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विचारधारा पर भारी पड़ी वसुंधरा राजे

राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद की कुर्सी एक वर्ष रिक्त रहने के बाद वापस झटक कर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने केंद्रीय भाजपा नेतृत्व व आरएसएस को अपनी सीमाएं बता दी है। राजे ने सभी को बता दिया है कि राजस्थान में भैरोसिंह शेखावत के बाद भाजपा का अगर कोई भाग्य विधाता है तो केवल वे ही हैं। लगातार एक वर्ष से भी अधिक समय तक नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी खाली रखकर केंद्रीय नेतृत्व व संघ ने अपनी पसंद के नेता को बिठाने की सारी कोशिशें कीं, लेकिन महारानी के आगे एक की भी नहीं चली। सरकार में सत्ता परिवर्तन को दो वर्ष से अधिक समय हो गया, लेकिन भाजपा विपक्ष को घेरने की बजाए वसुंधरा राजे से निपटने में लगी रही। शुरुआत का एक वर्ष तो राजे को हटाने में बीता और बाद में एक वर्ष तक नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी की रखवाली में ही बीत गया, लेकिन महारानी ने केवल 2 माह में ही संघ और भाजपा के दो वर्ष के किए कराए पर पानी फेर दिया और एक झटके में कुर्सी झटक कर शनिवार को बैठ गई। भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा राजे को दिल्ली भेजकर कुर्सी से दूर रखने के खूब जतन किए लेकिन एक भी काम नहीं आया।

राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद की कुर्सी एक वर्ष रिक्त रहने के बाद वापस झटक कर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने केंद्रीय भाजपा नेतृत्व व आरएसएस को अपनी सीमाएं बता दी है। राजे ने सभी को बता दिया है कि राजस्थान में भैरोसिंह शेखावत के बाद भाजपा का अगर कोई भाग्य विधाता है तो केवल वे ही हैं। लगातार एक वर्ष से भी अधिक समय तक नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी खाली रखकर केंद्रीय नेतृत्व व संघ ने अपनी पसंद के नेता को बिठाने की सारी कोशिशें कीं, लेकिन महारानी के आगे एक की भी नहीं चली। सरकार में सत्ता परिवर्तन को दो वर्ष से अधिक समय हो गया, लेकिन भाजपा विपक्ष को घेरने की बजाए वसुंधरा राजे से निपटने में लगी रही। शुरुआत का एक वर्ष तो राजे को हटाने में बीता और बाद में एक वर्ष तक नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी की रखवाली में ही बीत गया, लेकिन महारानी ने केवल 2 माह में ही संघ और भाजपा के दो वर्ष के किए कराए पर पानी फेर दिया और एक झटके में कुर्सी झटक कर शनिवार को बैठ गई। भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा राजे को दिल्ली भेजकर कुर्सी से दूर रखने के खूब जतन किए लेकिन एक भी काम नहीं आया।

वसुंधरा राजे का विकल्प ढूंढ़ने के लिए प्रभारी के तौर पर कप्तानसिंह सोलंकी को दिल्ली से भेजा गया, लेकिन सोलंकी को तो अपने राजनीतिक भविष्य का विकल्प ही वसुंधरा राजे को नेता प्रतिपक्ष बनाने में नजर आया। राजे ने महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे से अच्छे संबंध के माध्यम से कप्तान सिंह सोलंकी की दुखती रग पर हाथ रखा और वही फार्मूला राजे का सफल भी हुआ। मुंडे भी एक बार फिर राजस्थान में अपनी पसंद के नेता के तौर पर राजे को देखना चाहते थे। कप्तान सिंह सोलंकी ने लगातार आरएसएस के नेताओं व भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को वसुंधरा के नाम पर सहमत करने का प्रयास किया। हमने एक दिन पूर्व ही बताया था कि किस तरह मुंबई में वसुंधरा राजे ने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ बैठक की और महारानी के लिए मुंबई इस बार भी लकी रहा। महारानी का आखिर जन्म स्थान मुंबई ही है। महारानी के लिए नितिन गडकरी को पक्ष में करने के लिए उनकी टीम के किरीट सोमैया व पीयूष गोयल ने भी अच्छी भूमिका निभाई।

