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विषमता : देश की सबसे बड़ी चुनौती

पंकजकुछ किस्सागोई के माध्यम से चीज़ों को समझने की कोशिश करते हैं. एक नेताजी एक नए धनकुबेर के यहाँ नाश्ता करने गए. बड़े ही सदिच्छा से उन्होंने उस उद्यमी से यह आग्रह किया कि एक लक्ष्य तय कर लो कि दो सौ करोड़ कमा लेने के बाद कमाना छोड़ कर केवल समाज सेवा करेंगे. थोडा शर्माते, हल्का सकुचाते और ज्यादा गर्वाते हुए उस व्यापारी ने नेताजी को इतिला दी कि यह लक्ष्य तो वो कब का पूरा कर चुका है. झेंप ही गए बेचारे नेताजी. इसी तरह हाल की ही एक खबर है. एक सरकारी बाबू के यहाँ चोरी हो गयी. बेचारे ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसका सवा लाख रुपया चुरा लिया गया है. पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए चोर को जल्द ही पकड़ लिया. बरामद हुई कुल रकम पचास लाख. यानी बाबू का पचास लाख गायब हुआ था वह मात्र सवा लाख का ही रिपोर्ट लिखवा पाया था. इसी तरह एक पान के ठेले पर खड़ा हूँ. एक सामान्य सा आदमी आता है और वह पान वाले से बड़े ही गर्व से अपनी उपलब्धि बताता है कि नगद देकर उन्होंने रायपुर में तीस लाख रुपया का घर खरीदा है.

पंकज

पंकजकुछ किस्सागोई के माध्यम से चीज़ों को समझने की कोशिश करते हैं. एक नेताजी एक नए धनकुबेर के यहाँ नाश्ता करने गए. बड़े ही सदिच्छा से उन्होंने उस उद्यमी से यह आग्रह किया कि एक लक्ष्य तय कर लो कि दो सौ करोड़ कमा लेने के बाद कमाना छोड़ कर केवल समाज सेवा करेंगे. थोडा शर्माते, हल्का सकुचाते और ज्यादा गर्वाते हुए उस व्यापारी ने नेताजी को इतिला दी कि यह लक्ष्य तो वो कब का पूरा कर चुका है. झेंप ही गए बेचारे नेताजी. इसी तरह हाल की ही एक खबर है. एक सरकारी बाबू के यहाँ चोरी हो गयी. बेचारे ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसका सवा लाख रुपया चुरा लिया गया है. पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए चोर को जल्द ही पकड़ लिया. बरामद हुई कुल रकम पचास लाख. यानी बाबू का पचास लाख गायब हुआ था वह मात्र सवा लाख का ही रिपोर्ट लिखवा पाया था. इसी तरह एक पान के ठेले पर खड़ा हूँ. एक सामान्य सा आदमी आता है और वह पान वाले से बड़े ही गर्व से अपनी उपलब्धि बताता है कि नगद देकर उन्होंने रायपुर में तीस लाख रुपया का घर खरीदा है.

तो यह तीनों कहानी भले ही अलग-अलग पृष्ठभूमि से हो लेकिन एक बात सबमें सामान है कि ‘वित्त मंत्री’ मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किये  गए उदारीकरण ने ‘प्रधानमंत्री’ मनमोहन सिंह तक ज़माना आते-आते लंबी दूरी तय कर ली है. इस तरह की लंबी दूरी तय करने में ज्यादा वक्त तो बिलकुल ही नहीं लगा. मोटे तौर पर हाल में प्रलय की कल्पना को दिखाने वाली फिल्म की तरह ही आज के समाज में वैश्वीकरण ने एक ऐसे जहाज़ का निर्माण किया है, जिसमें जगह पाए हुए हर व्यक्ति के लिए काफी कुछ है. हर वह व्यक्ति जो इस चलती गाड़ी में किसी तरह भी जगह बनाने में सफल रहा, उसने तो मानो वैतरणी पार कर ली. लेकिन जो भी इस अवसर से वंचित रहा उसके लिए तो वास्तव में महाप्रलय जैसी स्थिति ही है.

