: शाहन के शाह : दास मलूका कह गये सबके दाता राम : बालमन ही तो था, बस किसी गरीब के साथ हुआ निर्मम व्यवहार को वह हजम नहीं कर पाया। खुद को कमरे में बंद किया और जब निकला तो संत श्रृंखला में वह एक बड़े नाम के तौर पर अपना अक्स छोड़ गया। लेकिन हाय रे दुर्भाग्य। समाज ने उसकी भावनाओं को समझने के बजाय, खुद उसके ही दर्शनों को खुद उसी के ही खिलाफ न केवल हथियार बना डाला, बल्कि उसके नाम पर उपहास की एक ऐसी नयी-नयी इमारतें खड़ी कर दी गयी जहां कोई भी मनमाफिक ठीहा खोज सके। यह थे संत मलूकदास।
इलाहाबाद में कड़ा माणिक पुर में एक सुंदरदास खत्री परिवार में संवत 1631 को वैशाख की पांचवी तारीख को जन्मे मलूकदास कुल चार भाई थे। प्यार से लोग इन्हें मल्लू पुकारने लगे। सरल हृदय के मल्लू रास्ते में कंकड़ वगैरह तक हटाते चलते थे ताकि किसी यात्री को कष्ट न हो। इससे नाम पड़ गया पगला। किशोर अवस्था तक इनकी आदतों में सुधार नहीं हुआ तो पिता ने उन्हें व्यवसाय की जिम्मेदारी देकर दिशा बदलनी चाही। लेकिन गरीबों के प्रति इनके प्रेम ने दुकान जैसे लुटने के लिए खोल दिया। एक बार पिता ने कंबलों का गट्ठर देकर हाट-बाजार में भेजा। कंबल नहीं बिका। लौटते समय वह गट्ठर उन्होंने एक मजदूर की पीठ पर लदवा दिया। युवा मजदूर तेज था। वह किशोर मल्लू से आगे निकल कर उनके घर मल्लू से पहले पहुंच गया। मां को शक हुआ कि कहीं मजदूर ने कंबल न चुरा लिये हों, इसलिए उसे कुछ रोटियां देकर बहाने से एक कमरे में बंद कर दिया ताकि मलूक के आने पर असली हाल जाना जा सके।
बताते हैं कि मल्लू जब घर पहुंचे तो मजदूर के साथ हुए व्यवहार की घटना सुन भीतर तक दहल गये। कमरे में जाकर देखा कि मजदूर चुपके से भाग गया था, मगर उसकी रोटियां जस की तस पड़ी थीं। बस, इस घटना ने मल्लू को बदल कर रख दिया। उन्होंने कमरे में पड़ी रोटियों को प्रसाद की तरह माथे से लगाया और खुद को उसी कमरे में बंद कर लिया। कई दिनों तक कमरे में बंद रहने के बाद जब उनका प्रायश्चित पूरा हुआ, तब तक वे मल्लू से एक ऐसे महान मलूकदास संत बन चुके थे, जो तब की राजनीतिक हालातों के चलते लगातार बढ़ती जा रही सामाजिक अवसाद की स्थिति से त्रस्त जनसमुदाय के जख्मों पर राहत की संजीवनी बूटी लगा सकते थे।
मलूकदास ने जन-अवधारणा की कद्र भी की और एक दिन सीधे औरंगजेब तक को चुनौती दे दी। यह पहला मौका था जब किसी औरंगजेब जैसे क्रूर शासक ने किसी हिन्दू संत के सामने घुटने टेके। उसने मलूक दास के पूरे गांव को ही जजिया कर से मुक्त कर दिया। इसके बाद तो मलूकदास बाकायदा एक महान प्रचारक हो गये जो अपनी आस्थाओं को निराकार में खोजता था। मलूकदास का एक शिष्य मीरमाधव भी था। मीरमाधव का असली नाम फतहअली था और वह औरंगजेब का करीबी था, लेकिन मलूकदास के प्रति उसकी आस्था उसे कड़ा तक खींच लायी और वह तब के शाहंशाह कहलाने वाले औरंगजेब की नौकरी पर लात मार कर साधु हो गया। अब तक मलूकदास का मन सामाजिक-आर्थिक विभेदकारी व्यवस्था से ऊब चुका था। वे गरीब-गुरबों के साथी बने और सबसे पहले उनकी धार्मिक आस्थाओं को निशाना बनाया। मलूक ने ईश्वर की उपस्थिति को ही सतगुरू माना। कहा जाता है कि उन्हें कुल तीन गुरुओं ने दीक्षा दी। लेकिन किसी का भी नाम मलूकदास के साथ स्थाई तौर पर नहीं जुड़ सका। चाहे वे मुरारस्वामी हों अथवा बिट्ठलदास या फिर देवनाथ।
