बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकले… कुछ इसी तरह के भावार्थ जैसे विचार मेरे जेहन में भी आए, जब बुद्धू बक्से की ब्रेकिंग पट्टी पर यह खबर चमकी कि बंगाल टाइगर सौरभ गांगुली ने क्रिकेट की सभी विधाओं से आखिरकार संन्यास ले ही लिया। महज एक दिन पुरानी बात थी, जब टीवी के पर्दे पर प्रसारित फिल्म फेयर अवार्ड के दौरान हम सबके फेवरिट दादा का मंच से मजाक बनाया गया। अवार्ड समारोह को होस्ट कर रही थी यंगिस्तान की टीम, रणवीर कपूर और इमरान खान।
इमरान “दबंग” के सलमान की नकल कर रहे थे और रणवीर “माई नेम इज खान” के शाहरुख की। हद तो तब हो गई जब “आई एम वेरी स्मार्ट” वाले शाहरुख के डायलाग पर दबंग के वेश वाले इमरान ने टिप्पणी कर दी- इतने ही स्मार्ट हो तो आपीएल में सौरभ गांगुली को क्यों नहीं लिया। कहना न होगा कि दर्शक दीर्घा में बैठे कुछ लोग ठहाके लगाकर हंस पड़े, कुछ के होठों पर मुस्कान तैर गई और जब कैमरे ने शाहरुख के मुखमंडल पर जूम किया, तो अजीबोगरीब तरह के भाव उनके चेहरे पर तैर रहे थे। ये तो शाहरूख ही जानें कि उनके मन में उस वक्त क्या चल रहा था लेकिन घटना अभूतपूर्व थी।
मेरी समझ से भारत में दो ही चीजें सबसे ज्यादा पापुलर हैं, पहला बालीवुड और दूसरा क्रिकेट और यह पहली बार था कि बालीवुड के एक बड़े अवार्ड समारोह के मंच से भारतीय क्रिकेट को एक नई दिशा देने वाले हीरो की जगहंसाई हो रही थी। हालांकि यह सब लाफ्टर यानी कि समारोह में हास्य का रंग भरने के लिए किया जा रहा था लेकिन यह मजाक ज्यादा ही भद्दा था। और जब अगले ही दिन दादा के क्रिकेट की सभी विधाओं से रिटायरमेंट की खबर मिली तो लगा जैसे भारतीय क्रिकेट में सबकुछ थोड़ी देर के लिए थम सा गया हो… यह सोचने लगा कि क्या दादा ने भी टीवी पर अपना मजाक बनने-बनाने का वह ड्रामा देखा होगा…????
मैं कोई डाई हार्ड सौरभ फैन नहीं हूं… न ही क्रिकेट का कीड़ा हूं… हां बचपन नें थोड़ी-बहुत क्रिकेट खेली है और कुछ साल पहले तक बड़े चाव से क्रिकेट देखा करता था… लेकिन जिन परिस्थितियों में दादा ने अपने चयनित और भारत में खेलों के बाप कहे जाने वाले गेम यानी क्रिकेट से संन्यास लिया है, उससे सभी क्रिकेट प्रेमियों को दुख जरूर पहुंचा होगा। ऊपर मैंने चयनित शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया है कि क्रिकेट दादा की स्वाभाविक पसंद नहीं था। जिस राज्य-शहर में वे पैदा हुए, वहां फुटबाल ही सबसे बड़ा धर्म है और दादा का पहला क्रश भी फुटबाल से ही हुआ। अपने स्कूल की फुटबाल टीम के लिए वे चार सालों तक खेलते भी रहे। दादा को क्रिकेट में लेकर आए उनके बड़े भाई स्नेहाशीष और बंगाल टाइगर ने फुटबाल की जगह क्रिकेट को अपने जीवन के बेहतरीन साल देने के लिए चुन लिया। यह जानना भी बहुत रोचक है कि दादा मूलत दाएं हाथ के बल्लेबाज थे लेकिन बाएं हाथ से बल्लेबाजी इसलिए करने लगे ताकि अपने बड़े भाई की खेल सामग्रियों का उपयोग कर सकें और फिर बाएं हाथ की बल्लेबाजी ही उनकी यूएसपी बनी।
