सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी कि देश में बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता, विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र की खोखली होती जड़ों की तरफ एक इशारा मात्र है. रेल तथा डाक आदि अनेक उपलब्धियां देने वाले अंग्रेज भारत को उत्तराधिकार में एक ऐसी व्यवस्था भी दे गए, जिसमें विखंडन तथा भ्रष्टाचार के विषाणु व्याप्त थे. हमने एक ऐसे विखंडित जनतंत्र को अपनाया जिसमें तंत्र को चलाने में जन की भूमिका बहुत ही सीमित है. उदाहरण के लिए, देश की नब्बे प्रतिशत से अधिक जनता चाहती है की भारत का काम भारतीय भाषाओं में हो, पर आज तक किसने सुनी बहुमत की? इस तंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि भारत में शासक का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं किया जाता. इसलिए शासन की डोर एकीकृत न होकर विखंडित हो गयी. परिणाम स्वरुप जन और तंत्र दोनों कमजोर हो गए.
जन के लाखों करोड़ खर्च होने के बाद भी लोग भूख से मर रहे है, किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं. हर साल आने वाली बाढ़ से लोग त्रस्त हैं. बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र सूखे की त्रासदी से ग्रस्त हैं. करोड़ों लोग भर पेट भोजन नहीं पाते. आने वाली ठण्ड में पूरे उत्तर भारत में ठण्ड से सैकड़ों गरीब चल बसेंगे. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत क्षेत्र भ्रष्टाचार के दलदल में फंस गए हैं. शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी बढ़ रही है और शैक्षिक संस्थानों की भी. बीमारियां भी बढ़ रही हैं और स्वास्थ्य के व्यवसाय में संलग्न लोगों की समृद्धि भी. आजकल सम्पन्नता के दर्शन कहां होते हैं, लोनावाला और नोएडा जैसे भारत के सैकड़ों पाश क्षेत्रों में, जहां आय से बहुत अधिक संपत्तियों के स्वामियों के आलीशान भवन देश की गरीबी को मुंह चिढ़ा रहे हैं. इन संपत्तियों की आधारशिला तभी रख दी जाती है जब हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले अन्नदाता से आठ रुपये किलो गेहूं ले कर उसे बेदम उपभोक्ता को अट्ठारह रुपये किलो में बेचा जाता है. चौराहे पर खड़े सिपाही को दस रुपये लेते तो सब देखते हैं, लेकिन कप्तान और कलेक्टर साहेबान की कोठियों वाली सडकों से आम जन गुजरता ही कितना है.
जन के प्रतिनिधियों का हाल तो और भी बुरा है. उन बेचारों के पास कुछ लाख या करोड़ रुपये की निधियों की संस्तुतियों से अधिक ज्यादा कुछ नहीं है. वे जब तक पिछले चुनावों और अपने दल के मध्यावधि खर्चों से उबरते हैं तब तक अगले चुनाव में टिकट की जद्दोजहद सामने होती है. अपने आका के स्वर में स्वर मिलाना और अपने दल को धन संपन्न बनाना उनके कामों में शामिल है. ऐसे में भला वे स्वयं बहती गंगा में हाथ धोने से क्यों चूकेंगे? और जब हाथ धोना ही है तो भला नहाने और डूबकी लगाने में क्या बुराई है?
रह गयी न्याय व्यवस्था. तो पिछले शीतकालीन अधिवेशन (दिसंबर 2009) में स्वयं कानून मंत्री ने संसद को बताया था कि देश के सभी न्यायालयों में लंबित वादों की संख्या 3, 11, 39, 022 है. उन्होंने यह भी बताया कि इस समय उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 886 सृजित पदों में से 606 कार्यरत हैं. तथा अधीनस्थ न्यायालयों में 16685 सृजित पदों में से 13556 कार्यरत हैं. सन 2008 में हमारे उच्च न्यायालयों ने 2504 वाद तथा अधीनस्थ न्यायालयों ने 1138 वादों का निस्तारण किया. अभी आन्ध्र प्रदेश के एक magestrat ने एक दिन में एक सौ ग्यारह वादों का निस्तारण कर दिया. इस पर कुछ लोग उत्तेजित हो गए. दो पालियों में वादों की सुनवाई के प्रयास का भी कुछ लोगों ने विरोध प्रारंभ कर दिया. इसी प्रकार वर्त्तमान कानून मंत्री द्वारा जनहित में किये जा रहे सुधारात्मक प्रयासों का भी विरोध किया जा रहा है. यह विरोध गलत किन्तु स्वाभाविक है. इससे इतना तो स्पष्ट है की बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक हैं जिनके लिए ये अनिस्तारित वाद व्यवसाय का रूप ले चुके हैं. और वे नहीं चाहते की वर्त्तमान स्थिति में सुधार आये और जन को तंत्र की चक्की से राहत मिले. किंग’स कॉलेज, लन्दन के एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार नवम्बर 2009 में भारत की कुल1336 जेलों में 3 .76 लाख कैदी बंद थे.
इन सारी स्थितियों में सुधार के लिए सर्वप्रथम एकीकृत जनतंत्र की आवश्यकता है, जिससे कि भारत की तथा राज्यों की सम्पूर्ण जनता मिल कर अपने शासक का चुनाव कर सके. बाकी का सारा काम और जवाबदेही उस एक शासक की सीधे जनता के प्रति हो. इससे चुनावी भ्रष्टाचार तथा गांव गली के चुनावी दंगल कम हो कर समाप्त हो जाएंगे. जब मूल स्रोत ही बंद हो जायेगा तो भ्रष्टाचार सभी जगह रुकेगा और जन को तंत्र से राहत मिलेगी. लेकिन यह भी राजनीति के लाखों व्यवसाइयों की बेरोजगारी और अंततः इनके विरोध का कारण बनेगा. किन्तु वास्तव में जनतंत्र को सार्थक करना है तो तंत्र के इस छोटे से बदलाव के विचार को जनता के बीच ले जाना चाहिए. अमेरिका में यही एकीकृत लोकतंत्र है, जिससे उनके लोक की शक्ति तंत्र के लिए और तंत्र की शक्ति लोक के लिए काम करती है.
न्यायालयों में चल रहे करोड़ों वादों में से कुछ को ग्राम पंचायतों को तथा कुछ को कानून के विद्यार्थियों को सौंप दिया जाये और अधिवाक्तागण उनका मार्गदर्शन करें तो वादों का विकेंद्रीकरण हो जायेगा, उनका शीघ्र निस्तारण होगा, तंत्र का बोझ हल्का होगा और जन को भी राहत मिलेगी. फ़िलहाल तो देश को इस पर विचार करना चाहिए कि भारत के समस्त नागरिकों की संपत्ति, उनके द्वारा चुकाए जा रहे कर तथा उनमे होने वाले अहम परिवर्तनों की जानकारी पारदर्शी क्यूं नहीं होनी चाहिए? समस्या यदि जटिल हो चुकी है तो निश्चित है कि समाधान भी थोड़ा कठिन ही होगा.
लेखक आशुतोष श्रीवास्तव स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.

