: स्वयं का मीडिया स्थापित करें राजनीतिक दल : हाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी ने प्रेस को यह आश्वासन दिया है कि मीडिया के नियमन के लिए किसी भी तरह की कोई व्यवस्था सरकार के समक्ष प्रस्तावित नहीं है. उसे स्व-नियंत्रण की आजादी मिलती रहेगी. तो यह सबसे ज्यादा ताज्जुब की बात है कि ‘मीडिया’ समाज का एकमात्र क्षेत्र है, जिसके नियमन के लिए कोई कानून या संस्था नहीं है। यह एक ऐसा स्तंभ है जिसे स्व-नियंत्रण की सुविधा प्राप्त है। पेशेवराना तौर पर उसके किसी भी गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए दंडित करने का कोई प्रावधान नहीं है। जबकि तमाम पौराणिक आख्यान इस बात की गवाही देते हैं कि ‘स्व-नियंत्रण’ जैसी किसी चीज को होना विरले ही संभव है। गोस्वामी जी ने लिखा कि ‘समरथ को नहि दोष गुसाईं’ या ‘प्रभुता पाई काह मद नाहूं।’
विगत लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद पार्टी से सहानूभूति रखने वाले अमेरिका के कुछ भारतीय अप्रवासी समूहों ने कारण और परिणामों पर एक अध्ययन किया। उनका निष्कर्ष यह था कि समाचार माध्यमों द्वारा महंगाई, आतंकवाद आदि से जुड़े विषयों को तबज्जो नहीं देना इस परिणाम का कारक रहा। मोटे तौर पर कांग्रेस का मीडिया प्रबंधन इस मामले में काफी सफल रहा। बकौल अध्ययन- मोटे तौर यूपीए के प्रबंधकों का ध्यान किसी मुद्दे को उभारने में नहीं, बल्कि मुद्दे को खतम कैसे किया जाय इस पर रहा है. इसके अलावा उस चुनाव से शुरू हुए पेड न्यूज़ की परंपरा ने जो लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाया वह कोई रहस्य नहीं रहा है। तो मोटे तौर पर उस अध्ययन दल का मानना था कि बीजेपी समेत सभी बड़े राजनीतिक दलों का अपना पेशेवर समाचार माध्यम हो और उसी के माध्यम से अपनी नीतियों और योजनाओं का वह प्रचार-प्रसार करे.
बहरहाल, जैसा कि सभी जानते हैं कि चुनाव लडऩा और जीतना राजनीतिक दलों के लिए जीवन मरण का प्रश्न होता है और आप पर उछाला गया एक कीचड़, जो बाद में भले ही गलत साबित हो जाय, आपके सारे किये धरे पर पानी फेरने के लिए पर्याप्त होगा। मीडिया में वह ताकत है कि बड़े मेहनत से आपके द्वारा बनायी गयी छवि को एक दिन में मटियामेट कर सकता है। लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम रहम नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में। तो सवाल यह है कि इतनी बड़ी ताकत के लिए किसी भी तरह का कोई नियामक क्यों नहीं हो? और अगर ऐसा कोई नियमन करना संभव नहीं हो तो जो संसाधन इनको देकर राजनीतिक दल पेड न्यूज़ की सुविधा प्राप्त करते हैं, उन्ही संसाधनों का इस्तेमाल कर खुद का ही संस्थान क्यू ना स्थापित कर लिया जाय? विगत चुनाव में किस तरह से मीडिया कंपनियों ने राजनीतिक दलों से फिरौती वसूली है, इस पर टनों ‘कागद कारे’ किया गया है। कम से कम दलों का अपना माध्यम होने से यह तो होगा कि नागरिक यह जान पायेंगे कि वह स्पष्ट तौर पर अमुक दल का विचार जान रहे हैं।
