Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

राजनीति-सरकार

विवश सीएम, पस्‍त डीएम

पिछले दिनों राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत ने राज्य के जिला कलेक्टरों एवं कमिश्नरों की मीटिंग बुलाई और राज्य की शासन व्यवस्था के बारे में जानकारी लेने के साथ-साथ जरूरी दिशा निर्देश भी जारी किये। मुख्यमन्त्री का इरादा राज्य प्रशासन को आम लोगों के प्रति जिम्मेदार एवं संवेदनशील बनाने का था, परन्तु बैठक के दौरान कलेक्टरों की ओर से साफ शब्दों में कहा गया कि जनता का काम हो कैसे, जबकि निचले स्तर के कर्मचारी न तो कार्यालयों में समय पर उपस्थित होते हैं और ना ही जनता का काम करते हैं! इतनी गम्भीर बात पर भी मुख्यमन्त्री की ओर से यह नहीं कहा गया कि ऐसे अनुशासनहीन एवं निकम्मे लोग सरकारी सेवा में क्यों हैं? बल्कि इस गम्भीर मामले पर मुख्यमन्त्री की चुप्पी विरोधियों की इस बात को बल प्रदान करती है कि अभी भी मुख्यमन्त्री के दिलो दिमाग में पिछली हार का भूत जिन्दा है। जिसमें यह प्रचारित किया गया था कि कर्मचारियों की नाराजगी के चलते भी गहलोत सरकार को हार का सामना करना पडा था।

पिछले दिनों राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत ने राज्य के जिला कलेक्टरों एवं कमिश्नरों की मीटिंग बुलाई और राज्य की शासन व्यवस्था के बारे में जानकारी लेने के साथ-साथ जरूरी दिशा निर्देश भी जारी किये। मुख्यमन्त्री का इरादा राज्य प्रशासन को आम लोगों के प्रति जिम्मेदार एवं संवेदनशील बनाने का था, परन्तु बैठक के दौरान कलेक्टरों की ओर से साफ शब्दों में कहा गया कि जनता का काम हो कैसे, जबकि निचले स्तर के कर्मचारी न तो कार्यालयों में समय पर उपस्थित होते हैं और ना ही जनता का काम करते हैं! इतनी गम्भीर बात पर भी मुख्यमन्त्री की ओर से यह नहीं कहा गया कि ऐसे अनुशासनहीन एवं निकम्मे लोग सरकारी सेवा में क्यों हैं? बल्कि इस गम्भीर मामले पर मुख्यमन्त्री की चुप्पी विरोधियों की इस बात को बल प्रदान करती है कि अभी भी मुख्यमन्त्री के दिलो दिमाग में पिछली हार का भूत जिन्दा है। जिसमें यह प्रचारित किया गया था कि कर्मचारियों की नाराजगी के चलते भी गहलोत सरकार को हार का सामना करना पडा था।

कलेक्टर चाहे और प्रशासन काम नहीं करे, यह कैसे सम्भव है? या तो कलेक्टर, कलेक्टर के पद के योग्य नहीं रहे या फिर कर्मचारियों को कलेक्टरों का भय समाप्त हो गया? दोनों ही स्थितियाँ प्रशासन की भयावह एवं निष्क्रिय स्थिति की ओर संकेत करती हैं। राज्य के मुख्यमन्त्री के समक्ष कलेक्टर और कमिश्नर बेबशी व्यक्त करें, इससे बुरे प्रशासनिक हालात और क्या हो सकते हैं?

राज्य की सत्ता की डोर काँग्रेस के अनुभवी माने जाने वाले राजनेता अशोक गहलोत के हाथ में है, जिनके पास वर्तमान में पूर्ण बहुमत है। राज्य की जनता ने भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार के भ्रष्टाचार एवं मनमानी से मुक्ति दिलाने के लिये काँग्रेस को और अशोक गहलोत को राज्य की कमान सौंपी थी और साथ ही आशा भी की थी कि इस बार अशोक गहलोत प्रशासनिक भ्रष्टाचार एवं मनमानी पर अंकुश लगाने में सफल होंगे। जिससे जनता को सुकून मिलेगा। परन्तु कलेक्टरों की बैठकों में सामने आये राज्य के प्रशासनिक हालातों को देखकर तो यही लगता है कि सत्ता का भय प्रशासन में है ही नहीं। भय नहीं होना भी उतना बुरा भी नहीं है, लेकिन राज्य की सत्ता का सम्मान तो जरूरी है। छोटा सा कर्मचारी भी यह कहता सुना जा सकता है कि मुख्यमन्त्री को सत्ता में रहना है तो कर्मचारियों के खिलाफ बोलने की गलती नहीं करें, अन्यथा परिणाम घातक होंगे।

हम आम लोग अर्थात् सत्ता की चाबी के असली मालिक जिन्हें सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारी कहते हैं, असल में वे सब जनता के नौकर होते हैं, जिन्हें संविधान में लोक सेवक कहा गया है। जनता की गाढ़ी कमाई से संग्रहित राजस्व से वेतन पाते हैं। इन जनता के नौकरों से काम लेने के लिये जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है। जिनकी सरकार के जरिये शासन का संचालन होता है।

यदि लोकतन्त्र में भी जनता के नौकर, जन प्रतिनिधि एवं जनता की सरकार को दांत दिखाने लगें तो फिर लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को बद से बदतर होने से कैसे रोका जा सकता है? मुख्यमन्त्री के साथ इस विषय में जनता को भी गम्भीरता पूर्वक सोच विचार करने की जरूरत है। अन्यथा प्रशासनिक मनमानी एवं निकम्मेपन के चलते जनता का शोषण एवं सत्ताधारी दल का पतन तय है।

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ होम्योपैथ चिकित्सक तथा मानव व्यवहारशास्त्री, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...