Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

मीडिया मंथन

संदीपजी खुद समझिए और वीरेंद्रजी को भी समझाइए गांधी-तिलक ने बनियागिरी नहीं की

मजीठिया वेज की रिपोर्ट पर देश के एक बड़े अखबार प्रतिष्ठान दैनिक जागरण का विधवा प्रलाप देखने लायक है। समूह मालिकानों के पेट में उठ रहे मरोड़ का दर्द बाहर छलकने लगा है। नंबर वन का तमगा लगाकर इतराने वाले अखबार के मालिकान सरकार से नंबर वन कैटेगरी की सुविधाएं व छूट तो लगातार बटोरते हैं पर कर्मचारियों को थर्ड क्लास का वेतन, सुविधाएं देने में इनकी नानी काहे को मरती है। दैनिक जागरण ने 21 जून को संपादकीय पेज पर मुख्य फीचर लिया है। जागरण समूह के कार्यकारी अध्यक्ष संदीप गुप्ता ने इसमें एक पक्षीय तर्क और अनाप-शनाप उदाहरण देकर न सिर्फ एक नई बहस को जन्म दिया है बल्कि अपनी दोगली नीयत को जगजाहिर भी कर दिया है।

मजीठिया वेज की रिपोर्ट पर देश के एक बड़े अखबार प्रतिष्ठान दैनिक जागरण का विधवा प्रलाप देखने लायक है। समूह मालिकानों के पेट में उठ रहे मरोड़ का दर्द बाहर छलकने लगा है। नंबर वन का तमगा लगाकर इतराने वाले अखबार के मालिकान सरकार से नंबर वन कैटेगरी की सुविधाएं व छूट तो लगातार बटोरते हैं पर कर्मचारियों को थर्ड क्लास का वेतन, सुविधाएं देने में इनकी नानी काहे को मरती है। दैनिक जागरण ने 21 जून को संपादकीय पेज पर मुख्य फीचर लिया है। जागरण समूह के कार्यकारी अध्यक्ष संदीप गुप्ता ने इसमें एक पक्षीय तर्क और अनाप-शनाप उदाहरण देकर न सिर्फ एक नई बहस को जन्म दिया है बल्कि अपनी दोगली नीयत को जगजाहिर भी कर दिया है।

अखबारों की आजादी पर आघात शीर्षक से प्रकाशित लेख के शुरुआत की लाइनें हैं- देश की आजादी के लिए लोकमान्य तिलक और गांधीजी ने भी अखबार निकाला था। देश तो आजाद हो गया लेकिन सत्तातंत्र अखबारों की आजादी नहीं पचा पा रहा है। इसके आगे की लाइनें तो और भी धूर्तताभरी हैं- प्रेस को कथित चौथे स्तम्भ का दर्जा देने वाले सत्तातंत्र का यह प्रयास क्या लोकतंत्र को कमजोर करने वाला नहीं माना जाना चाहिए? यह सवाल संदीप गुप्ता ने लेख के माध्यम से उठाए हैं।

जगजाहिर है कि बदलते हालात ने न सिर्फ पत्रकारिता को मीडिया में तब्दील किया बल्कि महाजनी घरानों में कैद कर बड़ी होशियारी के साथ उसे प्रोफेशन में ढाल दिया गया। सेठाश्रयी पत्रकारिता का यह खेल बड़े सुनियोजित तरीके से किया गया। पहले जिन गिरहकटों के खिलाफ मीडिया आवाज उठाता था अब वही मीडिया इन साहूकारों की लौंडीचेरिया बनकर रह गयी है। कारपोरेट और पैकेज ने बाकी की कोर कसर पूरी कर दी। थोड़ा पैसा और सुविधाएं दिखाकर पत्रकार बिरादरी को बधिया बना दिया गया। थोड़ा पारिश्रमिक बढ़ाकर दूसरे संस्थानों से तोड़ लो कुछ दिनों के बाद उन्हें छंटनी के नाम पर बेरोजगार कर दो। हालत इस कदर बिगड़ी की मैनेजर बेस्ड मीडिया लंगड़ी हो गई है।

लोकतंत्र और आजादी का रुदन करने वाले संदीपजी, राम राम का जाप तो कालनेमि ने भी किया था पर हनुमानजी और कालनेमि के राम नाम रटने में नीति और नीयत दोनों का फर्क था। जान लीजिए कि केवल शब्दों की जुगाली करने भर से लोकतंत्र नहीं चलेगा और ना ही नैतिकता बचेगी। गांधी और तिलक की दुहाई देने का अधिकार कम से कम उनको तो नहीं रह जाता जो कथनी-करनी में कोई फर्क नहीं रख पाते। अपनी करतूत को नाजायज गर्भ की तरह छिपाने की कोशिश करते रहते हैं। सूप के बजाय जब चलनी भी नैतिकता की दुहाई देने लगे तो सब कुछ बंटाधार ही समझो।

गांधी और तिलक ने अखबारों में कभी बनियागीरी नहीं की। पेड न्यूज छापकर पाठकों की आंखों में धूल नहीं झोंका। सौदेबाजी कर राज्यसभा में भी नहीं पहुंचे। दिन-रात दस-बारह घंटे खबरों से जूझने वाले रिपोर्टर और डेस्क कर्मचारियों की तुलना भी लेख में किया तो प्राइमरी के उन टीचरों से जो महज डेढ़-दो किमी दूर स्कूलों में दिन में दस से चार बजे के बीच चार-पांच घंटे पढ़ाने, कम से कम तीन महीने अवकाश, बीस-पच्चीस हजार रुपए की पगार और तमाम तरह के भत्ते बटोरते हैं। प्राइमरी के अध्यापकों के बजाय डिग्री कालेज या विश्वविद्यालय के प्रोफसरों से तुलना की जाती तब भी थोड़ा संतोष होता।

