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सैय्यद मदारी उर्फ एक बंजारा जमात

कभी एक्सट्रा आर्टिस्ट के तौर पर काम करने वाला अक्षय कुमार आज बालीवुड का सुपर स्टार कहलाता है। मगर सैय्यद मदारी नाम की जमात से एक भी स्टार नहीं उभरता, ऐसा क्यों ? हो सकता है कि आपको मालूम हो कि आजादी के तीन दशक बीत जाने के बाद हिन्दी फिल्मों में जब जन आक्रोश को एक्शन का रंग-रूप दिया जाने लगा तो हीरो के ज्यादातर स्टण्ट सैय्यद मदारी ही किया करते।

कभी एक्सट्रा आर्टिस्ट के तौर पर काम करने वाला अक्षय कुमार आज बालीवुड का सुपर स्टार कहलाता है। मगर सैय्यद मदारी नाम की जमात से एक भी स्टार नहीं उभरता, ऐसा क्यों ? हो सकता है कि आपको मालूम हो कि आजादी के तीन दशक बीत जाने के बाद हिन्दी फिल्मों में जब जन आक्रोश को एक्शन का रंग-रूप दिया जाने लगा तो हीरो के ज्यादातर स्टण्ट सैय्यद मदारी ही किया करते।

यह और बात है कि मायानगरी में 30 साल से ज्यादा बिताने पर भी इन्हें न शोहरत मिली, न दौलत। कुछ लोग इसे सैय्यद मदारी की बदकिस्मती मानते हैं तो बहुत से लोग पहुंच न होने पर अफसोस जताते हैं। बहरहाल अब्दुल, सैय्यद मदारी जमात का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा नौजवान है। सैय्यद अब्दुल 10वीं पार कर चुका है। वैसे तो देश के असंख्य बच्चे 10वीं पार कर चुके हैं। फिर भी अब्दुल की बात खास इसलिए है क्योंकि इससे पहले तक तो सैय्यद मदारियों ने काले अक्षर पढ़ने की सोची भी न थी। पर आज की पीढ़ी पढ़ना चाहती है। वह क, ख, ग की रस्सियों पर चलकर बदलाव के नए खेल दिखाना चाहती है। सैय्यद अब्दुल से आगे अब कई नाम जुड़ने को बेकरार हैं; मसलन- सैय्यद फातिमा, सैय्यद सिंकदर, सैय्यद फारूख, सैय्यद कंकर, सैय्यद शेख तय्यब, सैय्यद वंशी, सैय्यद वशीर……..

सैय्यद मदारी एक बंजारा जमात है। गली-मोहल्लों में हैरतअंगेज खेल दिखाना इनका खानदानी पेशा रहा है। मगर सबसे हैरतअंगेज खेल जो हुआ वो यह कि ‘जाति शोध केन्द्र’ और ‘जाति आयोग’ की सूचियों में ‘सैय्यद मदारी’ जमात का जिक्र तक नहीं मिलता है। इसलिए महाराष्ट्र में इनकी कुल संख्या का आकड़ा भी लापता है। अनुमान है कि महाराष्ट्र में महज 700 सैय्यद मदारी परिवार होंगे। थोड़े-थोड़े अंतराल से यह अपने ठिकाने बदलते चलते हैं। याने यह अपने बुनियादी हकों से दूर होते चलते हैं। ऐसे में जिला बीड़ से 80 किलोमीटर दूर सैय्यद खेड़करी बस्ती में आने के बाद मेरे जैसे कइयों की धारणा टूट जाती है।

यहां सैय्यद मदारी के 52 छोटे-छोटे और सुंदर झोपड़ों में 354 लोग रहते हैं। सैय्यद रफाकत से पता चला कि यह जमीन पहले दरगाह की थी, जिसे 1998 को 99 साल के लिए लीज पर लिया गया। तब पहली मर्तबा इन्हें चिट्ठी मंगवाने का पता नसीब हुआ। आज हर घर में पीने का पानी और बिजली की रौशनी भी है।

