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शंकराचार्य : जिसने बदल दी पूर्णानदी की धारा

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : बारह साल का अध्‍ययन केवल तीन साल में पूरा कर पांच साल का बालक जब वापस घर लौटा, तो सहसा किसी को यकीन नहीं हुआ। पिता की म़त्‍यु पहले ही हो चुकी थी। घर की इकलौती संतान। मां बूढी और अशक्‍त। गांव की महिलाओं के साथ मां भी प्रात: स्‍नान और पूजा-अर्चना के लिए गांव से काफी दूर बहने वाली पूर्णा नदी तक जाती थीं। एक दिन मां रास्‍ते में बेहोश हो गयीं तो बालक का मन आर्तनाद कर उठा। एक ऐसा संकल्‍प ले लिया गया जिसे सुनकर ही रोंगटे खडे हो जाएं। उसने अपने हमउम्र दोस्‍तों को तैयार किया। मकसद था- पूर्णा नदी का मार्ग बदल कर उसे गांव तक ले आना।

कुमार सौवीर

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : बारह साल का अध्‍ययन केवल तीन साल में पूरा कर पांच साल का बालक जब वापस घर लौटा, तो सहसा किसी को यकीन नहीं हुआ। पिता की म़त्‍यु पहले ही हो चुकी थी। घर की इकलौती संतान। मां बूढी और अशक्‍त। गांव की महिलाओं के साथ मां भी प्रात: स्‍नान और पूजा-अर्चना के लिए गांव से काफी दूर बहने वाली पूर्णा नदी तक जाती थीं। एक दिन मां रास्‍ते में बेहोश हो गयीं तो बालक का मन आर्तनाद कर उठा। एक ऐसा संकल्‍प ले लिया गया जिसे सुनकर ही रोंगटे खडे हो जाएं। उसने अपने हमउम्र दोस्‍तों को तैयार किया। मकसद था- पूर्णा नदी का मार्ग बदल कर उसे गांव तक ले आना।

काम शुरू हो गया। पहले तो सबने खिल्‍ली उड़ाई लेकिन जोशीले और जुनूनी प्रयासों से पूर्णा की धारा को खिसकता देखकर पूरा गांव और युवतियां तक जुट गयीं। लट्ठों और लकड़ी के बोटों के सहारे बस एक साल के भीतर ही पूर्णानदी केरल के पुराने गांव कालडी की सीमा तक पहुंच गयी। इतना ही नहीं, इस बालकनुमा योगी ने अगले 16 बरसों में भारत के आधुनिक भारत की सीमारेखा खींच दी। हां, आधार बनाया धार्मिक और वैदिक एकता के साथ ही आम आदमी की भावनाओं को। देश के चारों कोनों पर उसने जिस धर्मपीठों की स्‍थापना की, वह भारतीय जनमानस में आज भी अगाध श्रद्धा का केंद्र है।

जी हां, आपने सही समझा। यहां बात हो रही है उस महान विभूति की जिसने उम्र तो महज 32 साल पायी, लेकिन आने वाले संततियां हमेशा-हमेशा सिर-माथे पर लिये रहेंगी आचार्य शंकर को, जिसे शंकराचार्य के नाम से पहचाना जाता है। दरअसल, कालडी गांव और वहां नदी पार एक शिवमंदिर तक श्रद्धालुओं को पहुंचाने का काम करने वाले ब्राह्मण समुदाय को नम्‍बूदिरी कहा जाता है। शंकराचार्य इसी समुदाय से थे, लेकिन उनके पिता शिवगुरू ज्‍योतिष-वेद व्‍याख्‍याता थे। किंवदंती के अनुसार निसंतान रहने पर उन्‍होंने शिवाला में आराधना शुरू कर दी। भोलेनाथ ने दर्शन देकर पूछा-अल्‍पजीवी यशस्‍वी बच्‍चा चाहिए या दीर्घजीवी मूर्ख। जवाब दिया- यशस्‍वी। भोलेनाथ मुस्‍कुराये और और कुछ समय बाद शिवगुरू का आंगन किलकारियों से गूंज उठा। हालांकि शंकर के जन्‍म की तारीख को लेकर लोग एकराय नहीं हैं। किसी के मुताबिक उनका जन्‍म सन 788 ईस्‍वी में हुआ था, जबकि कोई सन 812 बताता है। बहरहाल, बालक के जन्‍म का समय था देवांश-काल, माथे पर चक्र, ललाट पर तीसरे नेत्र-सा चिन्‍ह और कांधे पर त्रिशूल जैसा निशान देखकर लोगों को लगा कि शायद शंकर ही पधारे हैं। बच्‍चे का नाम भी शंकर रखा गया।

