औरत में सागर सी गहराई और हिमालय सी ऊँचाई होती है. जिस तरह से सागर की गहराई से गंदगी के साथ सीप और
मोती साथ-साथ पाए जाते हैं, उसी प्रकार औरत के हर रूप में एक रूप वेश्या का भी है. यहां एक उदाहरण देना चाहूगा. अगर हम सड़क पर जा रहे हैं और हमारे हाथ में खाने का टिफिन गिर जाये तो हम उस खाने को तो उसी सड़क पर छोड़ देते हैं मगर खाली टिफिन उठा कर घर में लाकर रख देते हैं. हम इस बात को अगर एक औरत की जिन्दगी से जोड़ कर देखें. हमारे देश की औरत इसी तरह की जिन्दगी जी रही है. औरत मां है, औरत बहन है, औरत पत्नी है, औरत देवी है. औरत एक ही है मगर औरत को देखने का हमारा नजरिया अलग-अलग है. यही नजरिया और नजर औरत के साथ हमारे रिश्ते का नामकरण करती है।
यह सब जानते हैं कि औरत से ही हमारी सृष्टि चलती है. हम सभी कहते रहते हैं कि हमारा देश नारी प्रधान देश है और हमारे यहां नारी को देवी माना गया है. हम औरतों की पूजा करते हैं, मंदिर में जाकर. एक औरत जो पत्थर की मूरत में है, हम उसकी पूजा तो करते हैं और उसको कपड़े भी पहनाते हैं मगर दूसरी तरफ अगर वही औरत किसी कोठे पर मिल जाये तो चंद रुपये देकर हम लोग ही उसके कपड़े उतारने में थोड़ी सी भी देर नहीं लगाते क्योंकि उस वक्त हमको पता होता है कि हमने उस औरत के शरीर को भोगने की कीमत दी हुई है.
माना कि हमने उस औरत के शरीर की कीमत दे दी है पर क्या उसकी आत्मा भी हमने खरीद ली. पैसों से शरीर तो हमें मिल जायेगा पर उस आत्मा का क्या करेंगे जहां सिर्फ प्यार और अपनापन बसता है किसी के लिए? हम इस आधुनिक युग में पैसों से कुछ भी खरीद सकते हैं मगर किसी की भावनायें, प्यार और आत्मा नहीं खरीद सकते. इस संसार का सबसे बड़ा कलंक ये भी है कि आज तक हर इन्सान ने किसी भी वेश्या का शरीर तो खरीदा होगा मगर उसका प्यार, उसकी आत्मा, उसके दर्द को बांटने की कोशिश नहीं की होगी. आखिर ऐसा क्यों? जब हम नारी को देवी का दर्जा देते है तो एक वेश्या भी तो वो ही नारी है जिसको हम मां, बहन और पत्नी के रूप मे देखते हैं. जिस तरह हम पर कोई भी कष्ट पड़ता है तो हम पल भर मे किसी भी देवी या देवता के मंदिर मे जाकर उसकी शरण ले लेते है. उसी तरह जब हम को कोई भी कोई गम भूलना होता है तो हम किसी कोठे पर जाकर उस वेश्या या किसी प्यारी नार की शरण लेते हैं. एक वेश्या जिसको एक बंद कमरे और रात के अंधेरे मे तो सब पाना चाहते हैं मगर दिन के उजाले मे हम उसको सिर्फ हीन भावना और समाज से तिरस्कृत नजरों से देखते हैं. वेश्या को सिर्फ अपने इस्तेमाल के लिए प्रयोग करते हैं.
जिस तरह से अपनी मां गरीबी-अमीरी नहीं देखती और अपना सारा प्यार अपने बच्चों पर लुटा देती है और एक देवी भी पहले अपने भक्त की परीक्षा लेती है, उस इम्तेहान में जब भक्त पास हो जाता है तभी वो देवी उस भक्त की मदद करती है. कभी किसी वेश्या को अपना के तो देखो, वो देवी से ज्यादा वफादार होगी. ये बात हमें समझनी होगी. देवी जिसकी हम पूजा करते हैं वो भक्त का इम्तहान लेती है, फिर भी वो हमारे लिए पूज्य है. एक वेश्या जो ये जानते हुए भी कि यहां आने वाला हर शख्स चंद पलों के बाद उसको धोखा देकर छोड़ कर अपने रास्ते चल देगा और पीछे मुड़ कर देखेगा भी नहीं, फिर भी उस पर वो अपना सर्वस्व निछावर कर देती है. अब सवाल ये उठता है की औरत देवी भी है, औरत वेश्या भी है, औरत मां भी है तो सबसे महान कौन? मेरी नजर में सबसे महान वो वेश्या ही है जो जानती है कि ये जहर है फिर भी वो जहर का घूंट पी लेती है. पी के विष का प्याला दिया अमृत, उसने सबको, बिकी पैसो कि खातिर, लुटा तन अपना, उफ़ तक नहीं किया.