जैसा कि सर्वज्ञात है, चुनाव आयोग यह मानकर चलता है कि देश के किसी भी एक कोने का राजनीतिक रुझान दूसरे कोने तक को प्रभावित कर सकता है। इसलिए चाहे चुनाव की पूरी प्रक्रिया कितनी भी लंबी, उबाऊ या थकाव क्यों न हो, चुनाव का परिणाम वे एक साथ ही घोषित करते हैं। लेकिन मीडिया वाले अपने स्टूडियो के कमरे या कुछ शहरों के होटल में बैठकर कुछ नौसिखिए या अप्रशिक्षित हाथों द्वारा संग्रहित किये गये आंकड़े के आधार पर पूरे देश का भविष्य तय कर देते थे। कुछेक तीर-तुक्का जैसे अपवादों को छोड़ दिया जाय तो बार-बार यह साबित हुआ है कि उनके सर्वेक्षण किसी सड़क छाप ज्योतिषि के भविष्य फल से भी ज्यादा बकवास साबित हुए हैं। बावजूद इसके बिना किसी संकोच के सेफालॉजिस्ट नामक वो महारथी, अपनी गंभीर मुख मुद्रा में भी कभी कभार हल्की सी मुस्कान बिखेरते अगले ही रोज से आपको स्टूडियो में हाजिर दिखते थे। अब कम से कम चुनाव के दौरान ऐसे किसी सर्वेक्षण पर लगाम लगा कर एक अच्छा काम किया गया है। अब काफी हद तक सख्ती के कारण चुनावी ज्योतिषियों पर लगाम लगाने की कोशिश की गयी है। ना केवल चुनाव के समय बल्कि हर उस अवसर पर जब देश का भविष्य तय होना हो मुख्यधारा का मीडिया ‘खेल’ करने से बाज़ नहीं आता।
पिछली संसद में विश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौर को याद कीजिये। सारा विपक्ष इस बात पर एकमत था कि भाजपा की मदद से किये गये स्टिंग आपरेशन को दिखाया जाय। लेकिन बड़े ही शातिर तरीके से चैनल ने गेंद स्पीकर के पाले में डाल दी थी। जबकि यह तथ्य है कि संसद से संबंधित किसी भी आपरेशन में आजतक किसी को भी ऐसी अनुमति लेने की जरूरत नहीं रही है। चैनल बिना लाग-लपेट के बेधड़क वेश्याओं तक का जुगाड़ कर ऐसा आपरेशन करते और दिखाते रहे हैं। लेकिन उस घटनाक्रम में यह शंका करने का पर्याप्त कारण था कि चैनल कोई सौदा करने के लिए पर्याप्त समय चाहता था। चूंकि संसद से बाहर हुए किसी घटनाक्रम के लिए स्पीकर कोई व्यवस्था नहीं दे सकते थे। इसलिए यह तय था कि टेप नहीं दिखाने की नौबत आयी तो कह सकते थे कि स्पीकर ने अनुमति नहीं दी और अगर ‘स्टोरी’ पूरी हो जाती तो कहने को गुंजाइश बची थी कि स्पीकर ने मना नहीं किया दिखाने को। वाह… क्या खरा सौदा है। तो सवाल यह है कि इतने शातिराना तरीके से बेलगाम होते जा रहे मीडिया पर नियंत्रण कैसे हो? इस बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?
