गरीबों के लिए बनाई जाने वाली अच्छी से अच्छी योजना का का कितना बुरा हाल होता है, इसे जानते तो सब हैं लेकिन
जब सब कुछ आंखों के सामने घटित होते हुए दिखता है तो लगने लगता है कि देश में गरीबों का साथ देने वाला वाकई कोई नहीं है। सब केवल गरीबों के बारे में गाल बजाकर वोट लेने चले आते हैं। आशा की आखिरी किरण न्याय व्यवस्था है लेकिन वह भी कई अंदरूनी दिक्कतों व कमियों से जूझ ही है। नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना) की इस कहानी से भारतीय गरीब के साथ हो रहे व्यवहार और सिस्टम की तंगदिली को समझा जा सकता है।
झारखंड में कांग्रेस अपनी चुनावी नैया पार लगाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना को सबसे बड़ी उपलब्धि बता रही है। इस योजना के तीन वर्षों की सफलता की कहानी अखबारों और टीवी चैनेलों के जरिए सुनाई जा रही है। प्रभावशाली आंकड़ों से अखबारों का एक पूरा पन्ना पटा रहता है। आंकड़ों का मायाजाल मतदाताओं को कितना प्रभावित करेगा, यह तो फिलहाल समय के गर्भ में है लेकिन हकीकत में नरेगा का हाल अन्य योजनाओं से अलग नहीं है। कांग्रेस की नजर में भले ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना बहुत सफल है, इस योजना संग ढेरों विवाद जुड़े हैं। इस योजना का सफल क्रियान्यवयन अभी तक संभव नहीं हो सका है। इस संबंध में मैं झारखंड के लातेहर में नरेगा से जुड़ी अव्यवस्थायों का जिक्र कर रहा हूं। इस जिले में नरेगा से जुड़े जॉब कार्ड धारकों को महीनों से उनकी मजदूरी नहीं मिल रही है। जॉब कार्ड बनाने के लिए रिश्वत भी मांगी जा रही है। बैंक और पोस्ट ऑफिस में खाते नहीं खुल पा रहे हैं। बहुतायत संख्या में बेनामी जॉब कार्ड धारकों का मामला प्रकाश में आया है।
गांव के सरपंच और सचिव पूरे तरीके से भष्टाचार में लिप्त हैं। इस संबंध में शिकायतों की फेहरिश्त बहुत लंबी है। यह स्थिति पूरे देश में है। जॉब कार्ड धारकों से शिकायती आवेदन प्राप्त करने और 7 दिनों के अंदर उसका निपटारा करने के लिए जिम्मेदार ब्लॉक स्तर के कार्यक्रम अधिकारियों के क्रिया-कलाप शुरू से असंतोषजनक रहा है। विकट होती स्थिति के चलते 7 फरवरी को झारखंड के लातेहर जिला में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना से जुड़ी हुई समस्याओं के निवारण हेतु एक लोक अदालत का गठन किया गया। इस लोक अदालत की स्थापना विचित्र तरीके से हुई। दरअसल, लातेहर जिला में जॉब कार्ड धारकों और वैसे मजदूरों जिनके द्वारा विहित प्रारुप में आवेदन देने के बाद भी नरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध नहीं करवाया गया, की समस्याओं का समाधान हो ही नहीं पा रहा था। कितने मजदूर व्यवस्था से असंतुष्ट हैं? सबसे बड़ा मजाक यह है कि बेंच के अधिकांश सदस्यों को नरेगा अधिनियम की कोई जानकारी ही नहीं है। ऐसे में लोक अदालत, पीड़ितों के साथ कैसे न्याय करेगा, यह एक प्रश्न है
इसकी भी स्पष्ट जानकारी सबंधित अधिकारियों के पास नहीं थी। लिहाजा अखबारों में विज्ञापन दिया गया कि जिस भी जॉब कार्ड धारक के पास राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना से जुड़ी किसी भी प्रकार की शिकायत है, वे अपनी शिकायत जिला न्यायिक सेवा अधिकारी के पास 31 जनवरी तक दर्ज करवायें। आश्चर्यजनक रुप से इस विज्ञापन के प्रत्युत्तर में जिला न्याययिक सेवा अधिकारी के कार्यालय में लगभग 20000 से अधिक शिकायती आवेदन एक सप्ताह के अंदर प्राप्त हुए। व्यापक संख्या में शिकायती आवेदनों का प्राप्त होना निश्चित रुप से समस्या की गंभीरता की ओर संकेत करता है। इसे देखते हुए न्यायिक सेवा के अधिकारियों ने नरेगा से जुड़ी समस्याओं के निवारण हेतु 2 