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वास्‍तनवी गलत हैं तो असद मदनी भी कहां सही थे!

सलीमदारूल उलूम देवबंद के नए कुलपति गुलाम मुहम्मद वास्तनवी का विरोध उनके पद ग्रहण करते ही शुरू हो गया था। विरोधियों को उनके तेज विरोध का मौका खुद वास्तवनी ने ही मुहैया कराया। मोदी की तारीफ करना वास्तनवी की भूल थी। अब वह भले ही यह कह रहे हों कि उन्होंने मोदी के विकास की तारीफ की थी, जिसका फायदा हिन्दू को ही नहीं मुसलमानों को भी मिल रहा है, लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो गया है। दरअसल, गुजरात के मुख्यमंत्री की किसी भी रूप में तारीफ करना शाहनवाज हुसैन या मुख्तार अब्बास नकवी सरीखे मुसलमानों के अलावा किसी भी मुसलमान को मंजूर नहीं है। भले ही मोदी की तारीफ उनके द्वारा कराए गए विकास की ही क्यों न हो। जब अमिताभ बच्चन ने गुजरात का ब्रांड एम्बेसेडर बनना कबूल किया था, तब उनकी भी जबरदस्त आलोचना हुई थी। क्योंकि अमिताभ की भावुकता रील तक सीमित है, रियल में वे एक विशुद्ध कारोबारी आदमी हैं, इसलिए उन्हें माफ किया जा सकता है।

सलीमदारूल उलूम देवबंद के नए कुलपति गुलाम मुहम्मद वास्तनवी का विरोध उनके पद ग्रहण करते ही शुरू हो गया था। विरोधियों को उनके तेज विरोध का मौका खुद वास्तवनी ने ही मुहैया कराया। मोदी की तारीफ करना वास्तनवी की भूल थी। अब वह भले ही यह कह रहे हों कि उन्होंने मोदी के विकास की तारीफ की थी, जिसका फायदा हिन्दू को ही नहीं मुसलमानों को भी मिल रहा है, लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो गया है। दरअसल, गुजरात के मुख्यमंत्री की किसी भी रूप में तारीफ करना शाहनवाज हुसैन या मुख्तार अब्बास नकवी सरीखे मुसलमानों के अलावा किसी भी मुसलमान को मंजूर नहीं है। भले ही मोदी की तारीफ उनके द्वारा कराए गए विकास की ही क्यों न हो। जब अमिताभ बच्चन ने गुजरात का ब्रांड एम्बेसेडर बनना कबूल किया था, तब उनकी भी जबरदस्त आलोचना हुई थी। क्योंकि अमिताभ की भावुकता रील तक सीमित है, रियल में वे एक विशुद्ध कारोबारी आदमी हैं, इसलिए उन्हें माफ किया जा सकता है।

मोदी को मुसलमान ही नहीं इस देश का सैक्यूलर हिन्दू भी उन्हें गुजरात दंगों के लिए माफ करने को तैयार नहीं है। गुजरात दंगों का भूत मोदी का जल्दी से पीछा छोड़ने वाला है भी नहीं। पीछा छूट भी कैसे सकता है। दुनिया में कुछ शख्सियतें ऐसी हुई हैं, जिन्हें हमेशा ही बुराई का प्रतीक माना जाता रहा है। रावण भले ही कितना भी प्रकांड पंडित रहा हो, लेकिन उसकी एक गलती ने उसे सदियों से खलनायक बना रखा है। हिटलर यहूदियों के लिए घृणा का पात्र बना हुआ है। अमेरिकी कभी लादेन को माफ नहीं कर सकते। इराक को तबाह और बरबाद करने वाले जॉर्ज डब्ल्यू बुश को इराकी माफ नहीं कर सकते। सिख कभी भी यह नहीं भूल सकते कि ऑप्रेशन ब्लू स्टार के लिए इंदिरा गांधी जिम्मेदार थीं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों को राजीव गांधी ने यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की थी कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। राजीव गांधी का वह बयान आज भी सिख दुख के साथ याद करते हैं। मुसलमान बाबरी मस्जिद को गिराने वाली भाजपा और उसके नेता एलके आडवाणी की राम रथयात्रा को भी नहीं भूल सकते। पाकिस्तान के जनक माने वाले मौहम्मद अली जिनाह को कोई भारतीय सही नहीं कहता। आडवाणी जिनाह को सेक्यूलर कह कर अपनी फजीहत करा चुके हैं। हालांकि जिनाह वास्तव में हद दर्जे के सेक्यूलर थे।

