महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा द्वारा अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर और फ़ैज़ की जन्मशताब्दी पर आयोजित कार्यक्रमों की श्रृंखला में ‘नागार्जुन पर एकाग्र’ प्रथम सत्र प्रारम्भ हुआ. जिसमें विषय-प्रवर्तन करते हुए प्रसिद्ध आलोचक विजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा कि नागार्जुन संघर्ष व विद्रोह के कवि हैं. उनका यायावरी जीवन उनके संघर्षशील जीवट का प्रमाण है. कई बार वे अतिरेक के कवि लगते हैं. वे नक्सलवाद और सम्पूर्ण क्रान्ति जैसी अराजक अवधारणा के कवि लगते हैं. अवधेश मिश्र ने नागार्जुन के आमजन से जुड़ाव व संघर्षशीलता की प्रवृत्ति को रेखांकित किया.
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. गोपेश्वर सिंह ने कहा कि वे अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखने वाले पारदर्शी कवि हैं, वे दुविधा के कवि नहीं हैं. नागार्जुन ने शीत युद्ध की 1950-60 की आलोचना की, जब दुनिया दो खेमों में है, उस समय आलोचना भी दो खेमों में हैं, साहित्य में यह वही दौर है जिस काल के कवियों की हम यहां बात कर रहे हैं. आलोचना की दृष्टि से उस दौर का संघर्ष द्वन्द्व का संघर्ष है. तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद कोई एक राय बनाई नहीं जा सकती. उन्होंने सम्भवत: व्यक्तियों पर केन्द्रित सर्वाधिक कविताएं लिखीं. यदि हिन्दी कविता की पूरी परम्परा महामानवों की परम्परा है तब तो मुझे लगता है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास को दुबारा पढ़ा जाना चाहिए.
हिन्दी आलोचना की दिक्कतों पर प्रो. गोपेश्वर ने खुल कर विमर्श किया. उन्होंने कहा कि क्या कविता के कोई सार्वभौमिक प्रतिमान हो सकते हैं? हर जगह की अपनी मौलिक व भिन्न कविता है. उसके प्रतिमान भी उतने ही भिन्न हैं. कविता की अपनी स्थानीयता है और कविता की अपनी जातीयता है. मुझे लगता है कविता के प्रतिमानों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है. 1940 के बाद की अर्थात प्रयोगवाद के बाद की कविता पर पुनर्विचार की अत्यन्त महती आवश्यकता है. असल विवाद अज्ञेय के एक सुचिन्तत लेख के बाद प्रारम्भ हुआ, जिसमें उन्होंने ‘पाठक के एकान्त’ की बात कही. और मेरे विचार से “पाठक के एकान्त की कविता” होना ही वस्तुत: कविता का निकष है.
प्रो. शम्भुनाथ ने अपने सम्बोधन में कहा कि भले ही ऐसे आयोजन साहित्यिक कर्मकांड कहे जाते हों किन्तु ये ही हमें ऐसे अवसर देते हैं कि हम उन रचनाकरों के पाठ को पुन: देखें और पढ़ें, नई तरह से अपनी धारणाओं का पुनर्गठन कर सकें. एक समय था जब आलोचना इन चारों कवियों को आर-पार करके देखती रही या बांट कर देखती रही, सामाजिकता की बात को लेकर अलगाते रहे. किन्तु आज भी क्या इन चारों कवियों के मूल्यांकन का कोई सामान्य तत्व नहीं हो सकता है? अनुभव की स्वाधीनता चारों कवियों में सामान्य तत्व है. इन चारों कवियों ने अनुभव की सामुदायिक किलेबन्दी स्वीकार नहीं की. नागार्जुन के काव्य में जेठ का ताप और पूर्णिमा का सौन्दर्य है. लेखक के स्वाभिमान के सन्दर्भ में उन्होंने नागार्जुन द्वारा इन्दिरा गांधी द्वारा प्रदत्त सम्मान को ग्रहण करने के प्रसंग को नागार्जुन के शब्दों में सुनाया, जिस पर सभागार तालियों व ठहाकों से भर उठा. उन्होंने कहा कि नागार्जुन किसानचित्त के कवि हैं, नागार्जुन का साहित्य हमारे लिए अन्न है अत: नागार्जुन अन्न के कवि हैं.
प्रो. नीरज सिंह ने मंच पर बैठे ‘समूचे बिहार’ को सम्बोधित करने के अपने वाक्य द्वारा वातावरण को सहज व हास्यपूर्ण बनाते हुए अपने वक्तव्य को प्रारम्भ किया. उन्होंने कहा कि सर्वप्रथम मुझे गर्व है कि नागार्जुन के सान्निध्य का सौभाग्य मिला. भारतीय जनता की सम्पूर्ण मुक्ति के कवि हैं नागार्जुन. उनका स्वप्न था कि एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहां मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की कोई सम्भावना नहीं.
डॉ. राम आह्लाद चौधरी व उषाकिरण खान ने भी बाबा के रचनाकर्म के विविध पक्षों पर अपने विचार प्रस्तुत किए. कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए खगेन्द्र ठाकुर ने नागार्जुन के जीवन प्रसंगों को किन्हीं नए अर्थों में खोलते हुए उनकी सहज किन्तु विशिष्ट जीवनशैली का मर्म सुनाया, साथ ही कलकत्ता के कुछ प्रसंगों को नई अर्थवत्ता दी. सत्र का संचालन कॄष्ण कुमार सिंह ने किया.
डा. कविता वाचक्नवी की रिपोर्ट.