से 5 फरवरी तक लोक अदालत लगाने का निर्णय लिया। इस कार्य को अमलीजामा पहनाने के लिए 20 बेंचों का गठन किया गया। प्रत्येक बेंच में 3 सदस्य थे। इन 3 सदस्यों में से एक वकील, दूसरा सामाजिक कार्यकर्ता और तीसरा जिला का वैसा अधिकारी, जो नरेगा से नहीं जुड़ा हो, था। इसका मूल उद्येश्य था- समस्या का तत्काल निवारण। इस संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि लोक अदालत क्या है? इसकी स्थापना क्यों की गई? क्या यह नरेगा से जुड़ी सभी समस्याओं का निवारण करने में सक्षम है? वस्तुत: आज की तारीख में लोक अदालत तीव्र न्याय दिलाने का सबसे अच्छा माध्यम है। इसकी स्थापना न्याययिक अधिनियम 1987 के तहत की जाती है।
इस न्याय के मंदिर के सहयोग से वंचित वर्ग को समय से न्याय दिलाया जाता है। इस तरह के लोक अदालत में न्याय का आधार आपसी सहमति होता है। दोनों पक्ष आपसी सहमति एवं समझ से समस्या का हल निकालते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि एक बार सजा सुनाने के बाद उसमें फिर किसी प्रकार का संशोधन नहीं किया जाता है और न ही उसकी सुनवाई किसी और न्यायलय में की जाती है। दूसरे शब्दों में लोक अदालत के न्यायधीश का निर्णय दोनों पक्ष मानने के लिए बाध्य होते हैं। उल्लेखनीय है कि नरेगा के तहत स्थापित लातेहर का लोक अदालत अस्थायी है। अस्थायी और स्थायी लोक अदालत में फर्क होता है। अस्थायी लोक अदालत के निर्णय को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है क्योंकि इसके निर्णय के विरुद अपील करने पर पाबंदी है। साथ ही इसके तहत प्रकरण की योग्यता के आधार पर सुनवाई नहीं की जाती है। स्थायी लोक अदालत में प्रकरण की योग्यता को ध्यान में रखा जाता है।
दोनों अदालतों के अधिकारों में भी काफी विभिन्नता है। आजकल लातेहर जिला में नरेगा को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म है। इन अफवाहों की आपा-धापी में बेरोजगारों को यह विश्वास हो गया है कि यदि उन्होंने नरेगा के तहत रोजगार पाने के लिए विहित प्रपत्र और नियमों के तहत आवेदन किया है, बावजूद इसके उनको नरेगा के तहत रोजगार नहीं मिलता है, वैसी स्थिति में वे बेरोजगारी भत्ता पाने के हकदार होंगे। लोगों के बीच इस तरह की भी अफवाह है कि लोक अदालत के द्वारा उन्हें यह बेराजगारी भत्ता मिलेगा। पूरे जिले में बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए आवेदन पत्रों की ब्लैक मार्केटिंग हो रही है।
जो भी हो, इस अफवाह का परिणाम लातेहर जिला में सकारत्मक और उत्साहवर्धक रहा है। अंतत: लोक अदालत ने 7
फरवरी को कोप और जेरुया ग्राम पंचायत के 78 मजदूरों को 138000- (एक लाख अड़तीस हजार) रुपयों का भुगतान बेरोजगारी भत्ता के रुप में बेरोजगारों के बीच करवाया। इस दो ग्राम पंचायतों के रहवासी नरेगा के तहत रोजगार नहीं मिलने के बाद से ही बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। यह निणर्य इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि नरेगा के तहत कोप और जेरुया ग्राम पंचायत के मजदूरों को रोजगार मुहैया करवाने में असफल रहने वाले ब्लॉक विकास अधिकारी श्रीमती मणिका पर 1000 रुपयों का अर्थदंड नरेगा की धारा 25 के तहत लगाया गया। इस तरह, इस धारा के तहत किसी भी अधिकारी को दंडित करने वाला झारखंड देश का पहला राज्य बन गया है।