सरकारें तो खुद इनके सामने भीगी बिल्ली बनी रहती हैं। तो इनके अतिवाद से जनता को मुक्ति कैसे मिले? किसी भी पार्टी की सरकार हो, उसे तो अधिकतम 5 वर्ष में जनता के दरबार में जाना होता है (कई बार तो 6 महीने में ही)। उसकी यह मजबूरी है कि जनता इन माध्यमों के द्वारा ही राजनीतिक दलों का हाल जानेगी। अत: नेतागण तो पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर लेने से रहे। जबकि इसके उलट मीडिया केवल और केवल बाजार के प्रति जिम्मेदार है। उसे अपने टीआरपी से मतलब है। अत: बाजार में बाजारू बनकर ही आराम से रहा जा सकता है। तो लोकतंत्र के सभी स्तम्भ इस समस्या पर विचार करें। तेजी से बदलते जा रहे सामाजिक एवं प्रौद्योगिक परिस्थितियों में राजनीतिक दलों को चाहिए कि वह स्वयं का मीडिया संस्थान स्थापति करे। बाजारू मीडिया के एकाधिकार को तोडऩे का यह सबसे बेहतर उपाय होगा।
इस मामले में सबसे अच्छा उदाहरण केरल में माकपा का है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में यह एक ऐसी पार्टी है जिसके द्वारा 2 टेलीविजन चैनल और एक दैनिक समाचार पत्र का संचालन किया जा रहा है। एक मोटे अनुमान के अनुसार केरल में इस पार्टी के पास 4000 करोड़ की व्यावसायिक परिसम्पत्ति है। इसके अलावा शिवसेना के मुखपत्र से भी पाठकों का सामना होता ही है। एक अकेले अपने उस मुखपत्र की बदौलत शिवसेना की मीडिया पर निर्भरता अपेक्षाकृत न्यून हो गई है। फिर वामपंथियों के मुखपत्र को भी, कई बार गंभीरता से पढ़ा जाता है। इसके अलावा भाजपा भी अपने केंद्रीय प्रकाशन एवं 10-12 राज्यों के प्रकाशनों द्वारा अपनी बात कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने का प्रयास करती है। लेकिन केरल या दक्षिण के राज्यों के अपवाद को छोड़ दें तो ऐसा कोई दल नहीं है जो अपने संस्थान को वैकल्पिक मीडिया के रूप में प्रस्तुत कर सके। चुनाव आयोग भी ये कर सकता है कि वह एक समय सीमा के बाद राजनीतिक दलों के लिए अपना प्रसारण संस्थान होना बाध्यकारी कर दे।
वैसे यह इतना आसान भी नहीं है और इसमें सर्वानुमति बनाने की भी जरूरत होगी। लेकिन एक बार ऐसा हो जाने पर, चीजें आसान होती चली जाएंगी। एक तो मीडिया का एकाधिकार खत्म होगा, दूसरा राजनीति की मुख्यधारा से पढ़े लिखे लोग जुड़ेंगे। राजनीति को भी सकारात्मक पेशेवराना अंदाज प्राप्त होगा। बाद में पोस्टर, पम्प्लेट, दीवार लेखन आदि को प्रतिबंधित कर अनाप-शनाप खर्चें को रोका जा सकता है। पर्यावरण की सुरक्षा भी हो सकती है। लोगों का लाखों की संख्या में प्रयोजित रूप से इकट्ठा होना बंद हो जायेगा। इससे भी पेट्रो पदार्थों की बचत होगी साथ ही लोगों को रोज-रोज के धरना प्रदर्शन और सड़क जाम से भी मुक्ति मिलेगी। और सबसे बड़ी बात यह कि किसी पार्टी को अपनी बात रखने के लिए मीडिया के चिरौरी की जरूरत नहीं होगी। एक स्वस्थ प्रतियोगिता कि शुरुआत होगी अत: राजनीतिक लोग भी ब्लैकमेल होने और करने से बचेंगे। चूंकि आपके विपक्षी दल के पास भी वही औजार होगा अत: शक्ति संतुलन विकेंद्रीकृत होगा। इस तरह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का अपना सशक्त मीडिया संस्थान लोकतंत्र को उत्तरोत्तर मजबूत और आधुनिक बनाने में मददगार ही होगा। कहावत है हर बड़ी बात एक छोटे विचार से ही शुरू होती है। एक बार विचार करके तो देखिए.
लेखक पंकज कुमार झा रायपुर से प्रकाशित ‘दीप कमल’ के संपादक हैं.