हममें और हमारे समाज मे इतनी हिम्मत कहां कि उसे महान स्वीकार ले. जिस दिन हम एक वेश्या को महान या देवी का रूप दे देंगे, उस दिन वाकई मे हमारा देश महान हो जायेगा. क्या हममें से किसी ने भी कभी ये जानने की कोशिश की कि बाजार मे बैठी ये औरत जो चंद रुपयों की खातिर जिस्म का धंधा करती है, उसकी मजबूरी क्या होगी? क्या हममें से किसी ने ये जानने की कोशिश की कि जिस पल हम उसके शरीर से खेलते हैं, क्या हम उसकी आत्मा या भावनाओ से नहीं खेलते? माना की हमने उसके शरीर का मोल चुका दिया है लेकिन क्या हम उसकी आत्मा का भी मोल चुका पायेगे? एक औरत जिसकी हम पूजा करते हैं, उसका दूसरा रूप वेश्या का भी होता है. व्यक्ति से समाज बना है और इस आदर्श समाज की संरचना भी हमने ही की है. क्या किसी ने सोचा है कि हम चंद रुपये फेंक कर उस औरत के जिस्म को नहीं रौंदते बल्कि उसकी भावनाओ को रौंदते हैं, एक मां को, एक बहन को और एक पत्नी को समाप्त करते हैं सिर्फ अपनी वासनाओं की खातिर.
कहते हैं कि स्वाभिमान की जिन्दगी हर इन्सान जीना चाहता है, तो क्या एक वेश्या इन्सान नहीं होती या क्या वो भी एक प्यार करने वाला दिल नहीं चाहती, क्या वो भी किसी घर की शोभा नहीं बनना चाहती ? मगर समाज के कुछ भूखे लोग, अपनी नजरों से, अपनी हरकतों से उसकी भावनाओ को सुन्न कर देते हैं. शायद ये भी हमारे समाज की एक विडंबना है कि यहां औरत ने ही औरत को वेश्या बनाया. वेश्या ने अपने लिए नफरत स्वीकारा और सबको प्यार बांटा. खुद जली नफरत के आग में पर आदमी को अमृतपान करवाया. अगर हमारे समाज में ये वेश्यायें न हों तो समाज मे कितनी गंदगी बढ़ जाए, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता. हर गली हर शहर में खुलेआम बलत्कार होने लगे. वेश्या अपना जिस्म और जान देकर भी हमें आबाद करती है. कहते हैं कि …..
लकड़ी जल कोयला बनी कोयला जल सो राख.
मै अभागिन ऐसी जली, कोयला बनी न राख।
ऐसी ही है वेश्या की जिंदगी.
कहते हैं कि भगवान और देवी हमेशा जिंदगी देती है और इन्सान हमेशा जिंदगी लेता है. वेश्या जो कि एक औरत है और वो कभी हमसे कुछ नहीं लेती, हमेशा दूसरों पर अपना सब कुछ लुटा देती है, तो क्या वो हमारे लिए देवी नहीं है? बिलकुल है. मगर जरूरत है तो सिर्फ अपनी सोच बदलने की. जो आंखें हमको भगवान ने दी है उसमें उसकी मूरत बदलने की. अगर हम ऐसा कर पाए तो हर भारतीय दिल से कहेगा कि हमारा देश नारी प्रधान देश है.
ना तू किसी को सता, ना किसी कि आहें ले,
हो सके तो कर भला, नहीं तो अपनी राह ले।
लेखक ब्रजेश निगम झांसी (यूपी) के पत्रकार हैं। इन दिनों राष्ट्रीय हिंदी मेल के ब्यूरो चीफ हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता।

