के फिलहाल गुजरात चले जाने के बाद भी घिनौना खेल जारी है। उर्दू अखबार सहाफ़त ने वास्तनवी के खिलाफ लिखने में सारी हदें पार कर दी हैं। यही कारण है कि देवबंद में इस अखबार की कापियाँ भी जलायी गईं। मुसलमानों से अपील भी की जा रही है कि इस अखबार को पढ़ना बंद करें क्योंकि यह मुसलामों की एक बड़ी संस्था को बर्बाद करने पर तुला हुआ है।
इस सारे मामले में सबसे बड़े अफसोस की बात तो यह है कि वास्तनवी के खिलाफ यह सारा खेल पर्दे के पीछे से एक ऐसे मौलाना खेल रहे हैं, जिन्हें भारतीय मुसलमान बड़ी इज्ज़त की निगाह से देखता है। सच्चाई यह है कि दुनिया के दूसरे धर्मों के मानने वालों की तरह मुसलमानों में भी कुर्सी की लड़ाई है। एक ओर जहां राजनेता मुसलमानों को मात्र एक वोट बैंक समझते हैं वहीं मौलाना हाजरात भी मुसलमानों के जज़्बात से खेलते हैं। जिस तरह बाल ठाकरे, नरेंद्र मोदी, विनय कटियार जैसे लोग अपने लाभ के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, उसी तरह मुसलमानों में भी ऐसे बहुत से लोग है जो बड़ी गंदी सियासत में लिप्त हैं।
अफसोस की बात तो यह है कि ऐसी हरकत वो लोग कर रहे हैं जो बड़े-बड़े मौलाना कहलाते हैं। हजारों मुसलमान ऐसे हैं जो इन्हें इज्ज़त की नज़र से देखते हैं और आँख बंद करके इन पर भरोसा करते हैं। इन मौलाना लोगों में से काफी ने गैर सरकारी संगठनों के नाम पर कई-कई संस्थाएं बनाकर अपनी-अपनी दुकानें खोल ली हैं और आम मुसलमानों को उल्लू बनाकर अपनी अपनी दुकान चला रहे हैं। इन दिनों दारुल उलूम देवबंद में जो खेल जारी है उसकी असलियत का पता हर बड़े मौलाना को है। सबको पता है कि वास्तनवी का सही मायने में विरोध कौन लोग कर रहे हैं और उनके विरोध की वजह क्या है। सब को यह भी पता है कि वास्तनवी के खिलाफ मोर्चा किसने और किस मक़सद से खोला हुआ है। मगर कोई कुछ नहीं बोल रहा हैं। कारण यह है कि हर किसी को अपनी-अपनी दुकान चालानी है। संस्था में हँगामा हुआ, विद्यार्थी ज़ख्मी हुये, पढ़ाई डिस्टर्ब हो रही है मगर इसकी चिंता किसी को नहीं हैं।
दारुल उलूम में ठीक ऐसी ही स्थिति 30-32 साल पहले भी पैदा हुई हुई थी। तब मौलाना कारी तैयब साहब दारुल उलूम के मोहतमीम थे। इन्हीं लोगों ने, जो आज पर्दे के पीछे से वास्तनवी के खिलाफ मोर्चा खोले हुये हैं, उस समय भी खूब हंगामा किया था। तैयब साहब ने तब हार मान कर सब कुछ उन लोगों के हवाले कर दिया था, जो इसे अपनाना चाहते थे। उस समय भी हंगामे में कई विद्यार्थी ज़ख्मी भी हुये थे और एक मौलाना साहब, जो आज भी बड़े मौलाना हैं, ने उस समय दोनों हाथों से विद्यार्थियों पर गोली चलाई थी। हद तो तब हो गयी जब इसी मौलाना ने एक विद्यार्थी के मुंह में उस समय पेशाब करवा दिया जब उसने प्यास से पानी की मांग की। कुल मिलाकर विद्यार्थियों का इस्तेमाल करके आज एक बार फिर दारुल उलूम पर क़ब्ज़े की तैयारी हो रही है। इस संस्था पर हमेशा एक खास ग्रुप का कब्जा रहा है और अब जबकि गुजरात का एक मौलाना इस संस्था पर क़ाबिज़ हो गया है, तो यह बात इस ग्रुप को पच नहीं रही है और इस मौलाना यानी वास्तनवी को हटाने के लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
एक सीधी सी बात यह है कि यदि गवर्निंग काउंसिल को लगता है कि मौलाना वास्तनवी इस ओहदे के लायक नहीं हैं, तो हंगामा करने के बजाए उन्हें सीधे से हटा दिया जाये। सब से खास प्रश्न तो यह है कि दारुल उलूम देवबंद किसका है? अगर यह किसी एक खानदान का है तो यह पूरी तरह से उसी को सौंप दिया जाये। और अगर यह संस्था पूरे मुसलमानों की है और यहाँ कोई समस्या पैदा हुई है तो इसके लिए हर बड़े मौलाना को सामने आना चाहिए। अगर सब लोगों को यह लगता है कि वास्तनवी जैसी सोच का आदमी इस संस्था के लिए उचित नहीं होगा तो उसे हटा दिया जाये, मगर यह फैसला तो गवर्निंग काउंसिल को करना है, परन्तु बड़े-बड़े मौलाना पर्दे के पीछे से जो खेल खेल रहे हैं क्या वो शर्मनाक नहीं है। वैसे तो वास्तनवी की किस्मत का फैसला 23 फरवरी को गवर्निंग काउंसिल की मीटिंग के बाद होगा, इस दौरान देवबंद पर क़ब्ज़े की इस राजनीति में कौ- कौन से गेम होते हैं देखते रहिए।
लेखक ए एन शिबली हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के ब्यूरो चीफ हैं.