इसके बाद से ही शंकर ने मां और घर छोडकर संन्‍यास लिया और पूरे आर्यावर्त का पैदल ही चक्‍कर लगा आये। नया सोचने की लालसा थी कि खबर मिली कि नर्मदा की गुफा में संत गोविंदपाद लम्‍बी समाधि में हैं। वहीं पहुंच गये। समाधि टूटी और गोविंदपाद ने सलाह दी कि व्‍यासरचित ब्रह्मसूत्र पर अद्धैतपरक-भाष्‍य लिखकर विश्‍वकल्‍याण करो। शंकर के प्रयास इतने अनूठे थे कि वे चमत्‍कार माने-जाने लगे। एक बार भारी वर्षा के चलते नर्मदा में तो बाढ़ आयी मगर एक पहाड़ के पीछे सूखे की हालत थी। नर्मदा तबाही मचाने वाली थी। शंकर को पता चला कि ऋष्‍यऋंग नामक महात्‍मा कमंडल जैसी गुफा में रहते हैं, जिसकी चट्टानें बहुत पतली हैं। फिर क्‍या था। शंकर ग्रामीणों और अपने शिष्‍यों के साथ सीधे गुफा पहुंचे और चट्टान तोड़ दी। पानी सूखे इलाके की ओर निकल गया। फिर बजा डंका।

शंकर ने अब गुरू की आज्ञा लेकर भारत भ्रमण शुरू किया, लेकिन काशी में पहला झटका लगा। काशी की गली से गुजरते हुए शंकर ने देखा कि एक चांडाल चार कुत्‍तों के साथ रास्‍ता रोके हुए है। शंकर ने विनम्रतापूर्वक कहा कि आप एक ओर हो जाएं ताकि मैं विश्‍वनाथ भगवान के दर्शन करने जा सकूं। चांडाल ने शुद्ध संस्‍कृत में प्रतिकार किया :- ओ संन्‍यासी। तुम हटाना किसे चाहते हो। इस चांडाल के शरीर को या इसकी आत्‍मा को। ब्रह्म सबमें है, फिर मुझमें भी तो है।

शंकर स्‍तब्‍ध। साफ लगा कि यह चांडाल नहीं, साक्षात शिवशंकर हैं। झुककर प्रणाम किया, गुरू बनाया और मनीषा-पंचक रच दिया। बस जाति दोष खत्‍म। एक गरीब महिला के यहां सूखा आंवला खाया लेकिन उसकी भरपाई के लिए एक बडे़ सेठ से भिक्षा लेने की शर्त के तहत उस गरीब महिला के घर सोने के आंवलों की बारिश करवा दी।

निकल पडे बद्रीनाथ की ओर। ऋषिकेश में महिषमर्दिनी, चामुंडा, कंसमर्दिनी, राजराजेश्‍वरी आदि मंदिरों में कुछ तांत्रिकों को समझा कर नरबलि परंपरा खत्‍म करायी। बद्रीनाथ में चीनी आक्रमणकारियों द्वारा फेंके गये देवविग्रह को खोजकर स्‍थापित कराया। साथ ही व्‍यवस्‍था की कि देश की सांस्‍कृतिक एकता के लिए उत्‍तर के मंदिरों में दक्षिण भारतीय और वहां के मंदिरों में उत्‍तर भारतीय पूजा-अर्चकों को लगाया जाए। केदारनाथ में गर्मजल का सोता खोजा। उत्‍तराखंड यात्रा में उन्‍होंने हर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। माहिष्‍मति नगरी के शास्‍त्रार्थ में मंडन मिश्र को परास्‍त कर उनके गुरू भी बने। इसी दौरान पुरी में गोवर्धनपीठ, द्धारिका में शारदा मठ, दक्षिण में ऋंगेरी मठ तथ उत्‍तर में ज्‍योतिर्मठ की स्‍थापना की।

अचानक ही एक दिन आभास हुआ कि मां का अंत निकट है। कालडी लौटे। स्‍थानीय पुरोहितों ने विरोध किया कि संन्‍यासी ना तो घर लौट सकता है और ना ही अन्‍त्‍येष्टि। मगर लाख विरोध के बावजूद मां का अंतिम संस्‍कार किया। बाद में रामेश्‍वरम में कापालिक क्रकच के कब्‍जे से तांत्रिक-भोग के लिए अपहृत सैकड़ों महिलाओं को मुक्‍त कराया। पुरी और द्धारिका में पीठें बनायीं। सिंध और गांधार तक धर्मध्‍वजा फहरायी और फिर कामाख्‍या यानी आसाम की ओर बढे़। वहां नरबलिकर्ताओं के नेता अभिनव गुप्‍त को अपनी करूणा से पराजित किया, वह उनका शिष्‍य भी बन गया, लेकिन ऐसा विष भोजन में मिलाया जिससे शंकराचार्य को भगंदर हो गया। लेकिन वे शांत रहे। नेपाल में बौद्ध और शैवों के बीच के द्वंद्व को खत्‍म कराया और कैलाश मानसरोवर, बद्रीनाथ होते हुए एक बार फिर केदारनाथ पहुंचे। यह कमाल ही है कि भज-गोविंदम जैसा गीत लिखने और विभिन्‍न मूर्तियों मंदिरों को संवारने वाला आचार्यशंकर जीवन भर अद्धैत का ही उपासक रहा। उदारता इतनी कि अभिनव गुप्‍त को केदारनाथ में प्राण-त्‍यागने तक अपने ही साथ रखा।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

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