हरदोई के सुन्नी में 30 मई को ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ मनाया गया। जिसमें पत्रकारों, समाजसेवियों ने पत्रकारिता पर अपने विचार व्यक्त किए। एक स्वर से साफ और स्वच्छ पत्रकारिता करने के लिए पत्रकारिता के इतिहास को दोहराया गया। मुख्य अतिथि ने हिन्दी पत्रकारिता की तुलना माँ के प्यार दुलार से कर उसको खूब दुलराया गया। पत्रकारिता के मूल्यों पर गम्भीरता से चर्चा हुई। टावर प्लाट सुन्नी में आयोजित ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ पर पत्रकारों ने अपने मन की भड़ास निकाली। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रभारी चिकित्साधिकारी कछौना डा. आरपी दीक्षित ने ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ का अर्थ बताते हुए कहा कि अपनी भाषा का प्रचार प्रसार विस्तार ही विकास की जड़ है। आज इस जमाने में कितना भी हिन्दी का प्रभाव कम हुआ हो उसके बावजूद सबसे ज्यादा हिन्दी भाषी अखबार ही पढ़े जाते हैं।
उदाहरण देते हुए बताते हैं कि जिस तरह एक माँ अपने बच्चे का पालन पोषण करती है। उसी प्रकार भारतीय संस्कृति के सद्ग्रन्थ भी व्यक्ति को आगे बढ़ाते हैं। बस जरूरत है अपनी भाषा के मान सम्मान की रक्षा करने की। विशेष अतिथि के रूप में कछौना के वरिष्ठ पत्रकार जनमेजय त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट आ रही है। पत्रकारिता में पत्रकार पीछे और चाटुकार आगे हैं। समाज का बुद्विजीवी तबका हिन्दी समाचार पत्र पढ़कर सोचता है कि खबर में खुरापात क्यों होती है। खबर को बढ़ा चढ़ाकर प्रकाशित होने से लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ की गरिमा प्रभावित हो रही है। आम आदमी जिस तरह पुलिस की कार्यशैली से सन्देह में रहता है उसी तरह अब पत्रकार से भी वह सन्देह करने लगा।
मुख्य वक्ता के रूप में बोलते समाज सेवी राघवेन्द्र राघव ने कहा कि हिन्दी राज्य भाषा नहीं राष्ट्र भाषा घोषित किया जाए। पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास को बताकर उसका अनुकरण करने की बात कही। सभा अध्यक्ष एडीओ पंचायत राजकुमार सिंह ने कहा कि देश आजाद होने के बाद भी हिन्दी आजाद न हो सकी। परीक्षाओं में देखा जाता है कि प्रश्नपत्र हिन्दी में समाजशास्त्र का है फिर भी उसके पीछे अंग्रेजी में लिखा जाना अंग्रेजी की गुलामी का सबूत है। पूरी परीक्षा में उत्तर कोई अंग्रेजी में नहीं देता तो फिर हिन्दी भाषी प्रश्नपत्रों को अंग्रेजी में लिखना मातृभाषा का अपमान है। मंच संचालक सुरेश गुप्ता ने पत्रकारिता में कुछ वर्षों से हुए बदलावों पर अफसोस जताते हुए कहा कि अब लोगों का विश्वास हिन्दी पत्रकारिता से टूट रहा है। थानाध्यक्ष बघौली राकेश पाण्डेय ने कहा कि पत्रकारों शिकायती पत्र पर समाचार लिखते समय आरोपी और सम्बन्धित विभाग से भी वार्ता कर लेनी चाहिए जिससे पत्रकारिता की निष्पक्षता में और निखार आएगा।
