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मीडिया मंथन

संवेदना और पत्रकारिता की धज्जियां उड़ाई गई

: उत्‍तराखंड में राजकीय शोक के बाद भी मना रंगारंग कार्यक्रम : 40 बच्‍चों की दर्दनाक मौत के बाद घोषित था राजकीय शोक : प्रकृति के प्रकोप का सामना कर रहे उत्तराखंड में विगत 19 अगस्त को बागेश्‍वर जिले की कपकोट विधानसभा में बादल फटने से करीब 40 बच्चों की मौत हो गई। इस घटना से पूरा प्रदेश शोक की लहर में डूब गया। मुख्यमंत्री डा.रमेश पोखरियाल निशंक जहां अपना मुंबई का आवश्‍यक दौरा तत्काल रद्द करते हुए घटनास्थल की ओर रवाना हो गए वहीं शासन ने पूरे प्रदेश में दो दिन का राजकीय शोक घोषित करते हुए किसी भी शासकीय कार्यक्रम पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी।

: उत्‍तराखंड में राजकीय शोक के बाद भी मना रंगारंग कार्यक्रम : 40 बच्‍चों की दर्दनाक मौत के बाद घोषित था राजकीय शोक : प्रकृति के प्रकोप का सामना कर रहे उत्तराखंड में विगत 19 अगस्त को बागेश्‍वर जिले की कपकोट विधानसभा में बादल फटने से करीब 40 बच्चों की मौत हो गई। इस घटना से पूरा प्रदेश शोक की लहर में डूब गया। मुख्यमंत्री डा.रमेश पोखरियाल निशंक जहां अपना मुंबई का आवश्‍यक दौरा तत्काल रद्द करते हुए घटनास्थल की ओर रवाना हो गए वहीं शासन ने पूरे प्रदेश में दो दिन का राजकीय शोक घोषित करते हुए किसी भी शासकीय कार्यक्रम पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी।

इस घोषणा के साथ ही शासन से संबंधित लोगों को किसी भी रंगारंग और अन्य कार्यक्रमों में भाग लेने पर स्वतः ही रोक लग गई। सरकार के इस कदम को देखते हुए विपक्षी कांग्रेस ने भी 20 अगस्त को राजीव गांधी की पुण्य तिथि पर होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को रद्द करते हुए जगह-जगह शोक श्रद्धांजलि आयोजित की। तमाम पत्रकार संगठनों ने भी शोक सभा आयोजित कर पीड़ित परिवारों के प्रति सहानुभूति जताई। लेकिन शोक के ऐसे ही गमगीन माहौल में राजधानी देहरादून में स्थित सत्ता के केन्द्र सचिवालय के सामने मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया जैसे एक नवजात संगठन ने मीडिया महोत्सव का आयोजन किया।

हालांकि राजकीय शोक के चलते ऐसे कार्यक्रम स्थगित कर दिए जाते है। लेकिन सूचना विभाग के हर्जे खर्चे पर आयोजित ये कार्यक्रम कौन कहे स्थगित होने को, पूरे रंगारंग समारोह के साथ हुआ। इसमें न केवल राजधानी के कुछ तथा कथित पत्रकारों ने संवेदनशीलता को तिलांजलि देते हुए भाग लिया बल्कि मा.मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी और अपने आप को शासन का चेहरा और कानून का विद्वान बताने वाले चंद्रशेखर उपाध्याय ने भी भाग लिया। उपाध्याय ने न केवल भाग लिया बल्कि मंच पर पूरी बेशर्मी के साथ कई घंटे जमे रहने के बाद संबोधन भी किया और पुरस्कार भी बांटे। उनकी इस हरकत से पूरे राजधानी के पत्रकारों में जहां क्षोभ हैं वहीं कुछ पत्रकारों ने इस मामले को मुख्यमंत्री के सामने उठाने के लिए कोशिश  शुरू कर दी है।

इसमें एक बात यह भी उल्लेखनीय है कि इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक को भी आना था लेकिन राजकीय शोक की वजह से वे इसमें नहीं आए। पर चंद्रशेखर उपाध्याय के इस कार्यक्रम में आने से विवाद खडा हो गया है। राजधानी के पत्रकारों का कहना है कि आखिर चंद्रशेखर उपाध्याय इस कार्यक्रम में क्यों आए जबकि खुद प्रदेश के वजीरे आला निशंक इसमें आने से बचे। अब इस बात का उत्तर मांगने वाले पत्रकारों ने चंद्रशेखर उपाध्याय को लेकर मोर्चा खोलने का मन बना लिया है। लोगों का कहना है कि आखिर जब पूरा प्रदेश राजकीय शोक में डूबा हुआ है। सरकार के सभी राजकीय कार्यक्रम स्थगित है तो फिर किसी व्यक्ति या संगठन को ये अधिकार कैसे मिल सकता है कि वह शोक व्यक्त करने की बजाय रंगारंग कार्यक्रम करे और उसमें दीप प्रज्वलन के साथ ही राष्‍ट्रगान का गायन करे।

खैर अब ये मामला आगे कहां तक जाएगा यह तो आने वाले समय ही बताएगा लेकिन मुख्यमंत्री का करीबी होने के बाद भी चंद्रशेखर उपाध्याय की इस हरकत को लेकर पूरे प्रदेश के पत्रकारिता और राजनीतिक समाज के साथ आम जन में भी आक्रोश व्याप्त है। लोगों का कहना है कि इस कार्य के लिए श्री उपाध्याय को शासन भले ही माफ कर दे लेकिन उन 40 बच्चों की आत्मा और उनके परिवारजनों का दुख उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।

देहरादून से बबलू दुर्गवंशी की रिपोर्ट. 

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