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सत्यवीरजी के झूठे बयान

नीरवसत्यवीरजी का दावा है कि वे कभी झूठ नहीं बोलते और उनके जानने वालों का दावा है कि सत्यवीरजी से बड़ा झूठा उन्होंने अपनी ज़िंदगी में आजतक नहीं देखा है। उनके जन्म को लेकर किंवदंती प्रचलित है कि जिस गांव में सत्यवीरजी का जन्म हुआ वहां सत्यवीरजी के जन्म से ठीक पहले सौ सत्यवादियों का आकस्मिक निधन हो गया था, तब सत्यवीरजी इस पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। इसलिए सौ लोगों की मृत्यु का अपने को जिम्मेदार मानकर इस हादसे के सदमें में सत्यवीरजी इतना गहरे डूब गए कि बचपन से ही इन्हें सत्य बोलने का व्यसन लग गया। जो आज तक बरकरार है। सत्यवीरजी ने तरह-तरह से झूठ बोलकर सत्य बोलने के इस कुटैव से पीछा छुड़ाना चाहा, मगर सत्य ने भी सत्यवीरजी का दामन इतनी मजबूती से पकड़ा हुआ है कि कोई भी तरकीब आज तक काम नहीं आई। सत्यवीरजी का दावा है कि सच बोलने की आदत से वे लाचार नहीं होते, तो झूठ बोलकर कब के दो-तीन बार कैबिनेट मंत्री बन चुके होते।

नीरव

नीरवसत्यवीरजी का दावा है कि वे कभी झूठ नहीं बोलते और उनके जानने वालों का दावा है कि सत्यवीरजी से बड़ा झूठा उन्होंने अपनी ज़िंदगी में आजतक नहीं देखा है। उनके जन्म को लेकर किंवदंती प्रचलित है कि जिस गांव में सत्यवीरजी का जन्म हुआ वहां सत्यवीरजी के जन्म से ठीक पहले सौ सत्यवादियों का आकस्मिक निधन हो गया था, तब सत्यवीरजी इस पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। इसलिए सौ लोगों की मृत्यु का अपने को जिम्मेदार मानकर इस हादसे के सदमें में सत्यवीरजी इतना गहरे डूब गए कि बचपन से ही इन्हें सत्य बोलने का व्यसन लग गया। जो आज तक बरकरार है। सत्यवीरजी ने तरह-तरह से झूठ बोलकर सत्य बोलने के इस कुटैव से पीछा छुड़ाना चाहा, मगर सत्य ने भी सत्यवीरजी का दामन इतनी मजबूती से पकड़ा हुआ है कि कोई भी तरकीब आज तक काम नहीं आई। सत्यवीरजी का दावा है कि सच बोलने की आदत से वे लाचार नहीं होते, तो झूठ बोलकर कब के दो-तीन बार कैबिनेट मंत्री बन चुके होते।

सत्यवीरजी के मुताबिक इनके गांव में एक धर्मवीरजी थे, जो स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ सत्यवीरजी के पिताजी भी थे। और पुलिस की गोली लगने से लंगड़े हो गए थे। जब कि विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक धर्मवीर किसी के खेत में आम चुराने के लिए पेड़ पर चढ़े थे और मालिक ने डंडा मारकर उनकी टांग तोड़ थी। चोरी की इस वारदात को और गांव निकाले की सजा को देशभक्ति के रंग में डुबोकर धर्मवीर शहर आ गए। और मेरा रंग दे बसंती चोला गाते हुए नकली इंकलाबी बन गए। और अपनी त्याग-समर्पण की भावना के बूते पर पुलिस के मुखबिर बनकर देश सेवा में जुट गए। अपने अदभुत पराक्रम और अदम्य साहस के बल पर इन्होंने कई क्रांतिकारियों को शहीद होने का दर्जा दिलाने में मदद कर राष्ट्र की अमूल्य सेवा की। और फिर एक दिन वह भी आया जब शहीदों के बलिदान और मुखबिर धर्मवीर के अथक प्रयासों की बदौलत देश को आजादी मिल गई। पुलिसवालों ने मुखबिर धर्मवीर की गिरफ्तारी को क्रांतिकारियों के रजिस्टर में दर्ज करके उनकी बहुमूल्य सेवाओं का तोहफा उन्हें बख्शीश में देकर देशभक्तों की सूची में एक और महत्वपूर्ण नाम जोड़ दिया।