जो फजीहत आडवाणी की हुई थी, वही वास्तनवी ने मोल ले ली है। मोदी की तारीफ वाला बयान आते ही उनके विरोधियों को मौका मिल गया। विरोधियों को पता था कि मोदी मुद्दे पर वास्तनवी का विरोध सभी मुसलमान करेंगे। शायद यही वजह थी कि वास्तनवी ने दबाव में आकर इस्तीफे का ऐलान कर दिया था। लेकिन जब वास्तनवी का हिमायती ग्रुप सक्रिय हुआ और वास्तनवी के समर्थन में सड़कों पर आया तो वास्तनवी को ऑक्सीजन मिली और उन्होंने किसी हालत में पद छोड़ने से इनकार कर दिया। यह बताने की जरूरत नहीं है कि वास्तनवी का विरोध कौन लोग कर रहे हैं। मदनी परिवार दारुल उलूम एक तरह से मदनी परिवार की जागीर की तरह रहा है। दारुल उलूम के जरिए ही उनके राजनीतिक हित पूरे होते रहे हैं।

मदनी परिवार ने किस तरह से दारुल उलूम को अपने सियासी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया, इसका एक उदाहरण यह है कि अस्सी की दशक के शुरू में जब असम में बंगलादेशियों के खिलाफ असम गण परिषद आंदोलन चला रही थी तो उस समय इंदिरा गांधी की सत्ता में दोबारा वापसी हुई थी। उस समय असम के नैल्ली में मुसलमानों का नरसंहार हुआ था। वह नरसंहार गुजरात से भी कहीं भयानक था। नरसंहार पर जब कुछ इस्लामी देशों ने चिंता प्रकट की थी तो इंदिरा गांधी ने असद मदनी को विशेष दूत बनाकर इस्लामी देशों में भेजा था। असद मदनी ने इस्लामी देशों में जाकर बताया था कि नैल्ली में ऐसा कुछ नहीं हुआ है जैसा बताया जा रहा है। उस समय संचार माध्यम इतने सशक्त नहीं थे, जितने आज हैं। इसलिए वह नरसंहार गुजरात की तरह प्रचारित नहीं हुआ था। नरसंहार भी असम के गांवों में हुआ था। वहां से अगप की वजह से खबरें निकालना मीडिया के लिए टेढ़ी खीर था। असद मदनी जब इस्लामी देशों की यात्रा से वापस लौटकर आए तो उनके लिए राज्यसभा की सीट तैयार थी। वास्तनवी का विरोध कर रहे लोग खुद बताएं कि वास्तनवी गलत हैं तो असद मदनी भी कहां सही थे।

वास्तनवी का वे ताकतें भी विरोध कर रही हैं, जो दारुल उलूम को आधुनिक शिक्षा का केन्द्र नहीं बनना देखना चाहतीं। वास्तनवी पहले मोहतमिम हैं, जो बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। जाहिर है, उनकी सोच भी आधुनिक होगी। वे चाहते हैं कि दारुल उलूम सिर्फ फतवे जारी करने वाले केन्द्र के अलावा देश को इंजीनियर, डॉक्टर, साईंटिस्ट और आईएएस देने वाला केन्द्र भी बने। लेकिन ये चीजें उन्हें रास नहीं आती, जो मुसलमानों को कूपमंडक बनाए रखना चाहती हैं। क्योंकि उनकी सियासत की दुकान तभी चल सकती है, जब मुसलमान बाबरी मस्जिद, गुजरात और उर्दू जैसे मसलों से आगे नहीं सोच सके। सच ये है कि मुसलमानों के पास तालीम आएगी तो बाबरी मस्जिद और गुजरात जैसे हादसे नहीं होंगे और होंगे तो उनसे निपटने के लिए उनके पास तालीम की ताकत भी होगी।

यह अच्छा ही हुआ कि वास्तनवी ने पद छोड़ने से मना कर दिया है। मोदी पर दिए गए बयान की उन्होंने कई बार सफाई दे दी है। होना तो यह चाहिए था उनकी सफाई के बाद मामला खत्म कर दिया जाता, लेकिन जब दारुल उलूम और मुसलमानों के हितों से ज्यादा अपने निजी स्वार्थ हों तो मामला ऐसे ही खत्म होने वाला नहीं है। अब जब वास्तनवी भी हिम्मत के साथ मैदान में मुकाबले के लिए तैयार हो गए हैं तो मामला दिलचस्प हो गया है। उनके इस्तीफे का फैसला अब 23 फरवरी को मजलिस-ए-शूरा में होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि शूरा का फैसला दारुल उलूम की बेहतरी के पक्ष में होगा।

सामयिक मुद्दों पर कलम के जरिए सक्रिय हस्तक्षेप करने वाले  सलीम अख्‍तर सिद्दीकी मेरठ के निवासी हैं। वे ब्लागर भी हैं और ‘हक बात’ नाम के अपने हिंदी ब्लाग में लगातार लिखते रहते हैं.

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