: विरोध नहीं करने के चलते बढ़ रहा भ्रष्टाचार : ऐसा दौर भी आयेगा शायद किसी ने न सोचा था, ‘सोने की चिड़िया’ कहे जाने वाले देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला इस हद तक होगा कि गरीबी मिटाने का राग अलापने वाले ही गरीबों का हक लील जायेंगे और गरीब भूखों मरेंगे, अन्नदाता कृषक फटेहाल जीवन यापन को विवश होकर आत्मदाह व आत्महत्या करेंगे। मां-बहनों की आबरू गुण्डे-माफिया घरों में घुसकर तार-तार करेंगे, घोटालों पर घोटाला करने वालों की पौ बारह होगी, महंगाई सुरसा की भांति ऐसा मुंह फैलायेगी कि देश का आम नागरिक त्राहि-त्राहि करेगा और लोग भूखों मरने को विवश होंगे। उपरोक्त ऐसे तमाम सवाल केवल मेरे मन-मस्तिस्क में ही नहीं बल्कि देश के सभी जागरूक नागरिकों के दिलो-दिमाग में हलचल मचाते है। बावजूद इसके हम मौन हैं, चुपचाप बैठे हैं, आखिर क्यों?
यह एक यक्ष प्रश्न है! क्या यह सोचकर कि समृद्ध हो चुके भ्रष्टाचार पर अब नियंत्रण नही किया जा सकता, भूख से मरने वाले गरीबों को खाद्यान मुहैया नहीं कराया जा सकता, चरित्र से गिर चुके राजनेताओं द्वारा संचालित सरकारों का तख्ता पलट नहीं किया जा सकता, आस्तीन में पलते विषधर नागों का फन नही कुचला जा सकता, आज देश के जो भी हालात हैं, उसमें काफी हद तक हम और आप भी दोषी हैं, जरूरत तो आत्म अवलोकन की है। जरा सोंचे क्या हम गांव स्तर पर वर्तमान बदले परिवेश में स्वच्छ छवि व ईमानदार व्यक्ति को प्रधान बनवा पाते हैं, शायद नही! क्योंकि उस समय हमारे दिलो-दिमाग में राष्ट्र निर्माण व सामाजिक संरचना का उद्देश्य गायब हो चुका होता है, यही कारण है कि आज लोकतंत्र के लिये भ्रष्टाचार मुक्त सरकार मात्र एक सपना बनकर रह गई है। विश्व में अनोखी पहचान रखने वाले भारत की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को संचालित करने वाले जनप्रतिनिधि, राजनेता जातिवाद, परिवारवाद, स्वार्थवाद और क्षेत्रवाद का चोला पहनकर अवसरवादी राजनीति की दूषित चाल से देश के आम नागरिकों को गुमराह कर खुले मन से भ्रष्टाचार में लिप्त होकर अनैतिक धन उगाही करते हुये देश की जड़ों को खोखला करने में जुटे हुये हैं।
इनकी इन करतूतों से देश का आम नागरिक भली-भांति वाकिफ भी है, यही वजह है कि आज देश के हर कोने में बुद्धिजीवी, समाजसेवी, जागरूक वर्ग में आस्तीन में पल रहे इन विषधर नागों के फन की चर्चा बड़े पैमाने पर हो रही है। ये विषधर नाग लगातार देश की आम जनता को डंसने में मशगूल हैं। वर्तमान में देश की स्थिति किसी भारतीय से छिपी नही है, आज देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते गरीबों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है, किसानों, बुनकरों की हालात दिन-ब- दिन जर्जर होती जा रही है। ग्रामसभा से लेकर संसद तक देश की आम जनता का शोषण करने वाले राजनेताओं एवं अफसरशाहों की भ्रष्टाचारी नीतियां पूरी तरह से जनता की जेबें खाली कर अपनी-अपनी तिजोरियां भरने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे में सुनिश्चित है कि यदि इन विषधर नागों के फैलते फन को कुचलने के लिए हम और आप संगठित न हुये या यू कहें कि देश का आम नाकरिक जागरूक न हुआ तो खुद तो शोषित होते हुये अनचाही-अनजानी पीड़ा का शिकार बनेगा ही आने वाली पीढ़ी को भी नारकीय जीवन देकर जायेगा।
