मनीष बाजपेई
साधना गुप्ता का जब चेहरा टीवी न्यूज एजेंसी एएनआई की फीड में दिखा तो सबसे पहला ज़ेहन मे ये सवाल आया कि क्या ये बोलती भी हैं… दूसरा सवाल ज़ेहन में आया अगर ये बोलती हैं तो आवाज़ कैसी है… और अगर बोलती हैं तो चुनाव के वक्त में कुछ सियासी बोलेंगी या फिर किसी चुनावी रेसिपी का तरीका बताएंगी लेकिन जब साधना आज बोलीं तो बस बोलती चली गईं ..जो सालों से नहीं कहा वो सब कुछ कह दिया ..जिन मुलायम सिंह यादव के अनुशासन में आज तक वो बंधी रहीं ..आज वो दरिया बांध को तोड़कर बह निकला । आज समझ में आया कि जो मां( सौतेली) पन्द्रह दिन पहले मेरे दो अनमोल रतन की बात कह रही थी ..प्रतीक और अखिलेश मेरी दायीं और बायीं आंख है …मुलायम के साथ तीसरे चरण के चुनाव में सैफई में मौजूद साधना फरमां रहीं थी कि सब कुछ ठीक है ..चुनाव के आखिरी चरण तक आते आते आखिर अखिलेश बाग़ी कैसे हो गए? और ऐसे बाग़ी जिसका अनुमान तक उनको नहीं था। बड़ा अजीबोगरीब लगा …..।
पत्रकारिता का कीड़ा दिमाग़ में दौड़ा ..कुछ समझने की कोशिश की ..सियासत के ग्रहों को पत्रकारिता की मेज पर रख कर उनके समीकरणों को समझा और जाना कि जो ग्रह ममत्व भाव के लिये जाना जाता है ..उसमें ये सौतेलेपन का मिश्रण घुला हुआ था या जो पन्द्रह दिन पहले बोला था ..वो सिर्फ रस्मअदायगी भर था । कुछ समझ में आया भी और समझने के लिए एक पत्रकार को बस कड़ियों को जोड़ना भर होता है । तब समझ में आया कि पन्द्रह दिन पहले दिया हुआ बयान अकस्मात दिया हुआ बयान था । कुछ सेकेंडों में अचानक दिये गए बयान में जब कि पत्रकार सामने हो और सवाल कर रहें हो ..बहुत कुछ सोचा नहीं जा सकता सिवाय इसके कि सब ठीक ही ठीक कहो लेकिन अब जब कि बात कुछ सेकेंडों की नहीं बल्कि घर में बुलाकर बाकायदा साक्षात्कार दिया हो तब जब कि सब कुछ व्यवस्थित कर के …सोच समझ कर और हां एक न्यूज़ एजेंसी को ..जिसका महत्व हर ऐरा गैरा समझता भी नहीं कि अगर न्यूज ऐजेंसी को बयान दिया तो सब चैनल पर चलेगा और शाम तक चर्चा भी होगी ..इतना दिमाग लगाने के बाद अगर कुछ कहा जाए तो उसके मायने बहुत होगें और ..हां …एक शब्द के कई भाव निकलने ही थे।
आज बहुत कुछ साधना ने बोल दिया । ये भी बोल दिया कि वो अब तक अगर चुप थी तो नेता जी के चलते और वो अब तक सियासत में नहीं आई क्यों कि नेता जी की इच्छा नहीं थी कि वो सियासत में ना आए लेकिन साथ ही ये भी कहा कि अब वो चुप नहीं रहेगीं । साधना ने साफ कहा कि अब वो चाहती है कि उनका बेटा प्रतीक राज्यसभा पहुंचे । अब यही सियासत समझिए …और समझिए उस किरदार को भी जिसका जिक्र रामायण में है ..कैकेया भरत के लिए राजपाठ मांगती है और राम के लिए चौदहसाल का वनवास ..ये किरदार इसलिए यहां पर रखना जरुरी क्योंकि भरत का किरदार यहां पर रखा जाना जरुरी और वो इसलिए की जैसे भरत ने राजगद्दी को ठोकर मार दी थी तो कम से कम अभी तक सब लोग ये जानते है कि प्रतीक यादव ने ठोककर अपर्णा के नामांकन दाखिल करते वक्त कहा था कि वो कारोबारी है और कारोबारी ही रहना चाहते है और सियासत में उनकी कोई रुचि नहीं और हां ..अगला मुख्यमंत्री भैया अखिलेश ही होगें…नहीं एक शब्द छूट गया ….हमारे भैया अखिलेश ही होगें मुख्यमंत्री। ये सियासत की तस्वीर कुछ दिनों के पहले की है।
