: खबर से पहले जान बचाने का प्रयास : 20 सितम्बर सुबह के 5 बजकर 8 मिनट हुए थे। अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजी उन्नीदे ही हैलो बोला…..उधर से आवाज आई- देव भाई साहब मंगल बोल रहा हूं। मैंने कहा- बोलो मंगल जी। मंगल ने कहा- देव भाई रेल दुर्घटना हो गई है। मेरी नींद उड चुकी थी। मैने पूछा तो उन्होंने बताया कि वे इंदौर से ग्वालियर आ रही इंदौर-ग्वालियर इंटरसिटी से आ रहे थे। दस मिनट पहले तो तेज धमाके हुए। सोते में लगा अपनी सीटों से नीचे गिर गए। उन्होंने बाहर देखा तो रेल के चार डिब्बे बेकार हो चुके थे। उनमें से चीत्कारें आ रहीं थीं। खबर बड़ी थी।
.. लेकिन क्या सिर्फ एक बड़ी खबर है… मैंने सोचा… मेरी आंखों में मंगल जी के शब्द गूंजे- देव भाई कुछ करो यहां घनघोर अंधेरा है। प्रशासन और डॉक्टर भिजवाओ ताकि कुछ लोगों की जान बच सके। मेरे अंदर का रिपोर्टर पीछे चला गया। मानवीय संवेदनाओं ने उन्हें पीछे धकेल दिया। मैने भोपाल में एनडीटीवी की ब्यूरो चीफ रूबीना खान शापू, निजी मित्र बृजेश राजपूत- स्टार न्यूज, शिवपुरी और ग्वालियर के पत्रकार, डॉक्टर्स, अधिकारी मित्रों को जगाकर आग्रह किया कि वे कुछ मदद कर सकते हैं। तत्काल करें।
बदरवास के जो भी नंबर मिले उन पर फोन किए नतीजतन कस्बे के सात-आठ युवक पहुंचे। उन्होने जान-जोखिम में डालकर वहां घायलों को निकालना शुरू किया। शिवपुरी में पीआरओ श्री भारती और वहां के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भार्गव को सलाम, जिन्होंने मेरे कॉल के बाद तत्काल प्रशासनिक अफसरों को जगाया और एक घंटे के भीतर राहत दल पहुंचाने में मदद की। मुझे अफसोस है कि इस दुर्घटना में 26 लोगों की जान चली गईं लेकिन संतोष है कि कुछ लोगों की जान बचाने में मददगार साबित हुआ।
लेखक देव श्रीमाली ग्वालियर में एनडीटीवी के संवाददाता हैं.