कछौना के पत्रकार रामशंकर आजाद ने कहा कि पत्रकारिता के मूल्यों मे आ रही गिरावट चिन्ता का विषय है। पत्रकार मनोज तिवारी ने कहा कि आज के अखबार चाटुकारिता में मस्त हैं। उनको जनहित की खबरों से कम खास लोगों की फोटो और समाचारों में अधिक दिलचस्पी है। पत्रकार पीडी गुप्ता ने कहा कि समाज को आईना दिखाने वाले पत्रकारों के कारनामे इस तरह हैं कि वह खुद आईना देखने वाले नहीं तो समाज को आईना क्या दिखाएगें। पत्रकार देवेन्द्र गुप्ता ने कहा कि समाज में पत्रकारों के साथ उपेक्षा हो रही है। दूसरों की आवाज उठाने वाले मौन हैं। पत्रकार गोतेन्द्र तिवारी ने कहा कि एकता के साथ ही समाज में जनविरोधी ताकतों का सामना किया जा सकता है। ऐप्जा के जिला प्रभारी रौनक अली जैदी ने कहा कि पत्रकारों को एकजुट रहने के लिए जरूरी है कि सभी को एक दूसरे के सम्पर्क में रहना चाहिए। आयोजक सुधीर अवस्थी ने कहा कि पत्रकारों का सम्मान सर्वोपरि है। जो समाज के हित में अपने सुख और शान्ति की अनुभति करते हैं। ऐसे त्यागी और योगियों के दम पर ही हिन्दी पत्रकारिता का वजूद कायम है। पत्रकार राहुल मिश्र ने पत्रकारिता को जग जननी कहकर सम्बोधित किया। पत्रकार रमाकान्त शर्मा ने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता के विरोधी को हिन्दुस्तान में रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
इस अवसर पर अनुज गुप्ता, करूणाशंकर मिश्र, सत्येन्द्र मिश्र, अनूप मिश्र, पूर्व शिक्षक श्रीकृष्ण मिश्र, सूर्यनन्दन, प्रधान हरीराम, सेक्रेटरी मोहम्मद सलीम, आदित्य वर्मा, मनीष यादव, उत्तम कुमार शर्मा, धनपाल सिंह, पुष्पेन्द्र सिंह चौहान, उन्नाव से आए शिक्षक रामशंकर अवस्थी मौजूद रहे।
मिशनरी पत्रकारिता पूंजीवादियों की भोंपू बन गई है
आज पत्रकारिता दिवस है। आम आदमी की आवाज उठाने वाली मिशनरी पत्रकारिता वर्तमान में पूँजीवादियों की भोंपू बन गई है। एक ओर जहां क्रान्तिकारी बदलाव आए हैं वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता को सवालों के घेरे से भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पत्र और पत्रकारिता दोनों ही व्यथा की कथा से कराह रहे हैं। यह अलग बात है ‘हटो बचो’ की नीति से लोकतन्त्र का जिम्मेदार स्तम्भ अपना वजूद कायम रखने में कामयाब है। त्याग और संकल्प यही सच्चे पत्रकार का असली स्वरूप है। पत्रकार किसी योगी से कम नहीं वह भोग विलास में रत नहीं विरत रहता है। हमारा पत्रकारिता इतिहास साक्षी है कि पत्रकारों ने अपने जीवन काल में कितना संघर्ष किया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे मूर्धन्य पत्रकार मील का पत्थर साबित हुए हैं। बीते समय में समाचारों के लेखन से लेकर प्रकाशन तक आज की तुलना में काफी परेशानी उठानी पड़ती थी। आज समय के साथ पत्रकारिता के साधन संसाधनों में वृद्वि हुई। जिससे पहले से अधिक साज सज्जा और सुन्दरता में इजाफा हुआ। वह असलियत और जुझारूपन वाला पत्रकारिता का असली चेहरा दिनोंदिन धुंधलाता जा रहा है।