1998 को ही बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए ‘गैर-औपचारिक केन्द्र’ खुला था। उस समय पढ़ाई-लिखाई की स्थिति 0 थी। लेकिन इन दिनों 1 से 11 क्लास तक कुल 20 बच्चे पढ़ते हैं। यह बच्चे बचपन (स्कूल) से जवानी (कालेज) की सीढ़ी पर चढ़ने को हैं। और अब्दुल, इन्हीं में से एक है।

ऐसा संभव हुआ- ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ और ‘राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ संस्थाओं की मिलीजुली कोशिशों से। सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मीक निकालजे ने कहा- ‘‘जो काम हम करते थे, अब वही अब्दुल को करते हुए देखने से खुशी मिलती है। 11 साल पहले यहां के लोग शिक्षा के नाम पर 5 मिनिट भी नहीं बैठ पाते थे। इसलिए पढ़ाई-लिखाई को दिलचस्प बनाने और उसकी जरूरत का एहसास दिलाने में सालों खर्च हो गए। जब कुछ को शिक्षा की अच्छाइयां दिखने लगी तो वह अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे। आज इन बच्चों की समझ बड़ी है, जमात में पूछ-परख भी।’’

बिन कागज सब सून : जैसा की ऊपर कहा जा चुका है कि ‘जाति शोध केन्द्र’ और ‘जाति आयोग’ की सूचियों में ‘सैय्यद मदारी’ जमात का जिक्र तक नहीं मिला, जिसके चलते अब्दुल जैसे बच्चे आगे नहीं बढ़ सकते थे। जाति प्रमाण-पत्र के बगैर सैय्यद मदारियों के यह बच्चे दूसरी जाति के बच्चों की तरह अधिकार और सुविधाएं नहीं पा सकते थे। इसलिए दोनों संस्थाओं ने सैय्यद मदारियों के साथ मिलकर जाति प्रमाण-पत्र के लिए लड़ाई लड़ी। सामाजिक कार्यकर्ता सतीश गायकबाड़ ने कहा- ‘‘हमने अपनी पहचान के कागज मांगने के लिए बहुत कोशिश की। यहां से 80 किलोमीटर दूर बीड़ जाकर कलेक्टर साहब को अपना हाल सुनाया। उन्हें तो जाति का सबूत ही चाहिए था। जिले के ज्यादातर अफसर सैय्यद मदारियों को नाम से जानने के बावजूद कुछ नहीं कर सके। वो हर बार कानून में बंधे होने का हवाला देते और हम बार-बार खाली हाथ लौटकर आते।’’ यहां से सवाल उठा कि जो सैय्यद मदारी सरकार के काम-काज से जुड़े ही नहीं, वो अपने लिए जाति का कागज लाएं भी तो कहां से ?

इसके बाद जाति प्रमाण-पत्र की यह लड़ाई प्रदेश के ‘सामाजिक कल्याण व न्याय विभाग’ तक पहुंची। इस विभाग के बड़े अफसरों ने संस्थाओं के तर्क को जायज माना। आखिरकार महाराष्ट्र सरकार ने बीते साल (2009) एक ऐसी व्यवस्था बनाने का फैसला लिया है जो सैय्यद मदारियों को जाति का प्रमाण-पत्र हासिल करने में मदद करेगी। फिलहाल यह व्यवस्था दस्तावेजों में दर्ज है, बस अब इसके प्रकाशन का इंतजार है।

इस खुशखबरी ने सैय्यद खेड़करी बस्ती में ईद जैसी खुशियां बिखेर दीं। इससे उन 60 बच्चों को भी स्कूल से जोड़ने में मदद मिलेगी जो मदारी का खेल दिखाने के लिए बाहर जाते हैं। ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ से अनिल जेम्स ने कहा- ‘‘यहां खेल में भी बेजोड़ प्रतिभाएं हैं। खासकर जिमनेस्टिक और एथलेटिक्स में। इन्हें सिर्फ सही मौका चाहिए है। अगर यह राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं तक पहुंचे तो यकीन मानिए कमाल दिखाएंगे। इस तरह भी तो उनकी पहचान बदल सकती है।’’

