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वे गंगा को साफ करना चाहते हैं या गंगा का पानी!

गंगाजी: मंडराने लगा है काशी में गंगा के दो भाग में बंटने का खतरा : अरबों रुपये बहाने के बाद भी नहीं सुधरी गंगा की स्थिति : गंगा में बाढ़ का दृश्य देखने गई थी और नदी का भव्य स्वरूप देख एक बारगी आंखें भर आई। क्योंकि अधिक नहीं बमुश्किल एक माह पहले सिमटी, सिकुड़ी, दुबली और मैली-कुचैली गंगा। कहां आज चौड़े पाट में इठलाती, लहराती, बलखाती गंगा। कभी सामान्य दिनों में मां गंगा का यही स्वरूप हुआ करता था। तब इसे जीवनदायिनी, अमृत वाहिनी, मोक्षदायिनी और न जाने किन-किन संबोधनों-उपनामों से नवाजा गया था, लेकिन अब न गंगा का पहले जैसा विशाल चौड़ा पाट रहा और ना ही अमृत जैसा जल। काशी में तो गंगा का पानी आचमन करने योग्य भी नही रहा। स्नान-ध्यान की बात दूर रही। अब तो काशी में गंगा के दो भागों में बंटने का भी खतरा मंडराने लगा है।जानकारों का कहना है कि बेहिसाब जलदोहन और कछुआ सेंचुरी के चलते काशी में गंगा का भविष्य खतरे में है।

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गंगाजी: मंडराने लगा है काशी में गंगा के दो भाग में बंटने का खतरा : अरबों रुपये बहाने के बाद भी नहीं सुधरी गंगा की स्थिति : गंगा में बाढ़ का दृश्य देखने गई थी और नदी का भव्य स्वरूप देख एक बारगी आंखें भर आई। क्योंकि अधिक नहीं बमुश्किल एक माह पहले सिमटी, सिकुड़ी, दुबली और मैली-कुचैली गंगा। कहां आज चौड़े पाट में इठलाती, लहराती, बलखाती गंगा। कभी सामान्य दिनों में मां गंगा का यही स्वरूप हुआ करता था। तब इसे जीवनदायिनी, अमृत वाहिनी, मोक्षदायिनी और न जाने किन-किन संबोधनों-उपनामों से नवाजा गया था, लेकिन अब न गंगा का पहले जैसा विशाल चौड़ा पाट रहा और ना ही अमृत जैसा जल। काशी में तो गंगा का पानी आचमन करने योग्य भी नही रहा। स्नान-ध्यान की बात दूर रही। अब तो काशी में गंगा के दो भागों में बंटने का भी खतरा मंडराने लगा है।जानकारों का कहना है कि बेहिसाब जलदोहन और कछुआ सेंचुरी के चलते काशी में गंगा का भविष्य खतरे में है।

फ्लोरेट की कमी से पानी में बालू ढोने की क्षमता दिनों-दिन घटती जा रही है तो बाढ़ की कमजोर गति ने गंगा में बालू क्षेत्र के और विस्तार की आशंका बढ़ा दी है। बाढ़ के बाद गंगा में जगह-जगह बड़े-बड़े बालू के टीले उभड़े नजर आएंगे तो इसकी धारा भी दो भागों में बंटी दिखेगी। सर्वाधिक दुःखद पक्ष यह होगा कि रामनगर (उस पार बालू क्षेत्र) की तरफ गंगा का पानी कुछ साफ और काशी के घाटों की तरफ पानी अत्यधिक दूषित नजर आएगा। क्योंकि नदी का सिद्धांत है कि बालू क्षेत्र जितना ऊंचा होगा उसके ठीक सामने किनारे पर उतनी ही गहराई होगी और जैसे-जैसे गहराई बढ़ती जाएगी वहां का वेग घटता जाएगा। फिर वह किनारा पलूटेड जोन में परिवर्तित होता जाएगा। काशी में भी कछुआ सेंचुरी के चलते बालू खनन रोक दिए जाने से जहां गंगा के उस पार बालू क्षेत्र टीले का रूप लेता जा रहा है, तो उसी अनुपात में घाट की तरफ गहराई बढ़ती जा रही है। परिणामस्वरूप गंगा में गिर रहे नालों का पानी घाट किनारे विस्तार लेता जा रहा ह