जिसके पास नम्बर दो का पैसा हो, पढ़ा लिखा हो अच्छा खासा कारोबार हो वह पत्रकार जरूर होगा। उसकी चमचमाती लग्जरी गाड़ियों पर प्रेस लिखा होगा। जिससे वह शासन-प्रशासन को गुमराह कर प्रेस की गरिमा को दांव लगाता रहता है। उसके साथी जो वास्तव में पत्रकारिता से जुड़े हैं। वह उसकी चाटुकारिता में मस्त रहते हैं। यही वजह है कि प्रेस लिखे वाहनों की भरमार है। अवैध कारोबार करने से पहले प्रेस से जुड़ जाइए तो सारा कामकाज चैन से चलेगा। इस तरह की सोच से पत्रकारिता की अस्मिता प्रभावित हो रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारों की पहचान कुछ समय पहले समाज के जुझारू समाजसेवी के रूप में होती थी। आज पत्रकारों की पहचान अधिकतर पुलिस थाने की दलाली और अवैध कटान चिरान के माफियाओं के रूप में हो रही है। कोटेदार और प्रधान आय का सशक्त जरिया बन गए हैं। अवैध शराब की बिक्री का मामला हो या फिर जुआ अड्डों, नकली दवाओं की कालाबाजारी करने का, इन कारनामों का संचालन भी मीडिया की आड में किया जा रहा है। पत्रकारिता की समय के साथ सेहत खराब हो गई, जिससे इस पर लोगों के विश्वास में कमी आई है। यह अलग बात है कि ‘हिन्दुस्तान’ ने शीलू काण्ड जैसे तमाम मामलों में स्वस्थ पत्रकारिता का परिचय दिया व जुझारू पत्रकारिता का जीता जागता उदाहरण पेश किया। जो अन्य समाचार पत्रों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे पत्रकारिता समाज के लिए एक मिसाल बना हुआ है।
हरदोई जिले की पत्रकारिता पर गौर फरमाएं तो जाहिर होता है कि यहां की पत्रकारिता ‘माननीयों’ के आगे मूकदर्शक है। आखिरकार ऐसा क्यों? बस सिर्फ त्याग और संकल्प की दम पर जुझारूपन का अभाव है। पत्रकारों का संगठन इधर-उधर तितर-बितर है। कोई खिलाफत तो कोई गुणगान में मस्त है। ग्रामीण पत्रकार सरकारी सेवाओं से हर तरह से महफूज हैं। जिन मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सरकारी सेवाएं मिली हैं, शायद उनको सरकारी इमदात को भुनाने का मौका नहीं। जिले के छोटे बड़े ग्रामीण पत्रकार अपने संस्थान की मेहरबानी से भले ही खुशमिजाज लगते हों, उन्हें किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिल रही है। हकीकत यह है कि जहाँ पर कोई घटना घटती है वहाँ पर सरकारी कर्मचारी जाते हैं तो रस्म अदायगी भले ही कर आते हों, पत्रकार पूरी निष्ठा के साथ मोर्चे पर डटते हैं। फिर भी वह उपेक्षित हैं।
हर कोई अपना स्वार्थ सिद्व करने की फिराक में है उसको समाज की धारा और विचारधारा से कोई खास लगाव नहीं। यही वजह है कि मनमौजी स्वभाव वाले कुछ शौकिया तो कुछ मजबूरी में अपनी आन और शान के लिए पत्रकार हैं। समाज में हटो और बचो के आधार पर पत्रकारिता का चलन चल रहा है। जिले के कुछ पत्रकारों ने पत्रकारिता के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। उनकी कलम चलती तो अच्छों अच्छों को पढ़कर पसीना आ जाता। यह अलग बात है कि काफी अनुभव होने के कारण वह अखबार के स्टापर होकर उनके लिए पत्रकारिता प्रोफेशन हो गई हो फिर वह नेक नीयत से पत्रकारिता क्षेत्र में मिशनरी पत्रकारों की तरह भूमिका अदा कर रहे हैं। आधुनिक पत्रकारों को उनका अनुकरण कर पत्रकारिता की गरिमा को कायम रखने में अपना सहयोग करना चाहिए।
हरदोई से सुधीर अवस्थी की रिपोर्ट.

