
संजय
साहित्य में झंडेबाजी/खेमेबाजी को लेकर प्रख्यात साहित्यकार डा.रामदरश मिश्र ने अपनी पीड़ा व्यक्त की थी कि यह सब ठीक नहीं हैं। एक बार दिल्ली में एक आयोजन में साहित्यकारों का साझा मंच बनाने पर जोर दिया गया था। हमेशा से खेमें से बाहर रहे श्री मिश्र ने इसे अच्छा माना था। और कहा था कि मैं खेमेवाद और परचम से हमेशा अपने को अलग रख कर चलता रहा। जाहिर है खेमेबाजी को पंसद नहीं करता हूं। और मुझे याद है कि जब जनवादी लेखक संघ शुरू हो रहा था तो सुधीश पचैरी मेरे पास आये थे और बताया कि प्रगतिशील लेखक संघ बंध व संकीर्ण हो गया है, हम इसे खोलना चाहते हैं। हमने कहा अगर आप खोल पाये तो अच्छा हो। मैं भी आपके साथ रहूंगा। तो मुझे लगा वो खोल नहीं पाये, वह लोग भी वही कर रहे हैं, जो पीडब्लूए करता रहा है।
दो खेमे अलग है। लेकिन अलग होने के बावजूद भी कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं, जो मिल कर अपने से बाहर के लोगों की उपेक्षा करते हैं। अगर ये लोग साझा मंच बनाने की बात कर रहे है तो अच्छी बात कह रहे हैं। ये एक मूल्यवान बात होगी। लेकिन यह संभव नहीं है। मैं अक्सर एक बात कहता हूं कि पिछले 10-20 वर्षों से कविताएं, कहानियां वाद मुक्त हुई हैं। यानी सन् 80 के आसपास जब एक नकली विद्रोह था, नकली क्रांति थी ऐसा लगता था कि मजदूर का राज आ गया और ध्वस्त हो गये ऊंचे लोग। आखिर में लोगों को महसूस हो गया कि यह सब नकली मामला है। मुझे लगता था कि उसके बाद की यात्रा अच्छी होगी, जो चल रही है और जो एक वर्जना थी कि ये विषय हमारे काबिल नहीं है और हमें ये लिखना चाहिए तो ये सब टूट गया।
कविता-कहानी बड़ी सहज हो गयी। हमारे आस पास की जो दुनिया-चीजें हैं, ये कविता-कहानी में सहज भाव से आ रही हैं। तो लेखन में वह चीज टूटी, लेकिन लेखक में नहीं टूटी। लेखकों का दल अभी भी वैसे ही है। सीधी सी बात है, झंडा का संचालन खेमेबाजी है, ये तो बनाये हुए है और बनाये रखेंगे। उनकी अपनी एक खास पहचान है, जो बनी रहेगी। हिन्दी में जो एक मुख्यधारा बहा रखी है इन लोगों ने, वह बहती रहेगी और उस मुख्यधारा में बाहर के लोगों की उपेक्षा होती रहेगी। ये बड़ी विषम अवस्था है जो अप्रिय है साहित्य में। मेरा मानना है कि ऐसे में साहित्य में झंडेबाजी ठीक नहीं हैं। श्री मिश्र की पीड़ा आज भी बरकरार है(नई धारा सम्मान के दौरान पटना में लिया गया साक्षात्कार)।
श्री राय के प्रकरण पर जहां उन्हें कुलपति पद से हटाने को लेकर संघर्ष जारी है, वहीं खेमे में बंटे साहित्यिकार व साहित्यिक संस्थाएं, जो दूसरे मुद्दे पर अपनी पूंछ उठाते हैं, जब उनके बीच की लेखिकाओं को छिनाल बताकर पूरे स्त्री समाज को गाली दिया गया तो इस मुद्दे पर उनकी पूंछ भी नहीं उठती? देखा जाए तो जब भी साहित्यकारों के उपर कुछ भी हुआ या फिर कोई मामला बना तो तुरंत लेखक संघ गोलबंद होते हुए विरोध में देशभर में हस्ताक्षर अभियान छेड़ देते हैं, बयान और धरना देकर अखबारों में छाये रहते हैं। लेकिन छि…वाद मामले पर देश भर मे कोई हस्ताक्षर अभियान नहीं चला। बयान तक नहीं जारी किया गया। कुछ आया भी तो वह एकाध अखबारों में। लड़ाई वेब पत्रकारिता करने वालों ने लड़ी।
पुरस्कारों में धांधली का मामला हो या सांप्रदायिकता का या फिर कोई अन्य मुद्दा, इस पर देश भर के साहित्यकार व साहित्यिक संस्थाएं आनन-फानन में बयान जारी कर देते है। लेकिन आश्चर्य श्री राय ने जो स्त्री समाज का अपमान किया उसके विरोध में एक कतरा स्याही भी-खेमे में बंटे लेखकों ने नहीं बहायी। चर्चा है कहीं इसके पीछे द्विज समाज की मानसिकता तो नहीं? क्योंकि पत्रकार अनिल चमड़िया के मुद्दे पर श्री राय की दलित-पिछड़ा विरोधी होने की पोल खुल चुकी है। यही नहीं इस मसले पर श्री राय के समर्थन में द्विज मानसिकता वालों ने खुल कर समर्थन किया और श्री चमड़िया के खिलाफ हो गये थे।
श्री राय ने, श्री चमड़िया को वर्धा से हटा कर जो जातीय राजनीति की, वह किसी से छुपी नहीं है। सवाल सामने है कि साहित्यकार व साहित्यिक संस्थाएं श्री राय के समर्थन में क्यों चुप्पी साधे हैं। आखिर क्या वजह है कि इस मुददे पर देश के साहित्यकार- साहित्यिक संस्थाएं प्रतिरोध नहीं जता रहीं है? अंदर की बात कहीं यह तो नहीं कि जो चुप है वे व्यक्तिगत फायदे, वर्धा प्रेम या सत्ता सुख से- जो समय-समय पर सौजन्य वर्धा से मिलता रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि तथाकथित विरोध नहीं जताने वाले साहित्यिकार- साहित्यिक संस्थाएं अपने व्यक्तिगत संबंध खराब नहीं करना चाहते है। साहित्यिकारों व साहित्यिक संस्थाओं में इस सोच का पनपना उनके वैचारिक लड़ाई की धार में कमी का होना साबित करता है।
खेमें में बंटे साहित्यकार व साहित्यिक संस्थाएं भी राजनीतिक पार्टियों की तरह जातीय राजनीति करते दिखते हैं। सर्वे करा लिया जाये तमाम साहित्यिक संस्थाओं के अध्यक्ष/सचिव/महासचिव के पद पर ज्यादातर द्विज समाज ही काबिज है। सवाल उठने लगा है कि लेखक संघों में दलित-पिछड़ों की हिस्सेदारी कितनी है? जिस तरह से देश की पत्रकारिता में दलित-पिछड़े हाशिए पर है, उसी तरह से लेखक संघों में भी।
जाहिर है कि श्री राय का मुददा उनकी नजर में छोटा सा हो लेकिन इसने साहित्यकार व साहित्यिक संस्थाओं की सोच की पोल खोल दी है। और यह उनके कही न कहीं से द्विज और सामंती सोच के साथ होने का पुख्ता सबूत छोड़ जाता है।
लेखक संजय कुमार बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के ‘नवोदित साहित्य सम्मान’ से सम्मानित हैं तथा कई पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं. पिछले बीस वर्षों से पत्रारिता के क्षेत्र में सक्रिय संजय कुमार वर्तमान में आकाशवाणी पटना में समाचार संपादक हैं.

