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वेब रिपोर्टिंग के नाम पर बकवास कर रहे लोग

: सब कुछ मिस ही मिस : मिस अण्डर स्टैण्डिंग, मिस ऑपरेटिंग, मिस टेकिंग : आजकल कुछ ऐसे रिपोर्टर्स देखने को मिलेंगे जो न चाहते हुए भी आप के मेल पते पर ऊल-जुलूल किस्म की खबरें भेजते हैं। शायद ऐसा करना उनकी आदत है जो एक ‘ड्रग एटिक्ट’  की तरह कई मेल आईडी पर एक साथ अपने वाहियात ‘आर्टिकल्स’ भेजते हैं। हाई प्रोफाइल कहलाने के चक्कर में ब्लाग/फेसबुक आदि इत्यादि वेब स्पेस पर अपनी सिरदर्द जैसी बकवासों को लिखने/चैटिंग करने वालों से एक तरह से ‘एलर्जी’  हो गई है। इन्टरनेट की सेवा प्रदान करने वालों ने थोड़े से पैसों में असीमित डाउन/अपलोडिंग की सुविधा दे रखा है,  सो वेब का बेजा इस्तेमाल करने वाले अराजक तत्वों की भरमार हो गई है। इन लोगों ने इन्टरनेट को मजाक सा बना लिया है। कुछेक कथित लेखकों ने हमें भीं अपने लेख/न्यूज आदि मेल करना शुरू कर दिया। खीझ होने लगी थी, यह कहिए कि ऐसे लोगों से एलर्जी होने लगी। सैकड़ों मेल आईडी पर भेजे गए इन तत्वों के ‘आलेख’ न तो सारगर्भित होते हैं, और न ही प्रकाशन योग्य।

: सब कुछ मिस ही मिस : मिस अण्डर स्टैण्डिंग, मिस ऑपरेटिंग, मिस टेकिंग : आजकल कुछ ऐसे रिपोर्टर्स देखने को मिलेंगे जो न चाहते हुए भी आप के मेल पते पर ऊल-जुलूल किस्म की खबरें भेजते हैं। शायद ऐसा करना उनकी आदत है जो एक ‘ड्रग एटिक्ट’  की तरह कई मेल आईडी पर एक साथ अपने वाहियात ‘आर्टिकल्स’ भेजते हैं। हाई प्रोफाइल कहलाने के चक्कर में ब्लाग/फेसबुक आदि इत्यादि वेब स्पेस पर अपनी सिरदर्द जैसी बकवासों को लिखने/चैटिंग करने वालों से एक तरह से ‘एलर्जी’  हो गई है। इन्टरनेट की सेवा प्रदान करने वालों ने थोड़े से पैसों में असीमित डाउन/अपलोडिंग की सुविधा दे रखा है,  सो वेब का बेजा इस्तेमाल करने वाले अराजक तत्वों की भरमार हो गई है। इन लोगों ने इन्टरनेट को मजाक सा बना लिया है। कुछेक कथित लेखकों ने हमें भीं अपने लेख/न्यूज आदि मेल करना शुरू कर दिया। खीझ होने लगी थी, यह कहिए कि ऐसे लोगों से एलर्जी होने लगी। सैकड़ों मेल आईडी पर भेजे गए इन तत्वों के ‘आलेख’ न तो सारगर्भित होते हैं, और न ही प्रकाशन योग्य।

हमने अपने सहकर्मी से कहा कि रिप्लाई आल करके ऐसे लोगों को ताकीद कर दो कि आइन्दा बेवजह मेल बाक्स में ‘वाहियात’ आलेख न भेजें। कोई दिल्ली के हैं, उन्होंने काल करके कहा कि वह ऐसा इसलिए करते हैं ताकि गरीब लोग जो वेब साइट्स/न्यूज पोर्टल की तरह संचालित कर रहे हैं, उन्हें मुफ्त में न्यूज (खबरें) मिल जाएँ। उनकी बातें सहकर्मी ने सुनी और कुछ बताया। हँसी आई फिर मानव होने की वजह से दुर्गुण रूपी गुस्सा भी आया। कहा वह बेवकूफ है। पहले तो इसे छपास रोग था, जब छपने लगा तब आल पर मेल करने लगा। यह सोचकर कि वह वेब पोर्टल चलाने वाले आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को फ्री में खबरें दे रहा है। इसी तरह कइयों के मेल्स आते रहते हैं। मानव हूँ गुस्सा तो आएगा ही। सहकर्मी से कहा कि लिख दो कि फार द गॉड सेक अब इस तरह के मेल सेन्डिंग बन्द करें। सहकर्मी नहीं समझ पाये उन्होंने ‘रिप्लाई आल’  कर दिया। दिल्ली वाले की तरह ‘बेतूल’  छत्तीसगढ़,  मप्र आदि कई स्थानों से इसी तरह के मेल्स आते हैं।