सैय्यद अब्दुल ने बताया- ‘‘मेरा कोई दोस्त पांचवी में छूटा, कोई आठवीं में। इस तरह कई दोस्त स्कूल से बाहर हो गए। वो कहते कि पढ़ने-लिखने से दाल-रोटी नहीं चलती। उनके अब्बा-अम्मी भी यही कहते कि अगर जाति का प्रमाण-पत्र नहीं मिला तो नौकरी नहीं मिलने वाली।’’ सैय्यद अब्दुल के पड़ोस से फातिमा चाची ने बताया- ‘‘तब लगा था कि अगर किताबों में फंसकर बच्चे अपने खेल भूल गए तो वो न इत के रहेंगे न उत के, बेकाम हो जाएंगे।’’ मगर जाति प्रमाण-पत्र नहीं होने के बावजूद कुछ बच्चे पढ़ते रहे। इन्हें अपना घर और उसका पता तो मिल गया था, जाति की पहचान का हक नहीं मिला था। और अब इसके मिलते ही पढ़ाई-लिखाई की राह का सबसे बड़ा रोड़ा भी हट जाएगा।

यही वो फोटो है

सैय्यद सिंकदर जैसे कई बच्चों के पास बालीबुड के स्टार और बड़े नेताओं के दर्जनों एल्बम हैं। हमने एक के बाद एक फोटो को पलटा तो जाना कि जो हम सोच नहीं पाते, सैय्यद मदारी कर दिखाते हैं। मसलन- आग के गोले से पार होना, आंख की पलक से 10 किलो का पत्थर उठाना, साइकिल को बालों से बांधकर घुमाना, ट्रक या टेम्पों को चोटी से बांधकर सरकाना, हाथ से पत्थर फोड़ना, सिर से नारियल फोड़ना, दांत से कांच चटकाना आदि-आदि इत्यादि। जब तक खेल चलता है, सैय्यद मदारी का पेट भरता है। एक बार बुढ़ापा हावी हुआ या चूके तो समझो गए काम से। जाहिर है सबसे बड़ी चुनौती है उम्र और जिन्दगी की सुरक्षा। इनकी जिन्दगी की शब्दावली में ‘हेल्थ आफ केयर ‘ या ‘इन्शोरेंस’ जैसे शब्द नहीं हैं। हर रोज खेल-खेल में मरने का डर है। कुछ मरते भी हैं, मगर बाकी लोगों की जिंदगी नहीं रूकती है। वह भीड़ के बीचोबीच, नए-नए खेल लेकर आती है। सैय्यद सिंकदर की सुने तो- “दो हाथ से मोटर साइकिल खींचने वाले दारासिंह को बच्चा बच्चा जानता है। पर एक हाथ से दो मोटर साइकिल रोकने वाले सैय्यद मदारियों को कोई नहीं जानता।”

इस बीच कुछ धुंधले पड़ गए एल्बमों में इनके पिता अपनी ब्लेक-एण्ड-व्हाइड इमेज लिए अमिताभ, विनोद खन्ना, जितेन्द्र और धमेन्द्र के साथ खड़े दिखे। अबके लड़के रंगीन कपड़ों में शाहरूख, सलमान, गोविन्दा, संजय दत्त से बतियाते हैं। हीरोइनों की फोटो कम ही हैं। जो हैं उनमें पुराने जमाने की रेखा, हेमामालिनी, जीनत अमान, नीतू सिंह दिखती हैं। एक फोटो ऐसा भी है जिसमें शो खत्म होने पर प्रियंका और राहुल गांधी हाथ मिलाते हैं। दूसरी फोटो में खुद सोनिया गांधी पीठ ठोंकती हैं। हर फोटो के पीछे एक कहानी है, जिसे सुनाना यह नहीं भूलते। ऐसे सारे फोटो जोड़ो तो हजारों कहानियों जुड़ जाए।

आखरी में सैय्यद फातिमा ने संस्था के कार्यकर्ताओं के साथ खिंचवाई एक फोटो निकाली और सबको बताते हुए कहा- ‘‘यही एक फोटो (कहानी) है, जो हमारे बदलाव से जुड़ी है।’’

लेखक शिरीष खरे सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार हैं. इन दिनों वे ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के ‘संचार-विभाग’ से जुड़े हैं.

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