कहते हैं कि देश को आजादी मिलते ही धर्मवीर पर नारी उत्थान का जुनून सवार हो गया। वह दिन-दिनभर सोकर और रात-रातभर जागकर महिला उत्थान में जुटे रहते। चौबीसों घंटे उन्हें महिलाओं के स्तर और बिस्तर की ही चिंता सताए रहती। बस जीवन का एक ही ध्येय कि महिला उत्थान कैसे हो। महिला उत्थान की दुर्लभ सिद्धि ने धर्मवीरजी को खूब प्रसिद्धि दिलाई। सूबे की राजधानी तक धर्मवीर की यश-पताका फहराने लगी। संवेदनशील समाज सेवी खुशी-खुशी इस मसीहा के शहर आने लगे और उत्थानाभिलाषी स्त्रियां भी धर्मवीरजी के कुशल नेतृत्व में राजधानी जाने-आने लगीं। प्रतिभाओं के इस थोक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की जिम्मेदारी कर्तव्यनिष्ठ, तपोनिष्ठ धर्मवीरजी ने स्वेच्छा से अपने सिर ओढ़ ली। और समर्पित सिपाही की तरह इस महा कार्य में जुट गए। समाज सेवा के इस सार्वजनिक कृत्य में गोपनीय और शर्मनाक व्याधि ने कब उन्हें धर दबोचा इसका आभास धर्मजी को तो क्या डाक्टरों को भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही हुआ। एक सार्वजनिक व्यक्तित्व की निजी कारणों से हुई मौत आज तक रहस्य बनी हुई है। वैसे हर व्यक्ति की मौत निजी कारणों से ही होते सुनी गई है। और असामयिक भी। मगर धर्मवीरजी की मौत तो बाकायदा व्यक्तिगत कारणों से ही हुई थी। और असामयिक तो थी ही। धर्मवीरजी की मौत से उत्पन्न अपूर्णीय राष्ट्रीय क्षति को भरने के लिए पार्टी के निष्ठावान नेताओं ने धर्मनिष्ठ धर्मवीर के पुत्र सत्यवीर को बागडोर सौंपने का फैसला लिया।

हमारे देश के प्रजातंत्र की खासियत यही है कि पिता की राजनैतिक विरासत राजतंत्र की तरह ही उनकी संतानों को ही मिलती है। उसका बड़े बाप की औलाद होना ही उसकी सबसे बड़ी योग्यता होती है। इसके लिए किसी नौसिखिए के हाथों कमान थमाकर प्रजातंत्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। बड़े बाप की औलादें करें तो उन्हें अधिकार है। अतएव योग्य पिता के योग्य पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने के संवैधानिक अधिकार पर सर्वसम्मति की मोहर लग गई। कहावत है कि बाप मर गए औलाद छोड़ गए। सौभाग्य से धर्मवीर भी देशसेवा के लिए अपनी औलाद छोड़ गए। इसलिए चिंता की कोई बात नहीं। झंझट तो तब होता जब धर्मवीरजी मर जाते और उनके कोई औलाद नहीं होती। सत्यवीरजी की राजनैतिक पगड़ी रस्म हर्षोल्लास के साथ संपन्न हो गई। और अपने स्वर्गीय पिता के आधे-अधूरे काम पूरा करने के लिए सत्यवीरजी तमाम जरूरी उपकरणों से लैस होकर मैदान में उतर पड़े। पार्टी ने उन्हें संगठन का काम सौंपा है। जोकि किसी भी दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है।

कारण ये कि संगठन को बनाने में और संगठन को तोड़ने में  स्त्री शक्ति सबसे महत्वपूर्ण होती है। संगठन तो क्या स्त्री अपनी पर आ जाए तो परिवार नहीं चलने दे। एक संगठन में कई समानातंर संगठन पैदा कर के वो पार्टी को बिगबॉस का घर बना सकती है। स्त्री की शक्ति असीम है। स्त्री शक्ति को वश में करने की कला सत्यवीर को पिता से विरासत में मिली है। कुत्तावलोकन सिद्दि के सुपर स्टार हैं सत्यवीरजी। जैसे किसी गली के कुत्ते को कोई प्रेमग्रंथ की ट्यूशन नहीं पढ़ाता है। उसे प्रेमिका पटाने की अचूक प्रतिभा जन्म के साथ गिफ्ट में मिलती है। बस अवलोकन करते ही उसके दिमाग में घंटी बज जाती है कि टांका फिट होगा या नहीं और उसकी केलकुलेशन कभी नहीं गड़बड़ाती। इसलिए कुत्तों में कोई देवदास नहीं होता। सत्यवीरजी भी कुत्तावलोकन कला में पारंगत हैं। कहां पूंछ हिलानी है, कहां पूंछ दबानी है और कहां भौंकना है, इन सारी युक्तियों की बड़ी बारीक जानकारियां हैं सत्यवीरजी को। इसलिए तो पार्टी ने इन्हें इतनी अहम जिम्मेदारी सौपी है। वैसे सत्यवीरजी अपनी इस क्वालिफिकेशन को सिंहावलोकन ही कहते हैं, मगर लोग इसे उतनी ही गंभीरता से लेते हैं जितना कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के दावे को।

