विकास की वर्तमान धारा ने जनता को लाभार्थी बना दिया है। यह आम जनता का हक नहीं बल्कि सरकार द्वारा दिया जाने वाला लाभ बन गया है। वहीं बाजार की व्यवस्था में व्यक्ति उपभोक्ता बनता जा रहा है। प्रजातांत्रिक भारत में नागरिकता ओझल हो रही है। ऐसी चुनौतीपूर्ण अवस्था में नागरिक संस्थाओं एवं स्वयंसेवी क्षेत्र की मूल्य आधारित मजबूती आवश्यक है। उक्त विचार नयी दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष समाजविद् डॉ. राजेश टंडन ने सेवामंदिर, कासा एवं डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा उदयपुर में आयोजित ‘‘नये परिवेश में स्वैच्छिक प्रयासों की सार्थकता’’ विषयक संगोष्ठी में व्यक्त किया. श्री टंडन ने कहा कि सरकार से व्यवस्था एवं नागरिक अधिकारों की मांगों के मध्य समाज परिवर्तन के मूल लक्ष्यों को नहीं भूलें। उन्होंने आगे कहा कि आने वाली पीढ़ियों के दौर में लोकतंत्र कैसा होगा? जनतंत्र मात्र सरकारी स्तर पर ही नहीं वरन देश की गलियों और समाज में परिलक्षित होना चाहिये। नागरिक अधिकारों के साथ स्वयंसेवी क्षेत्र के नागरिक दायित्व के पाठ से भी समाज को रूबरू करवाना चाहिये।
सेवामंदिर के अध्यक्ष अजय मेहता ने स्वागत भाषण देते हुए स्वयंसेवी क्षेत्र की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। पूर्व विदेश सचिव जगत मेहता ने कहा कि हमें अपनी विफलताओं से सिखने की जरूरत है। अगर हम अपनी विफताओं से सबक नहीं लेंगे तो सफलता मिलनी मुश्किल होगी। समाज के विकास के लिए केवल सरकार पर निर्भर नहीं रहा जा सकता, बल्कि इसके लिए हर नागरिक को आगे आना होगा. समारोह के अध्यक्ष जयन्त कुमार ने कहा कि संघर्ष और निर्माण आज की आवश्यकता है। प्रजातंत्र में जन संगठनों की स्थिति कमजोर हो रही है, उसे बदलने की जरूरत है। इससे पूर्व डॉ. टंडन की नागरिक अभिनन्दन किया गया। संयोजन ट्रस्ट सचिव नन्दकिशोर शर्मा ने किया।
नितेश सिंह की रिपोर्ट.

