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श्रद्धा व आस्था के बीच पनपी विकृतियों के खिलाफ खड़ा हुए युवा

उत्सव हमारी संस्कृति के प्रतीक है. यह हमारी आंतरिक खुशी, प्रसन्नता की अभिव्यक्ति का माध्यम है. ये उत्सव हमें एकजुटता का संदेश देते हैं. जब बात धर्म की होती है तो फिर धर्म हमें सामाजिक तौर पर सुसंस्कृत, शिक्षित, आदर्श आचरण और श्रेष्ठ मानव बनाने का कार्य करता है. धर्म का यह स्वरूप यदि धार्मिक उत्सव में परिलक्षित होता है तो यह हमारी संस्कृति की परंपरा का निर्वहन करते हुए समाज को धर्म के प्रति आसक्त करने का बेहतर माध्यम माना जाता है. आधुनिक दौर का समावेश और समय के साथ सामाजिक बदलाव का असर दुर्भाग्यवश धार्मिक उत्सवों पर भी पड़ा है. धार्मिक उत्सवों में विकृतियों का प्रकोप नित नये स्वरूप में बढ़ता ही जा रहा है. इस प्रकोप से हमारी संस्कृति, समाज को क्षति पहुंच रही है.

उत्सव हमारी संस्कृति के प्रतीक है. यह हमारी आंतरिक खुशी, प्रसन्नता की अभिव्यक्ति का माध्यम है. ये उत्सव हमें एकजुटता का संदेश देते हैं. जब बात धर्म की होती है तो फिर धर्म हमें सामाजिक तौर पर सुसंस्कृत, शिक्षित, आदर्श आचरण और श्रेष्ठ मानव बनाने का कार्य करता है. धर्म का यह स्वरूप यदि धार्मिक उत्सव में परिलक्षित होता है तो यह हमारी संस्कृति की परंपरा का निर्वहन करते हुए समाज को धर्म के प्रति आसक्त करने का बेहतर माध्यम माना जाता है. आधुनिक दौर का समावेश और समय के साथ सामाजिक बदलाव का असर दुर्भाग्यवश धार्मिक उत्सवों पर भी पड़ा है. धार्मिक उत्सवों में विकृतियों का प्रकोप नित नये स्वरूप में बढ़ता ही जा रहा है. इस प्रकोप से हमारी संस्कृति, समाज को क्षति पहुंच रही है.

समय के बदलते दौर में धार्मिक उत्सव अब धर्मविहीन होकर एक तमाशे की श्रेणी में देखे जाने लगे है. आधुनिक पीढ़ी द्वारा उत्सवों को अपने अंदाज में मनाने से धार्मिक आस्था और ईश्वर के प्रति भक्ति की बजाय फूहड़ता का भारी प्रदर्शन देखने को मिलता है. नगरों, कस्बों में ही नहीं अब गांवों में भी ये विकृतियां पहुंच रही है. जो हमारे धर्म, संस्कृति पर प्रश्र चिन्ह खड़ा करती है. झांकियों के नाम पर किसी भी गली, मोहल्ले में टेंट, तंबू लगाकर प्रतिमाओं की स्थापना के जरिये अपने वर्चस्व को प्रदर्शित करने का माध्यम बना लेना, उत्सव के दौरान आधुनिक फिल्मी गानों पर कान फोडू संगीत का सायंकाल से देर रात्रि तक प्रसारण, बिजली, माईक लगाने में प्रतिस्पर्धा करना, डीजे जैसे ध्वनिविस्तारक यंत्रों का बहुतायत प्रयोग कर उससे अपना प्रभुत्व स्थापित करने की चेष्टा करना, चंदा वसूली में दादागिरी पर उतर आना, राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर अधिकारियों, कर्मचारियों और व्यापारियों पर दबाव बनाना, यातायात को बाधित करने में कोई संकोच नहीं करना जैसे कई मामले यह साबित करते हैं कि इन उत्सवों को मनाने के तरीकों पर समाज को पुनर्विचार करने की जरूरत है. धार्मिक उत्सव को प्रभावी तौर पर मनाना हमारा न केवल धर्म है बल्कि कर्तव्य भी है. किंतु इन उत्सवों में धर्म का प्रभाव दिखाई देगा तो ये उत्सव समाज के लिये, हमारी संस्कृति के लिये काफी लाभदायक सिद्ध होंगे.

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इन विकृतियों का झंडाबरदार अगर कोई है तो वह युवा ही है. किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि जब-जब भी इस देश का युवा खड़ा हुआ तब-तब देश में परिर्वतन का कारण बना है. चाहे फिर वह अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला देने वाला मामला हो या फिर कोई सामाजिक परिर्वतन की बात हो. युवाओं ने अपनी शक्ति, समझ से देश का मार्ग प्रशस्त किया है. तो फिर वह इन विकृतियों पर मजबूत प्रहार भी कर सकता है. धार्मिक उत्सवों में घर करती जा रही इन विकृतियों के विरुद्ध युवाओं ने सिंहनाद कर दिया तो निश्चित तौर पर परिस्थितियों में परिर्वतन संभव है. म.प्र. के ब्यावरा नगर के कुछ युवाओं ने इस दिशा में अपना मजबूत ”एक कदम” आगे बढ़ाया है. इन युवाओं ने नवरात्रि उत्सव के पूर्व नगर के सभी प्रबुद्धजनों, जनप्रतिनिधियों तथा झांकी संचालकों की एक सामूहिक बैठक का आयोजन किया. अधिकतर युवाओं की उपस्थिति वाली इस बैठक अप्रत्याशित परिणाम सामने आये है. इसमें झांकी संचालकों ने समझदारी का परिचय दिया और उन्होंने स्वयं की आचार संहिता बनाने का भी ऐलान किया. जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि वे पर्यावरण, ध्वनि प्रदूषण, यातायात, सार्वजनिक धन के अपव्यय जैसी समस्याओं पर स्वयं अंकुश लगायेंगे.

इसके दो दिन बाद ब्यावरा नगर में ही सुभाष चौक मित्र मण्डली के दर्जन भर से अधिक युवाओं ने एक अनुकरणीय निर्णय लिया. एकमत हो उन्होंने कहा कि वे प्रतिवर्ष नवरात्रि महोत्सव के दौरान प्रतिदिन बांटी जाने वाली प्रसादी में खर्च होने वाले करीब 50 हजार रूपये से इस वर्ष मोहल्ले में स्थित शा. कन्या माध्यमिक विद्यालय की सभी कन्याओं को ऊनी वस्त्र बांटेंगे. आज का युवा अब किसी थोपी गई अनुचित परम्परा को अपनाने की बजाय अपने रास्ते स्वयं तय करना जानता है. जरूरत है उसके इस पौरुष को जगाने की. युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाने का दायित्व समाज के प्रबुद्धजनों का है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले कल में नई पीढ़ी धार्मिक उत्सवों के इस विकृत स्वरूप के चलते दिशा भ्रम में पड़ जायेगी.

लेखक गोविन्‍द बड़ोने व्‍यावरा में नवभारत के ब्‍यूरोचीफ हैं.

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