जरा सोचिए आजादी की जंग में मां भारती के अनगिनत वीर-सपूतों ने क्या इसलिए शहादत दी कि आजादी के उपरान्त आजाद भारत के लोग ही मां भारती के वक्ष को घायल करें या इसलिए शहादत दी कि सोने की चिड़िया कहा जाने वाला अपना प्यारा भारत देश कंगाल हो जाये, विदेशी कर्ज के बोझ तले इस हद तक दब जाये कि गर्भ का बच्चा भी कर्ज में डूब जाये। आज स्थित यह है कि गरीबी के चलते यहां जिस्म ही नहीं कोख भी बेचने को मजबूर हो गये है लोग। एक ओर लाखों टन खाद्यान्न शासन-प्रशासन की गलत नीति निर्धारण के चलते सड़ जाता है वहीं दूसरी ओर भुखमरी के चलते बुझावन, कलुवा जैसे न जाने कितने परिवार अपने बीबी बच्चों सहित सल्फास खाकर जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। आखिर क्यों? विचारणीय तो यह है कि पेट की आग बुझाने के लिए जहां नौनिहाल बच्चे बंधुआ मजदूरी करने को विवश हो रहे हो और ममता बच्चों को पालने के लिए जिस्म तो जिस्म कोख तक बेचने को मजबूर हो वहीं लाखों टन अनाज यूं ही सड़ जाये, जिस कागज पर न्याय अंकित होता हो उसमें भी तेलगी काण्ड हो जाये! चारा, खाद, धान, चीनी, गेहूं, चावल, अस्त्र-शस्त्र कुछ भी घोटालों से वंचित न रह पाये, भ्रष्ट नेता व अफसर मौज मनायें, ये दोनों सांठ-गांठ कर तिजोरी भरें, गरीब भूखों मरे आखिर क्यों?
हम ऐसे भ्रष्ट नेता का चुनाव ही क्यों करें और यदि करते हैं तो निश्चित तौर पर हम आप इन भ्रष्टों से कहीं अधिक दोषी हैं। भूख से मरने वालों
की असामायिक मौत के जिम्मेदार हम भी हैं। जरा गौर करें आजादी के वाद से अब तक नेताओं द्वारा यही राग अलापा जाता रहा है कि हम गरीबी मिटायेंगे, भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करेंगे, लेकिन आजादी के 63 वर्ष गुजर गये, गरीबी तो मिटी नहीं अलबत्ता गरीब जरूर मिटते रहे। भ्रष्टाचार की जड़े मजबूत होती रहीं, स्थिति यह है कि मंहगाई का बोलबाला है और आम आदमी का दिवाला निकला जा रहा है, फिर भी हम आप यूं चुप हैं, आखिर हम और आप कब तक अपने मुंह में ताला लगाये रखेंगे। वर्तमान परिवेश का दृश्य किसी से छिपा भी नही है आलम यह है कि गलत-सही उचित-अनुचित दोनों कार्यों में घूस यानी ‘सुविधा शुल्क’ का चलन है, इसके बगैर न तो नेता जी द्वारा कोई सिफारिस संभव है और न ही बाबू द्वारा फाइल को आगे बढ़ाना।
सर्वविदित है कल तक नौटंकी में नृत्य करने वाला, साइकिल की दूकान करने ताला, जनता जनार्दन द्वारा नेता बनाये जाने पर भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा तो करता है, किन्तु सत्ता पाते ही भ्रष्टाचार में इस तरह लिप्त हो जाता है कि चन्द महीनों में ही वह अकूत धन व सम्पदा का मालिक बन बैठता है। और तो और अब तो सत्ता हथियाने के हथकण्डे इस हद तक अपनाये जाने लगे हैं कि भ्रष्ट तरीके से अर्जित अकूत धन से विधायकों व सांसदों की भी खरीद-फरोख्त की जाने लगी है, नेताओं की इस प्रवृति का फायदा अफसरशाहों ने भी जमकर उठाना शुरू कर दिया है, काली कमाई, घूस-खोरी इनकी भी दिनचर्या बन चुकी है, दोनों में बेहतर तालमेल भी है, ये भी मनचाहा पद सत्ताधारियों को थैली-अटैची भेंटकर प्राप्त कर लेते हैं। ये नेता गोपनीय ढंग से थैली व अटैची लेते ही नहीं बल्कि कभी-कभी विधायकों-सांसदों को अपने पक्ष में कर सत्ता हथियाने व सरकार बचाये रखने के उद्देश्य से सदन तक में घूस के करोड़ों रूपये लेकर चले जाते है। संसद भवन तक में घूसखोरी के पैसा कह प्रदर्शन करने वाले इन नेताओं की करतूतों का लाइव प्रसारण भी हुआ, जिसे देश ही नही बल्कि सारे विश्व ने देखा, बावजूद इसके शर्म नही आई। हम-आप भी इन काली करतूतों पर कुछ क्षण निकाल कर इनको धिक्कारने के लिए एक पोस्ट कार्ड भी भेज पाते, नहीं लिखे! हम आप भी चुप्पी नही तोड़ते इसीलिए तो ये नेता भी भ्रष्टचार की अपनी कारगुजारी नही छोड़ते।