जाहिर सी बात है कि जिनसे हमारा किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है वे गुस्सा तो करेंगे ही। एक छोटी सी त्रुटि ने कई लोगों के ‘ईगो को हर्ट’  किया। उनके रिटर्न मेल्स आए, जिनमें सभी ने अपने-अपने तरीके से मुझे भला-बुरा कहा था। मैंने महसूस किया कि पत्रकारिता से सम्बद्ध लोगों में स्वाभिमान के स्थान पर दर्प यानी घमण्ड कुछ ज्यादा है, वह भी ऐसे लोग जिन्होंने दो हजार, पाँच हजार खर्च करके अपनी वेब साइट्स बना लिया है उनके तो रूतबे का कोई सानी नहीं। बहरहाल मैं क्या गुस्सा करूँ। मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि कभी-कभी ऐसे लोगों से पाला पड़ जाता है,  जिनकी वजह से हमारी रिप्लाई से एक से एक योद्धा तलवारें भाँजने लगते हैं, जिन्हें युद्ध के मैदान में जंग लड़ने का तरीका ही नहीं मालूम। भाइयों यदि आप को दिल्ली/ बेतूल/ रायपुर/ छत्तीसगढ़/ राजस्थान/ दुर्ग आदि स्थानों पर रहने वाले मेल कर्ताओं को मेरी तरफ से भेजे गए नसीहत भरे मेल मिले हों तो आपसे यह कहना चाहूँगा कि मेरी कोई व्यक्तिगत एनिमिटी किसी से नहीं है। इस इलेक्ट्रॉनिक युग में अमेरिकी राष्ट्रपति को प्रेषित मेल गलती से किसी अन्य देश के राष्ट्राध्यक्ष को मिल जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। आपा न खोया करें। मैंने भी प्रिण्ट मीडिया में अब तक अपनी सेवाएँ देते हुए 37 वर्ष पूरे कर लिए हैं। तब न तो इसकी पढ़ाई थी, और न ही मास कम्युनिकेशन का प्रशिक्षण जो पढ़ना-लिखना जानता था वहीं सिकन्दर होता था। आप वेबसाइट संचालित करते हैं, यह आप के लिए गौरव की बात हो सकती है।

हम भी अपना अखबार निकालते हैं, और वेब पोर्टल ऑपरेट करते हैं, शौकिया। रही बात चैटिंग या फिर नए तकनीक से संवाद करने की तो वह मुझे नहीं मालूम। इन्टरनेट ऑपरेट करने के लिए सहयोगी की मदद लेता हूँ। सहयोगी से चूक हो जाए तो जाहिर सी बात है कि वह गलती मेरी ही मानी जाएगी। लेकिन आप तूफान सिंह हों या चक्रवात मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी ‘बैताल’ के नाम से अपनी ‘युवावस्था’  मे चर्चित पत्रकार हुआ करता था, लेकिन तहजीब और एखलाक को ताक पर नहीं रखा लोगों के बीच सम्मानित ढंग से स्थान पाता था। अब भीं पाता हूँ। आज तो मेट्रोसिटी में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले भी सपना ‘मक्का’  का देखते हैं। हमारे यहाँ कहावत है कि ”रहैं भरसाएँ में और देखै सपना मक्का कै”। मैं आप को नहीं कह राह हूँ। अब मैं इस कहावत से भी इनकार नहीं कर सकता कि ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’। यदि आप की मेल आईडी पर रिप्लाई आल के क्रम में कुछ मेरी तरफ से भेजा गया हो जिससे आप का ‘ईगो हर्ट’  हुआ हो तो उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ क्योंकि मैं ‘अकारण’  किसी शरीफ को दिल नहीं दुखाना चाहता। आप से भी अपेक्षा करता हूँ कि जो लोग अपने मेल्स सेण्ड आल करके ‘बकवास’  भेजते हैं उन्हें नसीहत जरूर दें। अनजाने में हुई गलती के लिए एक बार फिर क्षमा चाहूँगा। फिलवक्त बस इतना ही। शरीफ भाइयों/बहनों से माफी के साथ।

मनोज देशमुख

[email protected]

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