बीएचयू के पर्यावरणविद् प्रो. बीडी त्रिपाठी की माने तो प्रवाह की गति पर ही नदी का भविष्य टिका होता है। इसी बहाव के बल पर नदी बालू को बहा कर अपनी गहराई तय करती है और प्रदूषक भार को बहाकर अपने को निर्मल बनाती है। बाढ़ के दिनों में यह प्रक्रिया कई गुना तेज हो जाती है। इसे गंगा के संदर्भ में देखा जाए तो इस बार बाढ़ की गति अपेक्षा से काफी कम होने के कारण गंगा में पहले से जमें बालू और प्रदूषक तत्वों का बहाव कम देखा जा रहा है। जाहिर है गंगा में पहले की अपेक्षा बालू और प्रदूषकों का विस्तार बढ़ेगा। केंद्रीय जल आयोग की सर्वे रिपोर्ट को देखते हैं तो भी यही पता चलता है कि इस बार बाढ़ की गति आधा सेंटीमीटर प्रतिघंटे से भी कम की रही जबकि पिछले वर्ष तीन सेंटीमीटर की थी। संबंधित अधिकारियों का कहना है कि बाढ़ के बाद भी गंगा का अप और डाउन स्ट्रीम खाली है। इतना पानी नहीं आ सका कि पेटा भर सके। इसे गंगा के भविष्य और ग्राउंड वॉटर रिचार्जिंग की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता। इसकी वजह एक तो अत्यधिक जलदोहन से गंगा का पेटा अपेक्षा से कहीं ज्यादा खाली हो चुका था तो दूसरा यह कि वर्षा के अभाव में इतना पानी नहीं आ सका कि गंगा का पेटा भर सके।

बहरहाल, विशेषज्ञों के इन तर्कों और मौजूदा हालातों को देखते हुए यहां यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि गंगा की दशा बिगाड़ने में सबसे बड़ा हाथ सिर्फ और सिर्फ देश के नीति-नियंताओं का है। पहले तो गंगा को उसके अपने जल से ही महरूम कर दिया गया। अब उसमें प्रवाहित दूषित नदियों, मल-जल, कल-कारखानों के केमिकल युक्त पानी को शोधित कर गंगा जल बनाने के नाम पर करोड़ो-अरबों डकारा जा रहा है। न गंगा में गंगा जल छोड़ने की योजना पर विचार किया जा रहा है और ना केमिकलयुक्त पानी को गंगा में गिरने से रोकने दिशा में कोई ठोस पहल। गंगा की ऐसी दशा उस समय है जब इसके पानी को फिल्टर कर महानगरों में जलापूर्ति की एक बड़ी योजना पर काम भी चल रहा है। ऐसे में गंगा निर्मलीकरण के अब तक के प्रयासों और नदी के साथ हो रहे अत्याचारों को गंगा की निगाहों से देखा जाना बेहद प्रासंगिक होगा।

यदि गंभीरता से देखें तो हम पाते हैं कि गंगा के तकरीबन 95 फीसदी जल को हरिद्वार के पास ही निकाल लिया जा रहा है और इसे जगह-जगह इससे मिलने वाली दूषित नदियों, नालों और विभिन्न कारखानों से निकलने वाले केमिकल युक्त पानी के हवाले कर दिया गया है। अब गंगा में प्रवाहित इसी दूषितजल को शोधित कर गंगा जल बनाने की कवायद की जा रही है। इस पर अरबों-खरबों रुपये खर्च कर जग जीतने जैसा उपक्रम भी किया जा रहा है। याद नहीं आ रहा कि ऐसा भी कोई फार्मूला सामने आया हो जो साफ सुथरे पानी को ही गंगाजल बनाने की क्षमता रखता हो। फिर मल-जल और रासायनिक जल के मिश्रण को शोधित कर गंगाजल बनाने की कल्पना कैसे की जा सकती है? इस नंगे सच के बाद भी सरकार निर्मलीकरण के नाम पर गंगा के पानी में अरबों की थैली बहा रहा है तो आस्थावान घाटों के किनारे दोना-पत्तल बटोर रहा है। कोई घाटों का कूड़ा-कचरा इस पार से उठा कर गंगा के उस पार बालू में फेक रहा है तो कोई जनजागरण कर पुण्य के भागी होने का दावा ठोक रहा है। जबकि हकीकत तो यह है कि गंगा का न्यूनतम प्रवाह तय किए बिना जल निकासी और जलशोधन की योजना ही गंगा को चंगा नहीं होने दे रही है।

