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साक्षात शिव तो मैं ही हूं, तुम्‍हारा सेवक

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : जीवन के हर सुख-दुख में समाए हुए हैं विद्यापति : बादशाह ने कहा- इतने बडे़ ज्ञानी हो तो आज इम्तिहान हो ही जाए। कवि ने चुनौती स्‍वीकार कर ली। बस फिर क्‍या था। एक संदूक में बंद करके उस कवि को कुंए में लटका दिया गया। बाहर एक नृत्‍यांगना अपने करतब दिखा रही थी। सवाल था कि बंद बक्‍से से देखो कि ऊपर क्‍या हो रहा है। और हैरत यह कि उस कवि के होंठों से कविता की धाराप्रवाह सरिता बह निकली। कुंए के बाहर का पूरा ब्‍योरा बखान कर दिया। बोल थे- माधव की कहुं संदर रूपै, कनक कदली पे सिंह चढ़ाइल, देखल नयन सरूपै। सजनि निहुरि फुकु आगि, तोहर कमल भ्रमर मोर देखल, मढन ऊठल जागि। जो तोहें भामिनि भवन जएबह, एबह कोनह बेला, जो ए संकट सौं जौ बांचत, होयत लोचन मेला।

कुमार सौवीर

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : जीवन के हर सुख-दुख में समाए हुए हैं विद्यापति : बादशाह ने कहा- इतने बडे़ ज्ञानी हो तो आज इम्तिहान हो ही जाए। कवि ने चुनौती स्‍वीकार कर ली। बस फिर क्‍या था। एक संदूक में बंद करके उस कवि को कुंए में लटका दिया गया। बाहर एक नृत्‍यांगना अपने करतब दिखा रही थी। सवाल था कि बंद बक्‍से से देखो कि ऊपर क्‍या हो रहा है। और हैरत यह कि उस कवि के होंठों से कविता की धाराप्रवाह सरिता बह निकली। कुंए के बाहर का पूरा ब्‍योरा बखान कर दिया। बोल थे- माधव की कहुं संदर रूपै, कनक कदली पे सिंह चढ़ाइल, देखल नयन सरूपै। सजनि निहुरि फुकु आगि, तोहर कमल भ्रमर मोर देखल, मढन ऊठल जागि। जो तोहें भामिनि भवन जएबह, एबह कोनह बेला, जो ए संकट सौं जौ बांचत, होयत लोचन मेला।

सुल्‍तान स्‍तब्‍ध। आदेश हुआ कि राजा शिवसिंह को ससम्‍मान रिहा कर दिया जाए। शर्मसार राजा शिवसिंह सिर झुकाये वापस मिथिला रवाना हो गये। हां, साथ में वह कवि भी था और पूरे सम्‍मान के साथ था। यह कहानी सिर्फ यहीं तक नहीं है। दरअसल, यह राजा था मिथिला के शिव सिंह और वह कवि था विद्यापति, जिसकी रचनाएं आज केवल मिथिला ही नहीं, बल्कि बंगाल, उडीसा, असम और नेपाल के साथ ही साथ अवध के भी ज्‍यादातर हिस्‍सों में आज लोकगीतों का रूप ले चुकी हैं। इन क्षेत्रों में केवल मांगलिक अवसरों पर ही नहीं, बल्कि किसी भी समारोह में सबसे पहले विद्यापति के गीत गाये जाते हैं। राह चलते लोग तक उनके गीतों को गुनगुनाते मिल जाएंगे। और यह हैरत की बात नहीं कि विद्यापति के गीत गांवों में भूतभावन से लेकर कोहबर तक में अनिवार्य रूप से समाये हुए हैं। जैसे- कहब न हरब दुख मीर हे भोलानाथ और सुंदरि चललिहुं पहु पर ना जाइतहि लागु परम डर ना। उधर नवयुवकों के मन में ससन-परस खसु अबंर रे देखलि धनि देह और वयोवृद्ध लोग तताल सैकत बारिबुंद सम सुत मित रमनि समाज, तोहे बिसारि मन ताहे समरपिनु अब मझु हब कोन काज, माधव का ध्‍यान आंसुओं से भर देता है।

हालांकि विद्यापति के जन्‍म को लेकर काफी विवाद है। लेकिन ज्‍यादातर लोग इस बात पर सहमत हैं कि वे सन 1353 को एक ब्राह्मण घराने में पैदा हुए। स्‍थान था दरभंगा का गढ़ बिपसी गांव, जो आज के कमतौल रेलवे स्‍टेशन के पास है। पिता का नाम गणपति ठाकुर और मां का नाम था गंगादेवी। बचपन से ही मेधावी और शिवभक्‍त विद्यापति को कविताएं लिखने का शौक था जो बाद में उनकी आजीविका का साधन बना। राजा शिव सिंह ने उन्‍हें राजकवि बना दिया।

लेकिन इसके पहले एक बात और। वह यह कि विद्यापति का एक नौकर था। नाम था उगना। किंवदंतियों के अनुसार एक बार जंगल से गुजरते समय प्‍यास से बेहाल विद्यापति के लिए उगना गंगाजल सरीखा पानी ले आया जबकि उस क्षेत्र में पानी का कोई स्रोत था ही नहीं। विद्यापति ने हंसी में कहा कि यह गंगा कहां से अवतरित करा लाये। उगना बोला कि साक्षात शिव तो मैं ही हूं। लेकिन यह बात किसी से कहना मत, वर्ना मैं साथ छोड़ दूंगा। बाद में कभी नाराज होकर विद्यापति की पत्‍नी ने उगना की पिटाई कर दी। उसे बचाने दौडे़ विद्यापति के मुंह से निकल ही गया कि भागवान, यह क्‍या कर रही हो, शिव को पीट रही हो। बस उगना अंतर्धान हो गया। लेकिन विद्यापति की शिवभक्ति को एक नया विस्‍तार मिल गया।

