विकीलीक्स की पत्रकारिता जनसरोकार की न होकर खोजी पत्रकारिता का आधुनिक चेहरा है बिलकुल वैसा ही जैसा कि कुछ साल पहले तहलका का था। विकीलीक्स और तहलका के होने का अर्थ अलग-अलग है। तहलका खोजी पत्रकारिता का भारतीय संस्करण है और उसका रिश्ता खोजी होने के साथ-साथ जन के सरोकार का भी था। उसके निशाने पर तंत्र और राजनेता, अफसर थे तो इसका अर्थ समाज को दिशा से देने से था, किन्तु विकीलीक्स का होने का अर्थ कुछ और ही है। पहला तो यह कि विकीलीक्स हमारी भारतीय पत्रकारिता से बिलकुल अलग है। अचानक उदय हुए इस इंटरनेटिया पत्रकारिता ने कई देशों की नींद उड़ा देने के बाद भारतीय तंत्र को भी भेदने की कोशिश की है। कहना न होगा कि वह कई मायनों में कामयाब भी रहा है। विकीलीक्स की पत्रकारिता पर संदेह नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए।
नये माध्यम की पत्रकारिता को मैं पत्रकारीय सरोकार से परे कुछ और खतरे तरफ देखने की कोशिश कर रहा हूं। विकीलीक्स तब चर्चा में आया जब उसने अमेरिका के तंत्र को भेदने की कोशिश की और कुछ रहस्य का खुलासा किया। जो खुलासा हुआ था उसमें भारत के साथ अमेरिका की दोमुंही नीति की बातें भी थीं। स्वाभाविक है कि इस खुलासे ने हर भारतीय मन को खुश किया। खुश होने लायक खुलासा था। यही विकीलीक्स भारत के तंत्र को भी भेदना शुरू किया। विकीलीक्स के खुलासे को लेकर भारतीय राजनीति दो भागों में बंट गयी है। जिनके खिलाफ मामला है, वे परेशान हैं और जिनके खिलाफ नहीं है, वे विकीलीक्स के पैरोकार बने हुए हैं। भारत जिस तेजी के साथ विश्व पटल पर छा गया है, उससे उसके विरोधियों की संख्या बढ़ रही है। भारत के पुराने दुश्मनों से तो पूरी दुनिया वाकिफ है। ऐसे में यह सवाल उपजना स्वाभाविक है कि कहीं कोई विकीलीक्स को औजार बनाकर हमारे तंत्र को नुकसान पहुंचाने की कोशिश तो नहीं कर रहा है। इस संदेह की पड़ताल करना चाहिए।
ऐसे में यह अंदेशा सहज और स्वाभाविक है कि क्या विकीलीक्स का उद्देश्य महज पत्रकारिता है अथवा उनके साथ किसी और का हाथ है जो हमारी अस्मिता पर आंच लगते देखना चाहते हैं। यह बेहद दुखदायी है कि भारतीय मीडिया विकीलीक्स को हाथोंहाथ ले रही है। उसके खुलासे को खबर बनाकर छाप रही है। हमें यह याद रखना चाहिए कि खोजी पत्रकारिता में भारतीय पत्रकारिता ने हमेशा से अपना झंडा फहराया है किन्तु उसने कभी दूसरे देशों के तंत्र को न भेदने की कोशिश की है और न हस्तक्षेप की। याद रहे कि बोफोर्स घोटाला तकरीबन पच्चीस बरस बाद भी गूंज रहा है तो इसका श्रेय पत्रकार अरूण शौरी को जाता है। यह तो खोजी पत्रकारिता का एक नमूना है। यह एक ऐसा मामला था जिसका रिश्ता दूसरे देशों से भी था किन्तु भारत ने बोफोर्स को छोड़कर दूसरे मामलों में दखल नहीं दिया।
विकीलीक्स की पत्रकारिता को सपोर्ट करते हमारे लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि सबने मान लिया कि वो जो कुछ बता रहा है, लिख रहा है, सत्य है और इसके अलावा बाकी सत्य से परे है। आखिर हम विदेशियों से इतना मोहित क्यों रहते हैं। अब तक शिक्षा और फैशन की बात थी तो किसी तरह पचा लिया गया किन्तु अब जब पत्रकारिता की बात है तो कम से कम मुझे यह हजम नहीं होगा कि कोई विदेशी हमारी धरती पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराये। विकीलीक्स के संस्थापक असांजे का एक बयान आया है कि उनका मकसद किसी सरकार को अस्थिर करना नहीं है बल्कि वह लोगों को न्याय दिलाना चाहते हैं। मेरा मानना है कि भारतीय मीडिया के पास इतनी ताकत है कि वह अपने देश और देशवासियों की हितों की रक्षा के लिये अपनी कलम पैनी कर सके।
विकीलीक्स को यह समझ लेना चाहिए कि यह वही भारत है, जिसकी पत्रकारिता ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये मजबूर कर दिया था। आजाद हिन्दुस्तान में जो लोग करप्ट हैं, उन्हें ठीक करना भी भारतीय पत्रकारिता को आता है। स्टिंग ऑपरेशन को लेकर विमत होना एक दूसरा मुद्दा हो सकता है, किन्तु पत्रकारिता के इस नये औजार ने गड़बड़ियों की नींद हराम कर दी थी। विकीलीक्स की पत्रकारिता और भारतीय पत्रकारिता में बहुत अंतर है। हम अपनी खूबी और कमजोरी को खूब पहचानते हैं किन्तु विकीलीक्स हमारे बारे में यह जान ले, कतई जरूरी नहीं। विकीलीक्स ने भारतीय जमीन पर अपनी पत्रकारिता के बीज डाल दिये हैं, यहां तक तो ठीक है किन्तु अब हमें सर्तक रहना होगा क्योंकि भारतीय पत्रकारिता हमेशा से अजेय रही है और बनी रहेगी।
लेखक मनोज कुमार स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं. वर्ष 1981 से पत्रकारिता में हैं. फिलवक्त मीडिया की मासिक पत्रिका ‘समागम’ के प्रकाशक एवं संपादक हैं.