वैसे भी जिस विषय के सत्यवीरजी विशेषज्ञ हैं वहां सिंहावलोकन नहीं कुत्तावलोकन ही ज्यादा मुफीद होता है। और फिर सत्यवीरजी सचमुच के शेर तो क्या न कागजी शेर हैं और न ग़ज़ल के शेर हैं। मिट्टी के शेर हों भी तो किस काम के। बहरहाल हमें इस पचड़े में पड़ने की क्या जरूरत है। उन्हें पार्टी ने जो जिम्मेदारी सौंपी है वे उसे पूरी निपुणता से निभा रहे हैं और अपने पिताजी की परंपरा को बरकरार रखे हैं। कल अचानक मुझसे टकरा गए। पूरी व्यावसायिक विनम्रता के साथ मुझसे मुखातिब होते हुए बोले- आप से मिलकर बहुत खुशी हुई। मैंने कहा मुझे भी वैसी ही खुशी हुई जैसे चिड़याघर में पिकनिक मनाने पर किसी को होती है। वो बोले क्या मतलब, मैं चिड़ियाघर हूं। आप तो साक्षात चलता-फिरता चिड़ियाघर हैं। मैंने कहा- न जाने कितनी चिड़ियां हैं आपके फंदे में। आप चिड़िया घर हैं, चिड़ियाघर के मैनेजर हैं। आप तो आसमान में उड़ती चिड़िया पहचान लेनेवाले दुर्दांत चिड़ीमार हैं। सत्यवीरजी थोड़े विचलित हुए मगर अपने प्रकटीकरण में पूरे नार्मलायमान रहे और हंसते हुए बोले- आप लोगों की बातों में बड़ा रस आता है। जो भी बोलते हैं, बेलाग बोलते हैं और सच बोलते हैं। मैंने कहा- सत्यवीरजी आपसे क्या झूठ बोलना। आप भी तो हमेशा सच ही बोलते हैं। आपका तो सारा कारोबार ही सत्य पर टिका है। आज के दौर में कहां मिलते हैं आप-जैसे सच बोलने और सुनने वाले। आप तो स्वयं सत्यकथाओं के प्राण हैं। सत्यवीरजी एक, सत्यकथाएं अनेक।

अच्छा सत्यवीरजी सच-सच बताइए आजकल चल क्या रहा है। सत्यवीरजी बोले- दाई से क्या पेट छिपाना। सब जगह झूठ का बोलबाला है, सच्चाई का तो हर जगह मुंह काला है। मगर हम तो सत्य के साधक हैं। पिताजी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधीजी को वचन दिया था कि हानि हो या लाभ मगर हम सत्य की डगर कभी नहीं छोड़ेंगे। तभी मेरा जन्म हुआ और उन्होंने मेरा नाम सत्यवीर रख दिया। पिताजी की उस कसम से हम भी बंधे हैं और बंधे रहेंगे। मैंने का लेकिन मेरी जानकारी में तो गांधीजी कभी शिकारपुर नहीं आए थे। आपके पिताजी को गांधीजी कहां मिल गए। झूठ के सिद्धहस्त खिलाड़ी ने कैच लेते हुए कहा- आपकी जानकारी बिलकुल ठीक है। गांधीजी शिकारपुर कभी नहीं आए। पिताजी को बनारस में पंडि़त मदन मोहन मालवीय ने गांधीजी से मिलवाया था। पिताजी ने तब एक लाख रुपए का चंदा मालवीयजी को हिंदू विश्विद्यालय बनाने के लिए दिया था। वहीं गांधीजी एक कोने में बैठे हुए थे। मालवीयजी ने पिताजी से पूछा इन्हें जानते हो तो पिताजी ने साफ मना कर दिया बोले मेरा इस आदमी से क्या लेना-देना। तब मालवीयजी ने पिताजी को गांधीजी के बारे में विस्तार से बताया। तभी से मेरे पिताजी और गांधीजी में पक्की दोस्ती हो गई। मेरे जन्म के समय गांधीजी ने जीडी बिड़ला के हाथों ग्यारह रुपए भी भिजवाए थे। वैसे तो वो ऐरे-गैरे को मुंह नहीं लगाते थे। वो खुद आते मगर जैसी कि उनकी आदत थी वो उन दिनों वो कहीं अनशन पर बैठे थे इसलिए आ नहीं पाए। अनशन का गांधीजी को बहुत शौक था। आ भी जाते तो क्या फायदा होता। कुछ खा-पी तो सकते नहीं थे। अनशन पर जो थे। मालवीयजी ने भी मेरे लिए एक कलम भेजी थी। मैं मुद्दतों से कोई सुपात्र ढूंढ रहा था जिसे यह कलम भेंट करता। आज आप मिल गए। आप लिखने-पढनेवाले आदमी हैं। आपको यह कलम भेंटकर मुझे बड़ी अहिंसात्मक खुशी होगी। इस तुच्छ भेंट को स्वीकारिए। और वो मुझे फुटपाथ से खरीदा एक रुपएवाला पैन भेंट करके चले गए। मालवीयजी की क़लम भला तुच्छ हो सकती है। मगर सत्यवीरजी झूठ कहां बोलते हैं। यह कलम उनकी तुछ्ता का अमिट ताम्रपत्र है। जिसे मैंने संभालकर रख लिया है और आज का व्यंग्य उनके सम्मान में उनकी ही क़लम से लिख दिया है।

व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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