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व्यक्तित्व : इनसाइड स्टोरी के संपादक सुभाष सिंह

[caption id="attachment_2165" align="alignleft"]सुभाष सिंहसुभाष सिंह[/caption]पटना विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद मैं 2003 में दिल्ली आया। पिताजी चाहते थे कि मैं सिविल सेवा में जाऊं। मेरी इच्छा थी कि मैं वकालत करूं या पत्रकार बनूं। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ के लिए प्रवेश परीक्षा दी परंतु एक नंबर से पीछे रह गया। हालांकि इसी वर्ष भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढाई के लिए प्रवेश परीक्षा पास करने में सफल हो गया। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान ही ‘देवभूमि संवाद’ ज्वाइन किया। वहां छ: महीने इंटर्नशिप पर काम करता रहा।

सुभाष सिंह

सुभाष सिंहपटना विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद मैं 2003 में दिल्ली आया। पिताजी चाहते थे कि मैं सिविल सेवा में जाऊं। मेरी इच्छा थी कि मैं वकालत करूं या पत्रकार बनूं। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ के लिए प्रवेश परीक्षा दी परंतु एक नंबर से पीछे रह गया। हालांकि इसी वर्ष भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढाई के लिए प्रवेश परीक्षा पास करने में सफल हो गया। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान ही ‘देवभूमि संवाद’ ज्वाइन किया। वहां छ: महीने इंटर्नशिप पर काम करता रहा।

साथ ही जनसत्ता सहित कई अखबारों में लिखता भी रहा। शुरू से ही मन में इच्छा थी कि स्वयं ही किसी अखबार या पत्रिका का प्रकाशन करूं जिससे मैं अपनी कलम के साथ न्याय कर सकूं। यद्यपि मुझे पत्रकारिता का बहुत ज्यादा अनुभव नहीं था और ना ही मीडिया हाउस के संचालन की कोई जानकारी थी। इसी वक्त एक नई पत्रिका व इसी समूह का नया अखबार दिल्ली में लांच हुआ। इसमें मैंने एसोसिएट एडिटर के रूप में ज्वाइन किया।

वहां मैंने दो साल सेवा दी। इस दौरान कई साक्षात्कार किए। इस अखबार के एडिटर इन-चीफ डॉ. फरीद चुगताई ने खबर इनसाइड स्टोरीकरने के लिए मेरी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए खुला आकाश दिया। कार्य के दौरान दिल्ली में ब्लू लाइन बसों से हो रहे हादसों पर मैंने एक स्टिंग ऑपरेशन किया जिसे जी न्यूज पर ‘मौत का लाइसेंस’  नाम से प्रसारित किया गया। इस ऑपरेशन के बाद से ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार हेतु जितने भी सुझाव दिए, सभी दिल्ली पुलिस व दिल्ली परिवहन मंत्रालय द्वारा मान लिए गए।

स्टिंग आपरेशन के जरिए दोषी पाए गए पांच पुलिस अधिकारियों व कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया गया। परंतु इस ऑपरेशन के कई ऐसे पहलू थे जो कोर्ट से संबंधित स्टिंग के दौरान एकत्रित किए थे, उन्हे ना ही प्रसारित किया गया और ना ही प्रिंट किया गया। चूंकि इस संस्थान में पत्रकारिता के नाम पर महीने में एक-आध खबरें की जाने लगीं थी, इससे मेरी पत्रकारिता घुट-घुट कर दम तोड़ रही थी। अंतत: मैंने खुद ही अपना समाचार पत्र चलाने की सोची। इसके लिए मैंने दूरदर्शीयोजना के तहत तीन टाइटिल हिन्दी व अंग्रेजी में रजिस्टर्ड कराए- लीड इंडिया (डेली), इनसाइड स्टोरी (पाक्षिक), सेंसेक्स टाइम (पाक्षिक-बिजनेस न्यूज)।

वर्तमान में इनसाइड स्टोरी सफलतापूर्वक प्रिंट हो रहा है। इन प्रकाशनों को इनक्रेडिबल न्यूज नेटवर्क (आई.एन.एन.) के अन्तर्गत प्रकाशित किया जा रहा है। इनसाइड स्टोरी अपनी खबरों के लिए पाठकों के बीच विशेष स्थान बनाने में सफल रहा है जो हमारे लिए गर्व की बात है। इस काम में डॉ फरीद चुग़ताई जी का निर्देशन व तरूणा एस.गौड़ का योगदान हमेशा मेरी हिम्मत रहा।


‘इनसाइड स्टोरी’ के संपादक सुभाष सिंह से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

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