तो निश्चय ही यह कहा यह जा सकता है कि आज के समाज और तेज़ी से बदलती इस दुनिया, खास कर तीसरी कहे जाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती अगर है तो वह है विषमता. आय का खतरनाक हद तक असामान्य वितरण आज एक ऐसा संकट है जिससे पार पाने का उपाय खोजना किसी भी सरकार के लिए सबसे बडी चुनौती है. हालाकि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि विकास और औद्योगीकरण, उपभोक्तावाद के इस ज़माने में गरीबी कम हुई है. लोगों का जीवन स्तर भी अपेक्षाकृत सुधरा है. लेकिन जिस तरह अमीर और उच्च मध्य वर्ग की आमदनी में इजाफा हुआ है उस अनुपात में आज भी गरीबों की गरीबी कम नहीं हुई है. और इस समस्या के भौतिक कम लेकिन सामजिक और मानसिक दुष्प्रभाव ज्यादे है.

यह मानव का स्वभाव है कि वह अपने घर में अकेले में भले ही भूखे रह ले, लेकिन पेट भरे होने पर भी अपने से बहुत ज्यादा अमीर व्यक्ति को या अपने आस-पास के कल तक के सामान्य आमदनी वाले व्यक्ति को ऐशो-आराम करते हुए, धन का भोंडा प्रदर्शन करते देख कर हीन भावना का अनुभव करता है. हमारे पूर्वजों ने इस समस्या की विकरालता को यूं तो समय रहते हुए ही समझ लिया था. एक संस्कृत श्लोक का भावार्थ है कि ‘भले ही जंगलों में निवास करना पड़े, बाघ और हाथी के डर से मुकाबला करते हुए भी जिन्दा रहना पड़े. जंगली कंद-मूल पर आश्रित रहना पड़े, वल्कल वस्त्र धारण करना पड़े लेकिन एक बहुत अमीर भाई के बीच गरीब हो कर रहना संभव नहीं है.’ तो आर्थिक असमानता का यह ऐसा स्याह पक्ष है जिस पर सामाजिक चिंतकों को चिंतन कर राह निकालने की ज़रूरत है. सरकारों को भी चाहिए कि आज के समय के चक्र को भले ही अब उलटा घुमाना संभव न हो लेकिन इस तरह के दुष्प्रभावों पर चिंतन करते हुए कोई युक्तिसंगत राह निकाला जाय. कही न कही तेज़ी से बढ़ता नक्सलवाद या इस तरह की आतंकी समस्या के लिए ‘संसाधन’ बनने वाले मानवों के लिए यह विषमता भी जिम्मेदार है.

अब सवाल यह पैदा होता है कि इसका निदान क्या हो? इस तरह की बाते करते हुए निश्चित ही सबसे पहले साम्यवाद की ओर नज़र जाती है. ‘असामानता’ उनके लिए एक ऐसे बौद्धिक उत्पाद की तरह है जिनका कापीराइट केवल उनके पास है. सरल शब्दों में कहूं तो साम्यवाद या उनके अतिवादी संगठनों के लिए तो यह ऐसी ‘खाद’ है, जिसके सहारे ही वह अपनी फसल को पकते देखना चाहते हैं. तो उनको न ही इस बीमारी को खत्म होने देने की इच्छा शक्ति है और न ही ताकत. निश्चय ही मानव के स्तर पर हम सब सामान हैं. ‘एकैव मानुषी जाति’ मार्क्स से बहुत पहले का अपना सूत्र वाक्य है. हमारा उपनिषद भी यह कहता है कि ‘इशावास्यमिदं सर्वं, यत्किंच्य जगतां जगत’ यानी इश्वर इस जगत के कण-कण में विद्यमान है. निश्चय ही मानव मात्र या यूं कहें की सृष्टि मात्र के कण-कण को एक सामान समझना, सबमें उसी ईश्वर का निवास घोषित करने से बड़ा साम्यवाद का और कोई दर्शन नहीं हो सकता है.

