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सामाजिक मिथकों को धता बताकर सफलता का परचम लहराती थार की बेटियां

यह कहानी है आटी गाँव की, जो राजस्थान के बाड़मेर जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर पश्चिम में स्थित है। यह कहानी है यहाँ के माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों की। यह कहानी है यहाँ की लड़कियों के खेल के प्रति जुनून और उनके जज़्बे की। यह कहानी है सामाजिक धारणाओं के टूटने की, एक सकारात्मक बदलाव की। यह कहानी महज एक कहानी नहीं है, यह है हकीक़त एक ऐसे गाँव की जहाँ कुछ साल पहले बेटियों को स्पोर्ट्स में भेजना तो दूर उन्हें विद्यालय तक भेजना मुनासिब नहीं समझा जाता था। यह कहानी सच है, यह उन माँ-बाप के लिए एक पैगाम है जो इस आधुनिक काल में भी अपनी बेटियों को शिक्षा और खेलों से दूर रखते हैं और उन्हें बोझ समझते हैं। यह उन भाइयों के लिए सच्चाई का आइना है जो यह समझते हैं कि बहनों का सिर्फ घर तक सीमित रहना ही उनका नसीब है।

यह कहानी है आटी गाँव की, जो राजस्थान के बाड़मेर जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर पश्चिम में स्थित है। यह कहानी है यहाँ के माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों की। यह कहानी है यहाँ की लड़कियों के खेल के प्रति जुनून और उनके जज़्बे की। यह कहानी है सामाजिक धारणाओं के टूटने की, एक सकारात्मक बदलाव की। यह कहानी महज एक कहानी नहीं है, यह है हकीक़त एक ऐसे गाँव की जहाँ कुछ साल पहले बेटियों को स्पोर्ट्स में भेजना तो दूर उन्हें विद्यालय तक भेजना मुनासिब नहीं समझा जाता था। यह कहानी सच है, यह उन माँ-बाप के लिए एक पैगाम है जो इस आधुनिक काल में भी अपनी बेटियों को शिक्षा और खेलों से दूर रखते हैं और उन्हें बोझ समझते हैं। यह उन भाइयों के लिए सच्चाई का आइना है जो यह समझते हैं कि बहनों का सिर्फ घर तक सीमित रहना ही उनका नसीब है।

यह कहानी साल 2012 में आटी ग्राम पंचायत के राजकीय माध्यमिक विद्यालय में तब शुरू होती है जब यहाँ हैंडबॉल खेलने के लिए लड़कियों की टीम बनाई जाती है। इस पहल के लिए विद्यालय के शिक्षकों का कमिटमेंट और लड़कियों की इस खेल के प्रति रूचि और लगन जिम्मेदार है, जबकि इससे पूर्व इस विद्यालय में लड़कों की हैंडबॉल टीम ही गाँव का प्रतिनिधित्व करती थी जिसे कभी कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। साल 2012 में गुड़ामालानी में पहली बार जिला स्तरीय प्रतियोगिता में खेलते हुए विद्यालय की बालिका टीम ने तीसरा स्थान हासिल किया था जिसमें से 3 लड़कियों का चयन राज्य स्तरीय प्रतियोगिता के लिए हुआ और राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में बाड़मेर जिले की टीम में खेलते हुए ये पहले स्थान पर रही जो कि अपनेआप में बड़ी उपलब्धि थी। यहाँ से सफलता का स्वाद चखने के बाद इस टीम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

साल 2013 में सीमावर्ती गाँव बीजराड़ में आयोजित जिला स्तरीय हैंडबॉल प्रतियोगिता में दूसरे स्थान स्थान पर रहने के बाद इस टीम की 6 खिलाड़ियों का चयन राज्य स्तरीय टूर्नामेंट के लिए हुआ जिसमें ये तीसरे स्थान पर रहीं। इसमें भी एक लड़की नेशनल लेवल टूर्नामेंट के लिए चुनी गई। इसके बाद अगले साल 2014 में बाड़मेर में आयोजित टूर्नामेंट में इसने फिर से दूसरा स्थान हासिल किया जिसमें से एक बार फिर 5 लड़कियों को राज्य स्तर पर चुना गया। इस साल इन खिलाड़ियों ने 2012 की सफलता दोहराते हुए फिर से राज्य स्तरीय टूर्नामेंट में पहला स्थान हासिल किया। इस टीम में से आटी गाँव की दो लड़कियों को राष्ट्रीय स्तर टूर्नामेंट के लिए स्टेट टीम में जगह मिली। साल 2015 में कवास गाँव जहाँ साल 2006 में बाढ़ आई थी, में आयोजित जिला स्तरीय प्रतियोगिता में पहली बार पहले स्थान पर रहकर जता दिया कि अब यह जगह उसकी है।

इसी आत्मविश्वास को बरक़रार रखते हुए इस टीम ने इस साल 2016 में सिवाना में आयोजित जिला स्तरीय हैंडबॉल टूर्नामेंट में फिर से खुद को साबित करते हुए पहला स्थान हासिल करने के साथ अपनी सफलता का परचम लहराया। इन दो सालों में इस टीम की 6 खिलाड़ियों ने बाड़मेर जिले का नेतृत्व करते हुए राज्य स्तर पर अपने खेल का जौहर दिखाया। पिछले साल ये स्टेट लेवल टूर्नामेंट में तीसरे स्थान पर रही तो इस बार बीकानेर जिले में आयोजित टूर्नामेंट के दौरान अपने खेल में सुधार करते हुए इन्होंने राज्य स्तर पर दूसरा स्थान हासिल करके रजत पदक जीता और बाड़मेर जिले का नाम ऊँचा किया। साल 2015 में इस टीम से आटी गाँव की 2 खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर देश की राजधानी दिल्ली में खेल कर आई।