महानता साबित करने की होड़
विडम्बना देखिये कि नेता और अफसरशाही में गजब का तालमेल है। दोनों ही जनता को लूटकर अपना अपना खेल खेल रहे हैं, प्राकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण देश को नेताओं व अफशरशाही की कौम ने गरीब देश होने का एहसास कराकर आम आवाम को संसाधनहीन जीवन-यापन करने पर मजबूर कर रखा है। खुद देश से विदेश तक अपनी सम्पत्ति का विस्तार करने में मशगूल हैं। और तो और ये जब संग्रहित काले धन को नही पचा पाते तो मौके-बे-मौके सीधी-साधी जनता-जर्नादन के बीच अपनी महानता साबित करने के लिए तरह-तरह के आयोजन कर आवाम की सहानुभूति लूटने का भी नाटक रचते है। कभी ये अपने जन्मदिन के मुबारक मौके पर चेक वितरण करवाते हैं तो कभी साड़ी-कम्बल बंटवाकर ये जनता जनार्दन को बरगलाते है। कई बार ऐसा भी देखने में आया है कि इन आयोजनों में भीड़ बढ़ाने के लिए लालच देकर ढोकर ले जायी गई गरीब जनता, उपहार पाने की लालसा में जान तक गंवा देती है।
कोई अफसर अपने सरकारी आवास परिसर में ही खूबसूरत बालाओं ‘मॉडलों’ की प्रतियोगिता कराता है तो कोई करोड़ों की माला गले डलवाता है। देश की हालात अब किसी से नही छिपी है, नेताओं व अफसरशाहों की भ्रष्ट कारगुजारियों के चलते देश का बड़ा हिस्सा गरीबी व भुखमरी की दहलीज पर आ पहुंचा है। अधिकारियों का आलम यह है कि ये सरकार से जितना वेतन पाते हैं, उससे कई गुना ज्यादा धन ये अपने अधिकारों का नाजायज प्रयोग कर ‘सुविधा शुल्क’ के रूप में वसूलते हैं। इनके उस प्रयोग से असमाजिक तत्व भी अधिकारी बनकर पैसा कमाने का तरीका अपनाने लगे हैं, आये दिन ऐसी खबरें अखबारों में व न्यूज चैनलों में आपने देखी होगी कि फर्जी पुलिस इंस्पेक्टर, फर्जी टीटी, फर्जी आयकर अधिकारी अमुक जगह पर पकड़ा गया।
घूसखोरी इतने चलन मे आ चुकी है कि पढ़े-लिखे लोग भी भेष बदलकर और नकली अधिकारी बनकर धन दोहन के लिए जोखिम उठाने से नही घबड़ाते। मौजूदा हालात में तो अफसरशाहों के पालतू नुमाइन्दों ने नौकरी दिलाने, ठेका दिलाने की दुकानें भी खोल रखी है। देखने में आ रहा है कि योग्य शिक्षित एवं पात्र रिक्तियॉ भरने, डीडी लगाने व परीक्षा देने में चप्पल घिस डाल रहा है और तिकड़मी अयोग्य उम्मीदवार घूस देकर नौकरी पा रहे हैं, पुलिस भर्ती हो या रेलवे हर जगह दलालों की पौ बारह है। आंकडे़ जो कहते है- देखें
1- 2008 में देश में अरबपतियों की संख्या 27 थी जोकि 2009 में बढ़कर 54 हो गई यानी 100 प्रतिशत इजाफा।
2- 30,00,00,000 से ज्यादा लोगों को प्रतिदिन भर पेट भोजन नहीं मिलता।
3- 1.26 लाख से अधिक लोगों के पास पांच करोड़ रूपये तक के सम्पत्ति निवेश की हैसियत रखते हैं।
4- 6,30,00,000 से अधिक परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं।
5- 1,000 में से 250 लोग प्रतिदिन बिना भरपेट भोजन किये सो जाते हैं।
6- 100 करोड़ से अधिक की आबादी और ओलंपिक में सिर्फ एक स्वर्ण पदक।
लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.

