जंगल, जमीन, पेड़ एवं पर्यावरण को बचाने से ही भविष्य को बचाया जा सकता है। विश्व की कई समृद्ध सभ्यता एवं समाज महज इसीलिए नष्ट हो गए क्योंकि उन्होंने पर्यावरण की उपेक्षा की। वर्तमान विकास का ढांचा प्रदूषण को बढ़ा रहा है और यह वर्तमान मानव समाज के विनाश का कारण बन सकता है। जिम्मेदार नागरिकता से ही इस आसन्न संकट को दूर किया जा सकता है। यह विचार पूर्व विदेश सचिव जगत एस मेहता ने गुरूवार को डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से आयोजित नागरिक संवाद में व्यक्त किए। विख्यात लेखक जे. डायमण्ड की पुस्तक ‘कोम्पलेक्स’ का विशद विश्लेषण करते हुए मेहता ने कहा कि ‘टूस्टर आइलैण्ड’ जैसी समृद्ध व विकसित सम्भयता का आज नामोनिशान नहीं बचा है। अमेरिका के मोन्टाना सहित हैनी इत्यादि स्थान हैं, वहां कुछ हिस्से समृद्ध है- कुछ एकदम खराब।
माया जैसी सम्भताएं खराब हालात में है। भारत के पड़ोस में नेपाल की हालात बदतर होती जा रही है, जबकि भूटान एक खुशहाल व समृद्ध देश है।
मेहता ने कहा कि इन सबके पीछे मूल कारण जंगलों का विनाश तथा भारी प्रदूषण हैं पानी-मिट्टी सभी प्रदूषित होते जा रहे है। महात्मा गांधी के सिद्धान्तों पर चलकर तथा एक सचेत आशावाद से हम सम्भ्यताओं का विनाश रोक सकते हैं।
संवाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एमएस अगवानी ने कहा कि व्यक्ति की बढ़ती लालच व स्वार्थ प्रवृति समस्त संकटों का मूल है। स्वतंत्रता सेनानी एमपी वया तथा विद्याभवन के अध्यक्ष रियाज तहसीन ने कहा कि स्वेच्छिकता जैसे मूल्यों को व्यापक करने की आवश्यकता है। वरिष्ठ नागरिक मोहनसिंह कोठारी तथा किशोर सैन ने आध्यामित्क एवं मानव मूल्यों की ताकत को रेखाकिंत किया। संवाद में सुशील दशोरा, एबी पाठक ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन नन्दकिशोर शर्मा ने किया। संवाद की अध्यक्षता विजय सिंह मेहता ने की।