शनिवार को जयपुर में दिल्ली से आए भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष वैंकेया नायडू ने वसुंधरा के नाम की घोषणा की तो अपने आपको संघ विचारधारा का विधायक मानने वाले व संगठन के वरिष्ठ नेताओं के चेहरे से हवा उड़ गई। जिस नंदलाल मीणा को संघ वसुंधरा का विकल्प बनाना चाहता था उन्होंने ही वसुंधरा के नाम का प्रस्ताव रखकर अपने आपको वसुंधरा का सेवक साबित कर दिया। अब भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व व आरएसएस को वसुंधरा राजे को राजस्थान का एकमात्र नेता मान लेना चाहिए। जिस ताकत के साथ आरएसएस व केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा को पिछले वर्ष नेता प्रतिपक्ष से हटाकर अपने आपको सबसे बड़ी ताकत माना था। शनिवार को उनकी बोलती बंद थी। अब संघ और भाजपा यह खबर फैला रहे हैं कि राजनाथ सिंह के साथ अनबन होने के कारण वसुंधरा ने इस्तीफा दिया था, लेकिन सवाल यह उठता है कि राजनाथ सिंह को हटे एक वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद भी नेता प्रतिपक्ष पद खाली क्यों रहा। गडकरी के आते ही ताजपोशी क्यों नहीं हुई। इस तरह अपनी कमजोरी छुपाने से केंद्रीय नेतृत्व व संघ की किरकिरी ही होने वाली है। यह बात गले नहीं उतरती कि किसी विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष को राष्ट्रीय अध्यक्ष से अनबन होने पर त्यागपत्र देना पड़े। अगर ऐसा ही होता तो भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को सड़ा हुआ आचार कहने वाले व गडकरी के प्रबल प्रतिद्वंद्वी मनोहर परिकर को गोवा के नेता प्रतिपक्ष पद से कभी का हटा दिया होता।

राजे की ताजपोशी में अपना भविष्य देख रहे सोलंकी :  जिस ईमानदारी के साथ वसुंधरा राजे को नेता प्रतिपक्ष बनाने में सारथी की भूमिका राजस्थान भाजपा के प्रभारी कप्तान सिंह सोलंकी ने निभाई, उससे लगता है कि उन्हें इस भूमिका में अपना राजनीतिक भविष्य नजर आया। कप्तान सिंह सोलंकी मध्य प्रदेश की राजनीति से आते हैं और वे राजस्थान का प्रभारी बनने से पूर्व महाराष्ट्र के प्रभारी, मध्य प्रदेश भाजपा के संगठन महामंत्री के तौर पर संघ व भाजपा की सेवा कर चुके हैं। इस समय वे मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं। वे 4 अगस्त 2009 को सुषमा स्वराज के त्यागपत्र के बाद रिक्त हुई सीट से राज्यसभा पहुंचे थे और उनका कार्यकाल 2 अगस्त 2012 को समाप्त हो रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश से वापस राज्यसभा में उनके पहुंचने की मुराद दुबारा पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा, संगठन महामंत्री माखन सिंह, मध्यप्रदेश के प्रभारी अनंत कुमार भी सोलंकी के विरोधी हैं। ऐसे में सोलंकी को राजस्थान से 2012 में रामदास अग्रवाल की जगह रिक्त होने वाली सीट से वापस राज्यसभा में जाने की आस नजर आई। इस मुराद को वसुंधरा राजे को नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद ही पूरी हो सकती है। एक तरह महारानी के सारथी बन सोलंकी ने अपने राजनीतिक भविष्य को तलाशने की कोशिश की है।

लेखक हरि सिंह राजपुरोहित मुंबई से प्रकाशित दैनिक प्रात:काल के चीफ रिपोर्टर हैं.

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