लेख के चौथे कालम में लिखा गया है- सत्ता में बैठे लोग एक तरफ प्रेस की आजादी का दम्भ भरते हैं और दूसरी ओर पत्रकारों के जेबी संगठनों को बढ़ावा देते हैं। बड़े भाई संदीपजी, प्रेस की किस आजादी की बात लेख में कर रहे हैं। आप भी जानिए और वाराणसी में वीरेंद्रजी को भी समझाइए कि सरकार से मिलने वाली आजादी का मतलब केवल मालिकानों के कोटा, परमिट, कारखाने, कोठी और तमाम तरह की छूट ही नहीं होती। सुविधाओं के नाम पर करोड़ों अरबों के महंगे दर्जनों भूखण्डों को महज कुछ सौ रुपए के लीज में लेना लोकतंत्र और छूट के नाम पर धूर्तताभरा खेल नहीं तो और क्या है?

महाजनी पत्रकारिता के इस कलियुगी कलिकाल में इसे दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि एक तरफ तीन-चार घंटे केबिन के भीतर कुछ फाइलें निपटाने की एवज में भइयाजी टाइप लोग जिसमें खुद घर परिवार के लोग ही शामिल हैं, छह अंकों में पगार ले रहे हैं। कंपनी उन्हें तमाम लग्जीरियस सुविधाएं मुहैया करा रही है, लगातार होने वाले आर्थिक लाभ के चलते यूनिट दर यूनिटें खुल रहीं हैं, दूसरी तरफ सत्रह-अट्ठारह घंटे काम पर एक-एक खबरों पर घंटों जूझने वाले उसी संस्थान के चालीस फीसदी से ज्यादा कर्मचारी अभी भी तीन-चार हजार रुपए से भी कम पगार पर दिन-रात खटने को मजबूर हैं। उनका वेतन दिहाड़ी मजदूरों से भी कम है। अखबार संस्थान के उन नींव की ईंटों की तरफ जिनकी संख्या हजारों में हैं, ध्यान देना क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती। खासकर तब, जब अखबार संस्थान इस तरफ से आंख मूंदे हुए हों और बेईमानी करने पर उतारू हों।

इसी अखबार के दर्जनों यूनिटों में हजारों कर्मचारी ड्यूटी करने तो आते हैं पर दूसरे दिन वे नौकरी पर रहेंगे भी या नहीं, कोई निश्चित नहीं रहता। किसी भइयाजी टाइप के साहब की नाक पर मक्खी बैठते ही किसी बंदे की रोजी छिन जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि कर्मचारी ऑफिस काम करने आए, सीट पर बैठे तब उन्हें ऐन मौके पर बताया गया कि सेवा खत्म। टेबुल पर हिसाब भी नहीं। चपरासी से कहलवाया जाता है कि महीने की सात तारीख को आकर हिसाब ले जाएं। यह सब बदस्तूर चल रहा है। एक दशक पहले इसी संस्थान के इलाहाबाद यूनिट के तीन उदाहरण देना जरूरी है।

भूखण्ड घोटाले, कौशाम्बी में दलित महिला को नंगा कर सड़क पर घुमाने की प्रामाणिक खबर छापने पर दो काबिल पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया जाता है। पहले वाले में मुख्य संवाददाता से कहा गया कि जिनके खिलाफ रपट छपी है, वह डाइरेक्टर के दोस्त हैं। कौशाम्बी जिला संवाददाता को इसलिए हटाया गया कि वहां का तत्कालीन एसपी अखबार मालिकान का करीबी रहा। इलाहाबाद में ही एक काबिल खेल रिपोर्टर को बीस साल बाद भी परमानेंट नहीं किया जा सका। दस साल से भी ज्यादा पुराने सैकड़ों कर्मचारी अभी भी परमानेंट बनने को तरस रहे हैं। अखबार संस्थान के भीतर के लोकतंत्र और आजादी की यह कुछ बानगी है। मामले कई, उनके फसाने भी कम दिलचस्प नहीं हैं। मणिसाना वेतन आयोग के बिल लागू होने पर दूसरे अखबार संस्थान जब कर्मचारियों को बकाया धन दे रहे थे तब उस समय जागरण संस्थान नौकरी का दबाव डालकर कर्मचारियों से ऐसे कागज पर हस्ताक्षर करा रहा था, जिसमें लिखा था कि उन्हें मणिसाना आयोग की सिफारिश के मुताबिक साढ़े तेरह हजार मासिक वेतन के बजाय तीन हजार रुपए पर कार्य करना मंजूर है। ऐसा वाराणसी यूनिट में भी किया गया।

ऐसे अलोकतांत्रिक, अघोषित गुलामी, अनिश्चय के माहौल और मनोदशा में कार्य करने वाले गैर संगठित हजारों कर्मचारियों के माई-बाप कोई नहीं हैं। न सरकार, न पत्रकारों के संगठन। होना तो यह चाहिए कि मनमानी छंटनी, कर्मचारियों की दुर्दशा, उनके कार्य और बदले में मिलने वाली पगार व सुविधाओं की जांच के लिए भी प्रभावी आयोग का गठन किया जाए। यह जरूरी है। बहुत ही जरूरी। इसलिए भी कि इस फार्मूले को सफल देख दूसरे भी कई अखबार उसी रास्ते पर चलने की कोशिश में लग गए हैं। तो भइया, सवाल एक बार फिर मुंह बाए खड़ा है कि ऐसी दशा कब तक चलेगी? इन बिल्लियों के गले में घंटी कौन बांधेगा?

लेखक शिवाशंकर पांडेय दो दशक तक दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्‍तान समेत कई बड़े संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनसे सम्‍पर्क 09565694757 एवं [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...