विद्यालय की टीम के प्रबंधक अध्यापक हीरालाल जयपाल से बातचीत करने पर उन्होंने बताया कि इस बार हमारी टीम की चार खिलाड़ियों का राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए राजस्थान की स्टेट टीम में चयन होने की संभावना है, यह जनवरी 2017 में स्पष्ट होगा। यह आगे बताते है कि पांच साल पहले आटी गाँव के इस विद्यालय में लड़कियों की संख्या संतोषजनक नहीं थी। वर्तमान में कुल 367 विद्यार्थियों में से 45 फीसदी लड़कियां अध्ययनरत हैं जो कि एक बड़ा बदलाव है। यह विद्यालय अभी तक माध्यमिक स्तर तक है इसलिए विद्यालय की अधिकांश लड़कियों की पढाई 10 वीं कक्षा तक पढ़ने के बाद छूट जाती है। ऐसे में यहाँ विद्यालय उच्च माध्यमिक स्तर तक होना बेहद जरुरी हो जाता है।

जहाँ लड़कियों को खेलने के लिए बाहर भेजना तो दूर उन्हें पढ़ाने के बारे में नहीं सोचा जाता था वहां से अब 6 बेटियां हैंडबॉल की स्टेट लेवल चैंपियन हैं। ये 6 प्रतिभाशाली बेटियां है, सोहन कंवर, सुशीया मेघवाल, पुष्प कंवर, संगीता मेघवाल, जस कंवर और डाली मेघवाल। तीन खिलाड़ी राजपूत समुदाय से हैं जो इस समुदाय में व्याप्त पर्दा प्रथा को नकार कर अपने गाँव, जिले और राज्य का नाम रोशन करते हुए अपनी पहचान स्थापित कर रही हैं। कुछ साल पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि आटी गाँव में इस समुदाय से राज्य स्तरीय खिलाड़ी निकलेंगी। लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। इनके साथ-साथ 3 खिलाड़ी मेघवाल समुदाय से हैं जो कि अनुसूचित जाति वर्ग में आता है। इनके बारे में भी यही कहा जा सकता है कि इन्होंने गांव, जिले और राज्य की उन लड़कियों के लिए एक मिसाल कायम की है जिनको अब भी लगता है कि खेलने का काम सिर्फ लड़के ही कर सकते हैं। इन सभी बेटियों ने साबित किया है कि मामला अवसर मिलने का है, उन पर भरोसा जताने का है। फिर वे भी खेलों में अपनी पहचान खुद बना सकती हैं।

हीरालाल जयपाल लड़कियों को हैंडबॉल खेलने के लिए तैयार करने में आने वाली दिक्कतों के बारे में बताते हुए कहते है कि, “गाँव में लड़कियों के मामले में सामाजिक नियम-कायदे आड़े आते हैं। लोगों की मानसिकता में रहता है कि लड़कियां ‘पराया धन’ है उन्हें आगे बढ़ाकर क्या हासिल होगा। इसके अलावा विद्यालय से अधिक दूरी, सरकारी सुविधाओं और उचित मैदान का अभाव भी इसमें बाधक तत्व रहे हैं।”  2007 से पहले आटी गाँव के इस माध्यमिक विद्यालय का खेलों में परिणाम शून्य था लेकिन 2012 के बाद से हैंडबॉल में यह विद्यालय जिले और राज्य में अपना नाम बना चुका है। इस विद्यालय की बालिकाओं की सफलता के बारे में यहाँ के प्रिंसिपल गोपाल भादू कहते है कि, “लड़कियों के परिजनों को यह समझाना मुश्किल रहा कि उनकी बेटियां भी खेलकूद में अपना, परिवार, समाज के साथ-साथ जिले और राज्य का नाम रोशन कर सकती हैं। बहुत बार समझाइश के बाद वे अपनी बेटियों को खेलने के लिए बाहर भेजने पर राजी हुए। इसके बाद जो परिणाम रहा वह टीम प्रभारी और बच्चियों की मेहनत का नतीजा है तभी इस बार इन्होंने राज्य स्तर पर दूसरा स्थान प्राप्त किया। ये बच्चियां खेल के साथ-साथ पढाई में भी अव्वल हैं।”

जहाँ बेटियों को उनके परिपक्व होने से पहले ही शादी के बंधन में डालकर उन पर तमाम तरह की पारिवारिक जिम्मेदारियों तले उनकी ज़िंदगी सीमित कर दी जाती है वहां दलित समुदाय और लड़कियों के मामले में बेहद कठोर रहने वाले राजपूत समुदाय की लड़कियों ने हैंडबॉल खेल में अपनी सफलता से दिखाया है कि वे भी अपनी पहचान बनाना जानती हैं। उनके भी अपने सपने हैं जो अब तक पितृसत्तात्मक और जातीय सामाजिक व्यवस्था के चलते दबे हुए थे। लेकिन अब वे यह समझ चुकी हैं कि उनका भी एक वजूद है जो उन्होंने खुद अपनी काबिलियत और लगन के दम पर बनाया है। अब इनकी वजह से गाँव की अन्य लड़कियों को भी समझ में आ रहा है कि उनका जीवन सिर्फ घर तक सीमित रहने के लिए नहीं है।

लेखक कुमार सुधीन्द्र सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र टिप्पणीकार है। संपर्क: +91-9829994467, [email protected]

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