जड़ को छोड़ कर तना सींचने जैसी योजना का ही नतीजा है कि गंगा में मल-जल का विस्तार दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। तकरीबन 25 वर्षों का लंबा समय और अरब से ऊपर की रकम खर्च करने के बाद भी गंगा की सेहत सुधरने के बजाए बिगड़ते जाना अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि गंगा निर्मलीकरण अभियान में मनोयोग और दिशानिरूपण का अभाव है। विडंबना यह भी कि हमारे नीति-नियंता अब तक यह तय नहीं कर पाए कि वे गंगा को साफ करना चाहते हैं अथवा पानी को। बीएचयू में गंगा अन्वेषण केंद्र के कोआर्डिनेटर प्रो. यूके चौधरी कहते है कि कोई भी नदी उसमें प्रवाहित हो रहे जल के आयतन, उसके जलगुण और उसकी गतिशीलता से ही जानी जाती है। ये तीन ही उसकी अपनी शक्तियां हैं। इन्हीं शक्तियों को ध्यान में रख जल की निकासी और अवजल मिश्रण की मात्रा तय की जाती है।

इस सिद्धांत पर विचार किए बिना नदी में सतही, भूमिगतजल व अवजल आने की प्रक्रिया और जल निकासी की क्रिया को नहीं समझा जा सकता। जहां-तहां अवैज्ञानिक तरीकों से निरंतर जल दोहन, दिनों दिन बढ़ रहे अवजल की मात्रा से समाप्त हो रहे जलगुण और नदी की शक्तियों की उपयोगिता पर चितंन-मनन किए बगैर गंगा निर्मलीकरण अभियान की सफलता की आशा नहीं की जा सकती। अब यदि हम निर्मलीकरण अभियान से पहले गंगा की दशा पर विचार करें तो पाते हैं कि गंगा में अवजल और गंगाजल के बीच का अनुपात छः हजार गुना से कहीं अधिक हुआ करता था। वर्ष 1984 के आसपास जब यह अनुपात घट कर दो हजार गुना हुआ तो भारत सरकार की तंद्रा भंग हुई और एक्शन प्लान वजूद में लाया गया। तकरीबन ढाई दशक से चल रहे इस एक्शन प्लान का परिणाम यह रहा कि गंगा का पानी अब स्नान योग्य नहीं रहा, आचमन की बात दूर रही। वहीं कल-कारखानों से निकलने वाले रासायनिक जल की मात्रा के दिनों-दिन बढ़ते रहने से अब गंगाजल के जहरीला होने का खतरा मंडराने लगा है।

बीएचयू के पर्यावरण विज्ञान और वनस्पति विभाग की डॉ. आशालता सिंह कहती हैं कि गंगा में रासायनिक प्रदूषण बढ़ने से बॉयो-केमिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी) बढ़ता जा रहा है। इसकी मात्रा जहां तीन मिलीग्राम प्रतिलीटर से कम होना चाहिए वहीं इसकी मात्रा औसतन 19 मिलीग्राम आंकी गई। कार्बनिक पदार्थों की बढ़ती मात्रा से घुलित आक्सीजन (डीओ) कम होता जा रहा है। जो जनजीवन के साथ ही जलजीवों के लिए भी खतरे का संकेत है। गंगा एक्शन प्लान का दुःखद पक्ष यह भी है कि एक तो जो योजनाएं संचालित हैं अथवा प्रस्तावित हैं, वे मजबूत मॉनेटरिंग के अभाव में नौ दिन चले ढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ करती नजर आ रही है। दूसरा यह कि जिस फार्मूले के तहत ट्रीटमेंट प्लांट की प्लानिंग की गई है उसके जरिए सिर्फ मलजल का ही शोधन संभव है, वह भी शतप्रतिशत नहीं। ऐसे में नदी में जगह-जगह मिल रहे कल-कारखानों के केमिकलयुक्त पानी का शोधन कैसे होगा? दरअसल गंगा एक्शन प्लान बनाने से पहले यह तय नहीं किया गया कि योजना गंगा को साफ करने की है अथवा उसके पानी को। जहिर है कि यदि पानी को केंद्र में रख योजना बनायी जा रही है तो गंगा साफ होने से रही क्योंकि पानी तो गंगा का महज एक अवयव है। वहीं यदि गंगा को सामने रख योजना बनाते हैं तो सबसे पहले इसका न्यूनतम प्रवाह तय करना होगा। फिर उसके अनुपात में जलनिकासी और उसके अनुरूप जलशोधन की योजना बनानी होगी। तभी हम अविरल-निर्मल गंगा का सपना साकार कर सकेंगे।रीता जायसवाल

लेखिका रीता जायसवाल समाजसेविका हैं तथा वाराणसी में रहकर स्‍वतंत्र लेखन करती हैं.

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