दादा का इस तरह से जाना इसलिए भी खलता है कि आज वर्ल्ड कप जीतने के लिए माही की जिस सेना से हर भारतीय आस लगाए बैठा हैं, उसके कई युद्धवीरो को दादा ने ही मौका दिया, सजाया-संवारा-तराशा और देश के लिए गेम जीतने की किलर इंस्टिक्ट पैदा की। 2002 में खेले गए नैटवेस्ट ट्राफी के उस दृश्य को कोई कैसे भूल सकता है जब क्रिकेट के मक्का कहे जाने वाले लार्ड्स के मैदान में इंग्लैंड पर जीत के बाद दादा ने अपनी टी-शर्ट निकाल कर हवा में लहराई थी। ऐसा पहले किसी भारतीय खिलाड़ी-कप्तान ने नहीं किया था। यह दादा का ब्रितानी खिलाड़ी फ्लिंटाफ को जवाब था, जब फ्लिंटाफ ने भारत के वानखेड़े स्टेडियम में अपनी टीशर्ट लहराकर जीत की खुशी मनाई थी। मुझे यह बात कभी समझ में नहीं आई कि जिस क्रिकेट के लिए दादा हमेशा पैशनेट रहे, मैदान में किलर इंस्टिंक्ट दिखाई, उसे उनके गुस्सैल (अरोगेंट) होने से जोड़ दिया गया। यह उनकी किलर इंस्टिंक्ट और फाइटिंग स्पिरिट का ही कमाल है कि भारतीय टीम से ड्राप होने के बाद उन्होने फिर से भारतीय टीम में वापसी की थी और अच्छा प्रदर्शन किया था।
सो जो भाई-बंधु अब यह कहते सुने जा रहे हैं कि दादा को तो बहुत पहले ही रिटायरमेंट ले लेना चाहिए था, उनसे मैं यही कहूंगा कि टाइगर कभी बूढ़ा नहीं होता। यह दादा का सेल्फ कांफिडेंस ही था कि इस बार आईपीएल में उन्होने अपनी बेस प्राइस बढ़ा दी थी लेकिन अफसोस इस बात का है कि रुपयों की मंडी में देश के इस हीरे को कोई कद्रदान नहीं मिला। यह एक खिलाड़ी ही बेहतर बता सकता है कि मानसिक और शारीरिक रूप से उसे कब रिटायरमेंट लेना चाहिए। अब सचिन तेंदुलकर को ही ले लीजिए। उन्हें भी चोटिल और आउट आफ फार्म होने पर कई बार आलोचकों ने रिटायर होने की सलाह दे डाली लेकिन सचिन ने कभी उनकी परवाह नहीं की। सो कोई अचरज नहीं कि उम्र के इस पड़ाव में भी वे नए कीर्तिमान बनाते चले जा रहे हैं। दादा ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से रिटायरमेंट जरूर ले लिया था लेकिन आईपीएल में वे खेलना चाहते थे क्योंकि कोलकाता नाइट राइडर्स से उनका भावनात्मक लगाव था। ये इस बात का भी सबूत है कि वे अब भी खुद को क्रिकेट खेलने के लिए पूरी तरह फिट समझ रहे थे…।
यह कोई अचरज नहीं कि मशहूर पत्रिका विजडन ने दादा को विश्व के सर्वकालिक एकदिवसीय महान बल्लेबाजों में छठे स्थान पर रखा है। इस लिस्ट में सचिन तेंदुलकर क्रमश दूसरे और ब्रायन लारा तीसरे पायदान पर हैं। यह भी अजब संयोग है कि इस बार आईपीएल की मंडी में महान बल्लेबाज लारा पर बोली नहीं लग पाई लेकिन लारा इससे आहत नहीं हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने उसे हल्के-फुल्के अंदाज में हवा में उड़ा दिया। मेरे ख्याल से उनके देश में इसे लेकर टीका-टिप्पणी भी नहीं हुई। लेकिन लगता है कि अपने दादा आहत हैं। आईपीएल में बोली न लगने के कारण नहीं, इसके बाद अपने देशवासियों द्वारा जिस तरह उनका मजाक उड़ाया गया-उड़ाया जा रहा है, व्यंग्य वाण चलाए जा रहे है, उसने बंगाल टाइगर के दिल को बुरी तरह छलनी कर दिया। और यही इस देश का दुर्भाग्य है…हमें अपने हीरो का सम्मान करना नहीं आता….!!!
