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वो लड़की नंगी दौड़ती रही, भूखे कुत्‍ते दौड़ाते रहे

नंगी लड़की : अंग्रेजों की गुलामी से मुक्‍त हुए 63 साल पूरे कर लिए हमने। कुछ दिन पहले ही आजादी की 64वीं सालगिरह मनाई है। हम हिन्दुस्तान से आगे बढ़ते हुए भारत और फिर इंडिया की गोद मे बैठकर बुलन्दियों पर पहुंचने को प्रयासरत है। पर पिछ्ले दिनों पश्चिम बंगाल के बीरभूम में जो घटना घटी, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हम वाकई आजाद हो गये है, क्‍या आजादी के बाद सबको उसका अधिकार मिल गया है या फिर हम केवल झूठी आजादी का दंभ भरते रहते है? पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में जो कुछ भी हुआ, उसने ना सिर्फ इंसानियत की सबसे बदतर तस्वीर पेश की है बल्कि आजादी पर भी सवाल खड़ा किया है। बीरभूम जिले की 17 साल की एक आदिवासी किशोरी को सरेआम नंगा करके मीलों दूर तक खदेड़ा गया। इस दौरान उस किशोरी साथ गांव के लोग सरेआम बलात्कार करने पर भी तुले थे। पूरे गांव के सामने इस घिनौने दृश्य को अंजाम देने वाले सारे दानव बहुत खुश नजर आ रहे थे और गांव के लोग भी इस कुकृत्य मे वहशियों का पूरा साथ दे रहे थे। ये कैसी आजादी?

नंगी लड़की

नंगी लड़की : अंग्रेजों की गुलामी से मुक्‍त हुए 63 साल पूरे कर लिए हमने। कुछ दिन पहले ही आजादी की 64वीं सालगिरह मनाई है। हम हिन्दुस्तान से आगे बढ़ते हुए भारत और फिर इंडिया की गोद मे बैठकर बुलन्दियों पर पहुंचने को प्रयासरत है। पर पिछ्ले दिनों पश्चिम बंगाल के बीरभूम में जो घटना घटी, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हम वाकई आजाद हो गये है, क्‍या आजादी के बाद सबको उसका अधिकार मिल गया है या फिर हम केवल झूठी आजादी का दंभ भरते रहते है? पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में जो कुछ भी हुआ, उसने ना सिर्फ इंसानियत की सबसे बदतर तस्वीर पेश की है बल्कि आजादी पर भी सवाल खड़ा किया है। बीरभूम जिले की 17 साल की एक आदिवासी किशोरी को सरेआम नंगा करके मीलों दूर तक खदेड़ा गया। इस दौरान उस किशोरी साथ गांव के लोग सरेआम बलात्कार करने पर भी तुले थे। पूरे गांव के सामने इस घिनौने दृश्य को अंजाम देने वाले सारे दानव बहुत खुश नजर आ रहे थे और गांव के लोग भी इस कुकृत्य मे वहशियों का पूरा साथ दे रहे थे। ये कैसी आजादी?

आदिवासी किशोरी हाथ जोड़कर लोगों से मिन्नते कर रही थी, गिड़गिड़ा रही थी, पर गांव के लोगों मे इस कदर वहशीपन छाया हुआ था कि वो उस आदिवासी किशोरी की कोई भी बात सुनने को तैयार नही थे। पूरा गांव इस घटना को देख रहा था…टीवी पर दिखाए गए दृश्‍य में ग्रामीण पुरुषों के साथ गांव की महिलायें भी नजर आ रही थी..और उससे भी बडा वीभत्स दृश्य तो ये था कि वहां के छोटे-छोटे बच्चे भी इस अमानवीय कृत्य के गवाह बन रहे थे।

17 साल की नग्‍न आदिवासी किशोरी अपने को निर्दोष बताते हुए बदहवास भागी जा रही थी और गांव वाले उसके शरीर पर लाठी और डंडे से प्रहार करते जा रहे थे। पूरा गांव उस किशोरी का उपहास उड़ाने मे लगा हुआ था। लड़की कसूर सिर्फ इतना था कि गांव वालों ने उसे गांव के ही किसी लड़के से बात करते हुए देख लिया था! क्या ये सही मे कोई कसूर था? इस पूरी घटना की शिकायत पुलिस में ना तो उस युवती द्वारा की गई और ना ही उसके परीजनो द्वारा। आखिर क्‍यों वे इस अमानवीय कुकृत्‍य के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाये? क्‍या यही है इस आजाद इंडिया की दास्तां से भरी हुई कहानी। सभ्यता सुव्यस्था के जन्मती है, स्वतन्त्रता के साथ बड़ी होती है और अव्यवस्था के साथ मर जाती है। शायद यह एक मरी हुई सभ्यता का सबसे बड़ा  उदाहरण देखने को मिला!

हद तो तब हो गई, जब इस पूरी घटना का एमएमएस बनाकर इसे जगह जगह दिखाया जाने लगा। ये घटना अप्रैल माह की है और इस पर पुलिसिया कार्यवाही अब जाकर शुरू हुई है। पुलिस ने रामपुर हाट सब डिवीजन से पांच लोगों को गिरफ्तार किया है, जो इस पूरे घटना के जिम्मेदार माने गये है। सबसे बड़ी बात कि इस घटना की जानकारी गांव के सभी लोगों को थी, यहां तक कि गांव के नेता भी इस बात से वाकिफ थे मगर फिर भी किसी ने इस घटना को गंभीरता से लेने का प्रयास नही किया।

कहा जाता है कि मानव इतिहास की हमारी सबसे कीमती और सबसे ज्ञान-गर्भित सामग्री केवल भारत में ही संचित है। तो देख लें! मानव इतिहास की हमारी सबसे कीमती और सबसे ज्ञान-गर्भित सामग्री अब क्या संदेश दे रही है । पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले से कई महान लोगों का जुड़ाव रहा है, जिनमें अमर्त्य सेन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, जयदेव केंदुली, चंडीदास रामी, चैतन्य देव, नित्यानंद स्वामी, ताराशंकर बंद्दोपाध्याय और काजी नजरूल इस्लाम प्रमुख है। ऐसे महान आत्माओं की भूमि पर एक अमानवीय कृत्य घंटों चलता रहा, पर किसी ने भी इसका विरोध करना उचित नही समझा।

15 अगस्त 1947 की आधी रात को अंग्रेजी चंगुल से आज़ाद हुआ भारत आज तरक्की के शिखर पर है। पर क्या इस तरक्की का मोल ऐसे चुकाना पडेगा? राष्ट्र की भावनाओं को स्वर देते हुए देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को कहा था, “ हम आज दुर्भाग्य का एक युग समाप्त कर रहे हैं और भारत अपनी दोबारा खोज आरंभ कर रहा है।” तो क्या सही मायनों मे हमने दुर्भाग्य के युग को समाप्त कर लिया है? आज कहीं न कहीं हम सब अपना मुंह छिपाते नजर आ रहे है। इस अनमोल आजादी का दुरूपयोग क्यूं?

लेखक अनिकेत प्रियदर्शी पत्रकार और ब्‍लागर हैं.

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