लेकिन सवाल यह है कि इसे व्यावहारिकता का जामा कैसे पहनाया जाय? किसी भी सरकार या शासक के लिए सबको समभाव से देखते हुए नीतियों को बनाना किस तरह से संभव हो? आखिर बुद्धि-विवेक और ताकत के स्तर पर प्रकृति ने सबमें अलग-अलग विशेषता दी है. तुलसी ने जैसे कहा है ‘एक पिता के विपुल कुमारा, पृथक-पृथक गुण शील अचारा…यानी एक ही पिता के विभिन्न संतानों के भी गुण-शील और आचार-व्यवहार में पृथकता होती है. कोई पंडित, कोई तपस्वी तो कोई विद्वान हो सकता है.’ तो आखिर सबपर पिता का बराबर स्नेह होते हुए भी ज़ाहिर है कि सबके विकासार्थ पिता को अलग-अलग तरीके खोजने होंगे. निश्चित ही सबके लिए एक ही तरीके अपना कर आप उन सबका उन्नयन तो कर नहीं सकते. तो आखिर कौन सा वह तरीका हो, कैसी वह नीति हो जिनमें सबके विकास हेतु लेकिन अलग-अलग तरीके से व्यवस्था की जाय? यह निर्धारण करना नीतिज्ञों के समक्ष आज की सबसे बड़ी चुनौती है.

हालांकि इस विषय पर काफी चिंतन किया गया है. समाजवादियों ने तो दो टूक घोषणा कर दी कि इस दुनिया में दो तरह के लोग ही हैं. एक वो जिनके पास बहुत है, और एक वो जिनके पास कुछ नहीं है. एक वो जो बुर्जुआ हैं और दूसरे वो जो सर्वहारा हैं. तो हर तरह के ‘बुर्जुए’ को हिंसा के द्वारा समाप्त कर दुनिया में केवल सर्वहारा के रहने लायक जगह बने रखना एक मात्र उपाय है. लेकिन इस तरह के भोंडे एवं उथले विचार के कारण समाज किस तरह का नर्क बना जा रहा है वह सामने है. आजतक दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी ऐसा देश नहीं होगा जिसने इस मॉडल के आधार पर सुख-शान्ति या विकास को प्राप्त किया हो.

तो अब तक के सभी चिंतकों में इस मामले में नोबल पुरस्कार प्राप्त भारतीय अर्थशास्त्री ‘अमर्त्य सेन’ सबसे नज़दीक तक पहुंच विकास का सर्व समावेशी समाधान प्रस्तुत करते हुए दिखते हैं. वास्तव में अर्थशास्त्र को कल्याणकारी, समावेशी बनाने हेतु ‘सेन’ का दिया सिद्धांत सबसे ज्यादा मुफीद मालूम होता है. विचारको को चाहिए कि उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत को आधार बना कर ही आगे की राह तय करने हेतु विमर्श करें.
अपनी पुस्तक ‘विषमता एक पुनर्विवेचन’ में अमर्त्य यह स्थापना देते हैं कि कोरे समानता से कुछ भी होना संभव नहीं है. वह मोटे तौर पर प्रकृति के भी विरुद्ध है. उदाहरण देते हुए वह समझाते हैं कि क्या यह संभव है कि प्राकृतिक आधार पर अगर महिलाओं को मातृत्व अवकाश की ज़रूरत है तो कल होकर सरकार के पुरुष कर्मचारी भी वैसे ही अवकाश की बात करें? ऐसे ही कई सवालों को उठा वे अंत में यह निष्कर्ष देते हैं कि एक कल्याणकारी राज्य वह हो सकता है, जिसे प्रकृति की विषमताओं को स्वीकार करते हुए, मौलिक विभिन्नताओं को मद्देनज़र रखते हुए केवल ‘अवसर की समानता’ सबके लिए मुहैया कराये.’ वास्तव में व्यक्ति द्वारा स्थापित किसी भी संस्था या राज्य के लिए उचित यही है कि वह इस समानता के लिए प्रयासरत हो.

एक लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य का आशय यही हो कि वह सबके विकास के लिए सामान अवसर उपलब्ध करवाए. लोग अपनी प्रकृति और क्षमता के अनुरूप अपने-अपने व्यक्तित्व निर्माण हेतु तभी खुद को तैयार कर पायेंगे. अन्यथा जैसा कि कभी ओशो ने कभी आज के प्रचलित साम्यवाद के बारे में थोड़ा उपहास पूर्वक यही कहा था, ‘साम्यवाद का एक मात्र अर्थ यही है कि सभी बड़ी लाइन की गाड़ियों को छोटी लाइन में बदल दिया जाय.’ वास्तव में अब से समानता को केवल ‘अवसर की समानता’ के सन्दर्भ में ही देखे जाने की ज़रूरत है.

लेखक पंकज कुमार झा रायपुर से प्रकाशित ‘दीप कमल’ के संपादक हैं.

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