”अजगर करे न चाकरी पंछी करै न काम, दास मलूका कह गये, सबके दाता राम।” भारत ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिणी एशिया में बिना कुछ किये मस्त रहने के हिमायतियों में यह लाइनें बात-बात पर बोली जाती हैं। ऐसे लोग अपने पक्ष में जो ताना-बाना बुनते हैं, उनका आधार मलूकदास का यह दर्शन ही है। जबकि इस दर्शन के प्रणेता और ईश्वर को सतगुरु मानने वाले इस संत का कहना था कि आडम्बरयुक्त व्यामोह से लोगों को निजात मिलनी ही चाहिए। उसका कहना था कि जिसने पाला है, वह ही प्रश्रय की जीवन-पर्यंत व्यवस्था भी करता है, इसलिए न तो लोभ-लालच का कोई फायदा है और न ही पूजा-अनुष्ठान वगैरह से कोई अभीष्ट सिद्ध हो सकता है। होना वही है जो ईश्वर चाहता है। तो बेहतर है कि सब कुछ ईश्वर पर ही छोड़ दिया जाए। ईश्वर से ज्यादा सजग और सतर्क कोई नहीं हो सकता है। क्योंकि वह न सोता है, न जागता है। खाता है और न त्यागता है। न पीता है और न मरता या जीता है। ईश्वर ही सतगुरु हैं और उसे वही हासिल कर सकता है जिसमें यह दमखम हो कि वह सुई के छेद से सुमेरू पर्वत तक पार कर सके। हालांकि कुछ विद्वानों की राय में मलूकदास ईश्वर को व्यक्ति के तौर पर पूजते थे। इसके पक्ष में उनकी रचनाओं की व्याख्या भी खूब हो चुकी है।
वे लोगों से उनका दुख खुद को सौंपकर प्रभु में ध्यान लगाने को कहते थे। जे दुखिया संसार में, खोवो निका दुक्ख, दलिद्दर सौंप मलूक को, लोगन दीजै सुक्ख। खूब किंवदंतियां हैं मलूकदास को लेकर। मलूक दास की सरलता को कुछ लोगों ने मस्ती से जोड़ दिया, उनकी बेखुदी को अल्हड़पन और उनके नाम को शराब से जोड़ दिया गया हो तो यह उनके प्रति भक्तों का प्रेम ही कहा जाएगा। लेकिन मलूकदास ने जो भी कहा, वह लोगों के दिलों को छू गया। शायद इसकी एक खास वजह यह रही हो कि उनके मन में कष्ट भोगते लोगों के प्रति अप्रतिम करूणा, प्रेम और वात्सल्य था। उन्होंने ऐसे लोगों को भक्ति के लिए फकीरी से जोड़ने का भी प्रयास किया लेकिन वे फकीरी के ग्रहस्थ भाव के उपासक रहे। इसका कारण यह भी हो सकता है कि उन्होंने अपने दायित्वों से कभी मुंह नहीं मोड़ा। किंवदंतियों के अलावा शायद ही ऐसा कोई प्रकरण रहा हो, जब वे अपने कड़ा गांव को छोड़कर कहीं बाहर गये। उन्होंने विवाह भी किया और बेटी भी हुई। बेटी को पूरा प्रेम दिया और अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद वे बेटी की सेवा-सुश्रुषा भी करते रहे। इसी बीच कड़ा में उनके नाम की पीठ भी बन गयी और उनके बाद उनके उत्तराधिकारी महंथ कहलाने लगे।
भेष फकीरी जे करै, मन नहिं आवै हाथ।
दिल फकीर जे हो रहे, साहेब तिनके साथ।
दया धर्म हिरदे बसे, बोले अमृत बैन।
तेई उंचे जानिए, जिनके नीचे नैन।
इस जीने का गर्व क्या, कहां देह की प्रीत।
बात कहत ढह जात है, बारू की सी भीत।
आदर मान महत्व सत, बालापन को नेह।
यह चारों तब ही गए, जबहि कहा कछु देह।
मलूक वाद न कीजिए, क्रोधे देव बहाय।
हार मानु अनजान तें,बक बक मरे बलाय।
खुद को कूड़ादान बनाने की मलूकी-अदा ही लोगों को दिल जीत गयी और जल्दी ही कड़ा का यह संत पुरी-जगन्नाथ से लेकर नेपाल, पटना, लखनऊ, राजस्थान, गुजरात, वृंदावन और काबुल तक के लोगों के दिलों का राजा बन गया। नवें सिखगुरू तेगबहादुर तो खुद ही उनसे मिलने कड़ा गांव की यात्रा कर आये। भावनाओं का एक समंदर मलूकदास के नाम पर जनमानस में इतने वेग से उठा कि 1739 में उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को पुरी में कबीर स्मारक के पास स्थापित किया गया।
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों एस टीवी के यूपी ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