तभी तो मशहूर पत्रिका टाइम, महात्मा गांधी को दुनिया के सर्वकालिक 25 महान व्यक्तियों में पहला स्थान देती है लेकिन हमारे अपने ही देश में महाराष्ट्र सरकार की ओर से छुट्टियों की जो लिस्ट निकाली जाती गई है उसमें गांधी जयंती और शहीद दिवस यानी 30 जनवरी को इस लिस्ट में शुमार नहीं किया जाता। एक और उदाहरण देता हूं। भारतीय रेसलर सुशील कुमार जब वर्ल्ड रेसलिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले भारतीय रेसलर बने तो वतन वापसी पर तत्कालीन केंद्रीय खेल मंत्री एम एस गिल कुश्ती की दुनिया के इस नए-नवेले शहजादे के साथ दिल्ली में फोटो शूट करना चाहते थे। इसी दौरान जब सुशील के कोच सतपाल, जिनकी उपलब्धियों के लिए सरकार उन्हें द्रोणाचार्य अवार्ड भी दे चुकी है, उनके साथ फ्रेम में आ गए तो गिल साहब को गुस्सा आ गया और उन्होंने अपने हाथ से “धक्का” देते हुए सतपालजी को फ्रेम से बाहर कर दिया। बाद में सुशील और सतपालजी दोनों ने कहा कि इससे वे दोनों सदमे में हैं।
यह सुशील और उसके गुरू को भारत के खेल मंत्री की तरफ से दिया गया उपहार था…। हमारे यहां कहा गया है कि जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयिस अर्थात जन्म देने वाली माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है और जो लोग विभिन्न क्षेत्रों में अपने कार्यों-उपलब्धियों से देश का नाम रोशन करते हैं, उन्हें बेइज्जत होता देख आखिर हम क्यों खामोश रह जाते हैं??? क्या हमें एक और अशोक, अकबर और गांधी का इंतजार है??..सो किसी ने ठीक ही कहा है कि जो राष्ट्र-राज्य अपने हीरो का सम्मान नहीं करता, उसका काल भी सम्मान नहीं करता।
((नोट- मेरे ये विचार उस समय के हैं, जब क्रिकेट की सभी विधाओं से सौरभ के रिटायरमेंट की खबर आई थी। हालांकि कुछ घंटों बाद सौरभ ने सफाई दी कि अगर मौका मिलता है तो आईपीएल और घरेलू क्रिकेट में वह जरूर खेलेंगे। उन्हें शुभकामनाएं।))
लेखक नदीम अख्तर बहुमुखी प्रतिभा के धनी पत्रकार हैं और न्यूज मीडिया में प्रिंट, टीवी, रेडियो तथा वेब सभी विधाओं में काम कर चुके हैं। आजकल न्यूज 24 चैनल में बतौर सीनियर प्रोड्यूर काम कर रहे हैं। नदीम का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं– अयोध्या : किसकी हार, किसकी जीत? और लेकिन अक्षय जी मेरे लिए खबर नहीं थे