स्वाभाविक रूप से यह अपने आप में एक ऐतिहासिक निर्णय है। हालांकि वर्षों से संयुक्त राष्ट्र संगठन का एक निकाय अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन भारत को बेरोजगारी भत्ता देने के लिए निर्देश दे रहा है। लेकिन फिर भी भारत में इस निर्देश का कभी अनुपालन नहीं किया गया। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में डेनिस सिद्धांत के तरह रोजगार देने की जिम्मेवारी सरकार की होनी चाहिए क्योंकि भारत एक विकासशील देश है और यहां की अधिकांश जनता को दो जून की रोटी नसीब नहीं होती है। इस तरह देखा जाए तो अनजाने में ही सही, लेकिन लातेहर जिला में लोक अदालत ने बेरोजगारी भत्ता देने का निर्णय सुनाकर पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। हालांकि नव स्थापित लोक अदालतें अनेकानेक खामियों से अटी पड़ी हैं। 20 बेंचों में से अनेक बेंचों की विश्वसनीयता संदिग्ध है। अनेक कथित सामाजिक कार्यकर्ता जो सदस्यों के रूप में बेचों से जुड़े हुए हैं, उनके दामन पहले से ही दागदार हैं।
इन लोक अदालतों में सुनवाई के दौरान ऐसे भी मामले प्रकाश में आये हैं कि जिनमें संबंधित विभाग के प्रतिनिधि ने जिला न्यायधीश से यह गुजारिश कि वे विभाग के विरुद्ध आदेश सुनाने के बजाए प्रतिवादी को दंड राशि देने का आदेश सुनाएं, ताकि विभाग की कोई बदनामी न हो। सबसे बड़ा मजाक यह है कि बेंच के अधिकांश सदस्यों को नरेगा अधिनियम की कोई जानकारी ही नहीं है। ऐसे में लोक अदालत, पीड़ितों के साथ कैसे न्याय करेगा, यह एक प्रश्न है? आश्चर्यजनक बात यह है कि जिला न्यायधीश को भी नरेगा अधिनियम की बारीकी से जानकारी नहीं है। इस तथ्य की पुष्टि जिला न्यायधीश द्वारा सुनाए गए कुछ निणयों से स्पष्ट हो चुका है। शिकायत की सुनवाई का तरीका भी अतार्किक है। सुनवाई के दौरान बेंच के सदस्य 2-3 प्रश्न वादी और प्रतिवादी से पूछते हैं और अपना निर्णय सुनाकर निणर्य पर वादी और प्रतिवादी से हस्ताक्षर करवा लेते हैं। यह तब होता है जबकि अधिकांश शिकायतकर्ता अनपढ़ होते हैं और लोक अदालत के निर्णय के खिलाफ किसी दूसरे न्यायलय में अपील करने की छूट नहीं है।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि नव गठित लोक अदालत के कार्य-कलाप में अनेक प्रकार की कमियां हैं। लेकिन यह तो हमारे देश की पहचान है। ऐसा कौन सा कानून, संगठन, कार्यक्रम या योजना यहा है जिसे सम्पूर्ण कहा जाय? भले ही लोक अदालत में कई कमियां हों और नरेगा से जुड़ी समस्याओं को ठीक से निपटाया नहीं जा रहा हो, तब भी कहा जा सकता है कि इस अदालत ने एक सकारत्मक उदाहरण प्रस्तुत किया है। लातेहर का लोक अदालत एक रचनात्मक अनुभव है। इसने न सिर्फ लातेहर बल्कि पूरे देश में नरेगा से जुड़े मजदूरों के बीच एक क्रांति का संचार किया है। साथ ही बेरोजगारी भत्ता बेरोजगारों को मिलना चाहिए, इस आवाज को भी इस लोक अदालत ने बुलंद किया है। न्यायधीश श्री एम वाई इकबाल के अनुसार अगर किसी मजदूर को नरेगा के तहत 15 दिनों के अंदर रोजगार नहीं मिलता है तो वह बेरोजगारी भत्ता पाने का हकदार होगा। अत: आज जरुरत इस बात की है कि पूरे देश में नरेगा से जुड़े मजदूर लातेहर जिला के मजदूरों की तरह एक आंदोलन शुरु करें। देर- सबेर उन्हें उनका हक जरूर मिलेगा।
लेखक सतीश कुमार सिंह भारतीय स्टेट बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। इन दिनों वे मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में कार्यरत हैं। पिछले एक वर्ष से स्वतंत्र लेखन कर रहे सतीश कई वर्षों तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे हैं। सन् 1995 में भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1999 तक प्रिंट मीडिया से जुड़े रहे। इस दौरान दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाइम्स इत्यादि अखबारों के लिए काम किया। सन् 2000 में परीवीक्षाधीन अधिकारी के रूप में भारतीय स्टेट बैंक समूह से जुड़ गए। सतीश से संपर्क [email protected] या फिर 09993035479 के जरिए किया जा सकता है।