उगना रे, मोरे कतय गेला : वियोग रस की उनकी कविताओं का मार्ग शायद यही रहा हो। लेकिन विद्यापति मूलत: रत्‍यात्‍मक कविताओं के उपासक थे, सो कृष्‍ण और राधा के साथ यमुना और बाल-गोपालों के साथ गोपिकाएं और रासलीलाओं को वे माध्‍यम बनाते थे। हां, उनकी रचनाओं में आध्‍यात्मिकता के बजाय यह पात्र केवल माध्‍यम ही बने। राजा शिवसिंह के महल में विद्यापति सखाभाव से रहते थे। राजा की पत्‍नी लखमी देवी के साथ भी वैसा ही। लखमी देवी भी कविता लिखती थीं। राजा के लिए राजनीति जरूरी, और कवियों के लिए रचना। सो लखमी से उनकी खूब पटती थी। लेकिन दरबारियों को यह कहां मंजूर। आग लगायी जाने लगी। एक दिन विद्यापति ने एक पंक्ति लिखी- छाडू कंहैया मोरा आंचल रेफटत नव साड़ी। इसी बीच इन पंक्तियों पर मुग्‍ध लखमी देवी ने वह भोजपत्र छीन लिया और महल में भागने लगीं। पीछे-पीछे विद्यापति। राजा पहले से ही शक्‍की। मौके की ताड़ में थे। सब्र का बांध फूटा तो बोल पडे- एक ही नगर बसु माधव हे, जनि करू बटमारी। यानी राजकोप उबल गया। विद्यापति को देश निकाल मिला। लेकिन इस भटकाव ने विद्यापति की रचनाओं को नयी-नयी ऊंचाइयों तक पहुंचने की धार मुहैया करा दी।

इसी बीच शिव सिंह को मुगल शासकों ने गिरफ्तार कर लिया। खबर मिलते ही विद्यापति पहुंच गये दिल्‍ली में सुल्‍तान के दरबार में। उनकी अर्जी थी कि शिव सिंह उनके पिता हैं, और जो भी दंड उन्‍हें मिला है उसे भोगने को वे तैयार हैं। बस राजा को रिहा कर दिया जाए। कहना न होगा कि लखमी देवी के बीच उनके सम्‍बन्‍ध माता-पुत्र के ही थे। विद्यापति ने कृष्‍ण के प्रति गोपिकाओं की लीलाओं का निहायत अनुमप चित्रण किया। वह प्रेम विह्वलता ही थी कि- पिय मोर बालक, मै तरूणी गे, कोनौ तप चुकलौ, भेलों जननी गे।

शाक्‍त क्षेत्र में शैव और वैष्‍णव मत के गीतों से हलचल मचाने के लिए ही विद्यापति को नहीं जाना जाता है। बल्कि उन्‍होंने तो शिवभक्ति की एक नयी श्रृंखला नचारी तक का निरूपण कर दिया। आज भी मैथिल ही नहीं, बल्कि असम, बंगाल, उडीसा और नेपाल तक में किसी भी कार्यक्रम के पहले गाये जाने वाले स्‍तुति गीत जै-जै भैरवी असुर भयावनी, पशुपति-भावनी माया गीत अनुष्‍ठान के तौर पर गाया जाता है। इतना ही नहीं, मिथिला की मधुबनी पेंटिंग तक में विद्यापति के गीत पिराये हुए हैं। मैथिल सभ्‍यता में मधुबनी पेंटिंग और विद्यापति के गीत एक दूसरे के पर्याय बने हुए हैं। अपने पितातुल्‍य शिव सिंह की सेवा में विद्यापति तो जौनपुर तक का सफर कर आये और तब के इस प्राचीन शहर का वह वर्णन कर दिया जो कहीं और दिखता ही नहीं। भीड़ भरे बाजारों में युवतियों के उन्‍नत उरोजों से चोट खाते युवकों की व्‍यथा का वर्णन कर पाना किसी और के बस का तो था भी नहीं। और अंत में, इस महानतम कवि को मैथिल भाषा का पहला कवि होने का गौरव है।

आम आदमी तक कविता को पहुंचाने का गुरुत्‍तर दायित्‍व विद्यापति ने अवहट्ट बोली को अपनाकर निभाया, और यही उनकी कलात्‍मक कविता के सर्वोच्‍च पद तक उन्‍हें पहुंचा गया। आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल की नजर में विद्यापति एक सम्‍पूर्ण कवि हैं तो गुरू रवींद्र नाथ टैगोर की उपासना के केंद्र। गुरुदेव ठाकुर ने तो विद्यापति पर बाकायदा एक नाटक तक लिख डाला। संस्‍कृत के महान कवि जयदेव के बराबरी के स्‍तर पर सम्‍मानित इस कवि के स्‍वयं को 90 साल की उम्र में जब गंगा मां में जलसमाधि यानी मरण-जाह्नवी-तीरे लेने की घोषणा की तो, कहते हैं कि गंगा माता स्‍वयं दो कोस दूर तक उन्‍हें अपने आंचल में समेटने चली आयीं।

विद्यापति क आयु अवसानकातिक धवल त्रयादसि जान।
जय हो लखमी माई और जय हो गंगा माई।

लेखक कुमार सौवीर जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में यूपी ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

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