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हिंदी के दुल्‍हनियां संपादक और स्‍त्री धन

हिन्दी पत्रकारिता में स्त्री धन की बात भले ही कुछ अटपटी लगे मगर ऐसा कुछ हिन्दी पत्रकारिता में लगभग पिछले दो दशक से हो रहा है। सवाल यह भी किया जा सकता है कि जब स्त्री धन है तो फिर दुल्हन कौन है और स्त्री धन क्या है। इसके जवाब में कहा जा सकता है कि दुल्हन सम्पादक हैं और स्त्री धन इनके साथ चिपके रहने वाले पत्रकार। इन सम्पादकों को दुल्हनियां सम्पादक कह सकते हैं। जिस प्रकार नई दुल्हन जब ससुराल जाती है तो अपने साथ बहुत सा सामान उपहार के रूप में ले जाती है, जिसे दहेज या स्त्री धन कहा जाता है। ससुराल से जब उस का सम्बंध विच्छेद होता है तो वह अपने इस स्त्री धन को अपने साथ ले जाती है। अगर कोई सामान ससुराल में रह जाता है तो उसे या तो किसी कोने में उपेक्षित कर के डाल दिया जाता है या फिर बड़ी बेदर्दी के साथ उसका इस्तेमाल किया जाता है।

हिन्दी पत्रकारिता में स्त्री धन की बात भले ही कुछ अटपटी लगे मगर ऐसा कुछ हिन्दी पत्रकारिता में लगभग पिछले दो दशक से हो रहा है। सवाल यह भी किया जा सकता है कि जब स्त्री धन है तो फिर दुल्हन कौन है और स्त्री धन क्या है। इसके जवाब में कहा जा सकता है कि दुल्हन सम्पादक हैं और स्त्री धन इनके साथ चिपके रहने वाले पत्रकार। इन सम्पादकों को दुल्हनियां सम्पादक कह सकते हैं। जिस प्रकार नई दुल्हन जब ससुराल जाती है तो अपने साथ बहुत सा सामान उपहार के रूप में ले जाती है, जिसे दहेज या स्त्री धन कहा जाता है। ससुराल से जब उस का सम्बंध विच्छेद होता है तो वह अपने इस स्त्री धन को अपने साथ ले जाती है। अगर कोई सामान ससुराल में रह जाता है तो उसे या तो किसी कोने में उपेक्षित कर के डाल दिया जाता है या फिर बड़ी बेदर्दी के साथ उसका इस्तेमाल किया जाता है।

अब हिन्दी पत्रकारिता की बात करें- पिछले लगभग दो दशक में हिन्दी पत्रकारिता में कुछ ऐसे माफिया पत्रकार पैदा होते रहे हैं जिनमें योग्यता और प्रतिभा के नाम पर कुछ खास नहीं रहा मगर अपने सम्पर्कों एवं जुगाड़ के बूते ये लोग अखबारों में घुस जाते हैं। नई दुल्हन के रूप में इनका अखबारों में प्रवेश के साथ ही स्वागत भी होता है। ये दुल्हनियां सम्पादक स्त्री धन के रूप में अपने साथ जिन्हें ले जाते हैं, उसमें इनके गिरोह के कई लोग शामिल होते हैं, जिन्हें ये सहायक, स्थानीय, कार्यकारी और समाचार सम्पादक आदि के रूप में ले जाते हैं। जब इनका अखबार से सम्बंध विच्छेद या तलाक होता है तो ये अपने साथ लाए इस स्‍त्री धन को अपने साथ ही ले जाते हैं। जिसे ये नहीं ले जा पाते उसे उसके भाग्य पर छोड़ देते हैं।

इसका एक कारण जो देखने में आया वह यह कि इनमें से कई के पास योग्यता और प्रतिभा के नाम पर कुछ खास नहीं होता अगर कुछ होता भी है तो ये लोग एक प्रकार से भयभीत रहते हैं और अपनी सुरक्षा के लिए अपने गिरोह को अपने साथ ले जाते हैं।  इनके कुछ अनुचित कार्यों पर जब अखबार के पुराने लोग उंगली उठाते हैं तो इनका गिरोह इनकी सुरक्षा के लिए सामने आ जाता है। नब्बे के दशक में हम देखते हैं कि अज्ञेय जी, रघुवीर सहाय, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, कन्हैया लाल नंदन सरीखे योग्यता और प्रतिभा से सम्पन्न सम्पादक थे। इन सम्पादकों को कभी अपने सुरक्षा कवच की आवश्‍यकता नहीं रही। श्री माथुर का युग देखा था। माथुर साहब इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया से नई दिल्ली के नवभारत टाइम्स में आए थे, मगर स्त्री धन के रूप में पिछले अखबार के किसी सहयोगी को नहीं लाए। बात साफ थी कि इनमें प्रतिभा इतनी थी कि इन्हें अपने लिए कभी किसी सुरक्षा कवच की आवश्‍यकता नहीं  रही। अखबार में इनके समय में खूब नियुक्तियां हुईं, मगर सब कुछ इतना पारदर्शी था कि किसी को उंगली उठाने का अवसर ही नहीं मिला। न उन्होंने जातिवाद के आधार पर किसी को नियुक्त किया और न ही क्षेत्र के आधार पर। इसके विपरीत इन दुल्हनियां सम्पादकों का रिकार्ड उठा कर देख लीजिए, ये जहां भी जाते हैं सब से पहले वहां पहले से काम कर रहे कुछ प्रतिभावान पत्रकारों को डैडवुड घोषित कर बाहर कराते हैं, और फिर अगर इन्हें नई नियुक्तियां करने का अवसर मिलता है तो उनमें अधिकांश इनकी जाति से या क्षेत्र से सम्बंधित लोगों की होती है। इन दुल्हनियां सम्पादकों की आदत खुशामद पसंदी की होती है। जिन पहले से काम कर रहे लोगों ये डैडवुड करार देते हैं, वे असल में इनकी खुशामद नहीं कर पाते।

इस प्रकार आज हिंदी में पत्रकारों की एक पीढ़ी ऐसी है, जो स्‍त्री धन के रूप में अपने दुल्हनियां सम्पादकों के साथ चिपकी रहती है। कई बार ऐसा भी देखने में आया है कि ये पत्रकार सम्‍पादक के साथ तो चले जाते हैं, मगर बाद में कई बार इन्हें पछताना भी पड़ जाता है। सम्पादक तो कहीं न कहीं अपना जुगाड़ बिठा लेते हैं, मगर अपने इस स्त्री धन का जुगाड़ नहीं कर पाते, ऐसे में ये पत्रकार बेरोजगारी की मार झेलने को मजबूर हो जाते हैं। एकाध उदाहरण ऐसा भी सामने है कि इन दुल्हनियां सम्पादकों के लिए अखबार की तैयारी बड़े जोर-शोर से होती है। कार्यालय, अन्य आवश्‍यक सामान और स्टाफ का प्रबंध भी हो जाता है, मगर अपनी सही-गलत मांग पूरी न होने पर ये दुल्नियां सम्पादक अपने स्त्री धन को ले कर विदा हो जाते हैं और निकलने वाला अखबार प्रेस में जाने से पहले ही दम तोड़ देता है।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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