फिर यही सवाल? कि आखिर क्या जरुरत थी इस असमय दिए गए साक्षात्कार की या फिर अपने पालिटिक्ल डेब्यू स्टेटमेंट की …..इतिहास गवाह है कि ये वो धरती है जहां माएं अपनी पुत्र की सलामती के लिए निर्जला व्रत रखती है …क्योंकि हो सकता कि उनके जीवन का पुण्य उनके बेटे को मिल जाए । इस प्रसंग का यहां पर रेखाकिंत करना इसलिए जरुरी है क्योंकि सही मायने में अखिलेश यादव अपनी जिंदगी का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चुनाव लड़ रहे हैं या यूं कह सकते है कि एक ऐसा युद्ध जिसमें उनके साथ उनके पिता भी नहीं है । पहली बार ऐसा हो रहा है कि समाजवादी पार्टी बगैर मुलायम सिंह यादव के चुनावी मैदान मे हैं । हो सकता है कि इसको इस अंदाज में भी कहा जाए कि पहली बार ऐसा हो रहा है जिसमें चुनाव पार्टी नहीं लड़ रही बल्कि सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव चुनाव लड़ रहे हैं । अब इन सियासी हालातों में आखिरी चरण का इंतजार कर लिया जाता तो क्या बिगड़ जाता ..चुनाव का परिणाम आ जाता तो क्या बिगड़ जाता लेकिन नहीं …बात तो अभी करनी थी ….बेटे को बाग़ी अभी बताना था ….अपनी महत्वाकांक्षा का सार्वजनिक प्रदर्शन अभी करना था …।
ये कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब में कोई शब्द नहीं उभरते बल्कि एक अक्स उभरता है और वो किसी और का नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ मुलायम सिंह यादव का …जो कुछ हो रहा है …जो दिख रहा है ..उससे एक बात साफ हो गई है जिस तरह से सियासत में साइडलाइन हुए है मुलायम सिंह यादव ठीक उसी तरह से अब उनका परिवार पर भी नियंत्रण खत्म हो गया है वरना जिन नेताजी की वज़ह से जिदंगी भर अपनी महत्वाकांक्षा को साधना ने दबाए रखा वो परिवार के बीच ना निकल कर टेलीविजन पर क्यों निकली और अगर इस पूरे वाकये को दूसरे नजर से भी देखा जाए तो ये भी कहा जा सकता है कि आखिर उम्र के इस पड़ाव तक आते आते क्या मुलायम सिंह यादव साधना गुप्ता जी की महत्वाकांक्षाओं को नहीं समझ पाए । आज जब जितने धुरंधर यादव घराने में दिख रहे हैं और उनको बडा करने में अगर मुलायम सिहं यादव का ही हाथ है तो फिर एक साधना और आ जाती तो क्या दिक्कत हो जाती ..या फिर प्रतीक चले जाते राज्यसभा तो कौन सा नुकसान हो जाता ।
ये समझने वाली बात है और अगर ऐसा मुलायम सिहं ने नही किया तब उम्र के इस पड़ाव पर जिस दर्द ओ गम से वो दो चार हो रहे हैं तो उसका जिम्मेदार कौन है …हर शख्स यहीं कहेगा कि सिर्फ वो ही। लेकिन अब राह और कठिन होने वाली है …सपा पर आधिकारिक कब्जा अखिलेश यादव का है वो उनका हठने वाला नहीं है पर साधना गुप्ता ने साफ कहा कि अखिलेश ने नेताजी से तीन महीने के लिए पार्टी मांगी थी । 2 अप्रैल को वक्त पूरा हो जाएगा तो अखिलेश को पार्टी फिर से नेता जी को दे देना चाहिए लेकिन ऐसा होगा , इस बात की गुंजाइश दूर दूर तक नहीं है । तो फिर क्या होगा ? जी हां ..जवाब हो सकता है कि संघर्ष बड़ा भीषण होगा….सत्ता समाजवादियों के हाथ में आए या नहीं ..संघर्ष तो घराने में होगा ही । ये बात अलग है कि अगर सत्ता समाजवादियों के हाथ में आ गई तो अखिलेश मजबूती से अपने लगाए गए आरोपों को सही करार देगे लेकिन अगर सत्ता में अखिलेश नहीं आए तो ये कहना भी गलत नहीं होगा कि फिर अखिल अपनी जिंदगी की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई हार गए जिसके बाद दोबारा खड़ा होना मुश्किल होगा …..
मनीष बाजपेई
कार्यकारी संपादक
के न्यूज़, क्लाइड हाउस
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