Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

तेरा-मेरा कोना

हे भगवान! अब तो सपने में भी फुटकर के दर्शन

आशीष बहुत लोगों को देखा साल के पहले दिन बनारस के संकट मोचन मंदिर के बाहर अपना सिर पटक रहे थे. ठण्ड से परेशान भगवान से चीख-चीख कर कह रहे थे कि आज साल का पहला दिन है. हम आपके दर्शन करने आयें हैं. हमारा पूरा साल अब आप के जिम्मे है. हम चाहे जो करें, हमारा कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए. कुछ बिगड़ा तो आप समझिएगा. उसके बाद मंदिर नहीं आयेंगे. भक्तो की प्रार्थना में भाव ऐसा कि वो प्रार्थना कम और मांग ज्यादा लग रही थी. गोया भगवान को भगवान उन्होंने ही बनाया हो, जैसा हर पांच साल में वोट देकर एक भगवान चुनते हैं. खैर भगवान को इन सब बातों की आदत हो चली है. लेकिन एक बात उन्हें परेशान कर गयी. संकट मोचन भगवान सोचने लगे कि आखिर यह साल नया कैसे हो गया. यह संवत बदला कब. कानों कान ख़बर तक नहीं हुयी. लेकिन अब इतने लोग बाहर जमा हैं तो सचमुच साल बदल ही गया होगा. फिर भी तसल्ली करने के लिए भगवान ने अपने एक सेवक को बाहर भेजा कि पता लगा कर आओ कि माजरा क्या है? सेवक ने क्या बताया यह आपको उसके लौट कर आने के बाद पता चलेगा. तब तक आपको एक और दृश्य सुनाता हूँ.

आशीष

आशीष बहुत लोगों को देखा साल के पहले दिन बनारस के संकट मोचन मंदिर के बाहर अपना सिर पटक रहे थे. ठण्ड से परेशान भगवान से चीख-चीख कर कह रहे थे कि आज साल का पहला दिन है. हम आपके दर्शन करने आयें हैं. हमारा पूरा साल अब आप के जिम्मे है. हम चाहे जो करें, हमारा कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए. कुछ बिगड़ा तो आप समझिएगा. उसके बाद मंदिर नहीं आयेंगे. भक्तो की प्रार्थना में भाव ऐसा कि वो प्रार्थना कम और मांग ज्यादा लग रही थी. गोया भगवान को भगवान उन्होंने ही बनाया हो, जैसा हर पांच साल में वोट देकर एक भगवान चुनते हैं. खैर भगवान को इन सब बातों की आदत हो चली है. लेकिन एक बात उन्हें परेशान कर गयी. संकट मोचन भगवान सोचने लगे कि आखिर यह साल नया कैसे हो गया. यह संवत बदला कब. कानों कान ख़बर तक नहीं हुयी. लेकिन अब इतने लोग बाहर जमा हैं तो सचमुच साल बदल ही गया होगा. फिर भी तसल्ली करने के लिए भगवान ने अपने एक सेवक को बाहर भेजा कि पता लगा कर आओ कि माजरा क्या है? सेवक ने क्या बताया यह आपको उसके लौट कर आने के बाद पता चलेगा. तब तक आपको एक और दृश्य सुनाता हूँ.

एक जनवरी को एक मित्र के घर एक काम से एक मिनट के लिए गया. उसके घर पहुंचा तो देखा वो महाशय अब भी रजाई में औंधे पड़े हैं. अब उन्हें देख मुझे अपराध बोध हो आया कि मैं क्यों ना रजाई में रहा. खैर मैंने उन्हें जगाने का अपराध कर दिया. मित्र उठे तो उनके चेहरे से दुःख टपक रहा था. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से भारत के आम आदमी के चौखटे से टपकता है. मैंने पूछा क्या हुआ? कम से कम सोते समय तो खुश रहा करो. मित्र ने मेरी बात निर्विकार भाव से सुनी और अपने दोनों कानों का उपयोग किया. एक से सुना और एक से निकाल दिया. मित्र ने अपना कष्ट बताया. कहा कि यार अब तो सपने में भी फुटकर ही दिखता है. बड़ी नोट कहीं दिखती ही नहीं. महंगाई इतनी बढ़ गयी है कि 500 और 1000 की नोट का वजूद घंटे दो घंटे से अधिक बचता ही नहीं. सब्जी वाला भी अगर मन से सब्जी दे दे तो एक टाइम के सब्जी का खर्च 100 रुपये तो हो ही जाता है. यही कारण है कि सपना देख रहा तो पॉकेट में बस चिल्लर ही दिख रहे थे. बड़ी नोट थी ही नहीं. यही नहीं एटीएम से निकली वो स्लिप भी थी जो बता रही थी कि तुम कंगला हो गए हो.

मित्र को लगा जैसे उसने बड़ी नोटों के सपने देखने का अधिकार खो दिया है. मेरे पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं था. आखिरकार हमारे देश के शीर्ष नेताओं ने भी बताया है कि दुनिया की महाशक्ति बनना है तो बड़े सपने मत देखो. सपने में फुटकर से काम चला लो. बाकी का कारोबार उनके जिम्मे छोड़ दो. नीरा और राजा तो हैं ही ऐसे सपने देखने के लिए. तेजी से बढ़ते इस देश के लोगों की जेब तेजी से खाली हो रही है. क्या फर्क पड़ता है. देश तो तरक्की कर रहा है. सड़कों के किनारे झुग्गी बन रही है तो क्या हुआ सड़क तो बनी.

मित्र की आँखों में आंसू थे. मैं समझ गया कि ये हकीक़त में तो अब प्याज के आस पास भी नहीं भटकता, सपने में होने का फायदा उठा कर ये ज़रूर प्याज के पास गया होगा. दुकानदार से हेकड़ी में दाम भी पूछ लिया होगा. दाम सुन कर ही ये आंसू आये होंगे. लेकिन यारों इन आंसुओं में भारत के आम आदमी की लाचारी और प्याज के महंगाई वाले आंसुओं को अलग कर पाना मुश्किल है. खैर रोना ना सिर्फ मेरे मित्र का बल्कि इस देश के हर उस आदमी का संवैधानिक अधिकार बन गया है, जो आम आदमी की श्रेणी में आता है. मेरा काम क्या था मैं भूल चुका था. लगा कि देश इतना आगे जा रहा है तो मैं भला अपना काम क्यों याद रखूँ. मैं भी देश के साथ आगे बढ़ लूं. इन्हीं विचारों के साथ में वहां से चल दिया.

बात वापस संकट मोचन भगवान की करते हैं. भगवान अब भी परेशान थे. उनका सेवक नहीं लौटा था. भगवान ने मुझसे कहा कि जरा देख कर आओ सेवक कहाँ रह गया. भीड़ बढ़ चुकी थी. मुझे भगवान के सेवक को तलाशने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी. आँख गड़ा-गड़ा कर देखा तो भगवान का सेवक भारतीय इंसानों की लाइन में दिखा. वो भी संकट मोचन भगवान के दर्शन करने के लिए खड़ा हो गया था. मैंने उससे पूछा कि तुम लाइन में क्यों खड़े हो? तुम्हारा तो भगवान से सीधा संपर्क होता है. सेवक थोड़ा अकड़ कर खड़ा हो गया. कहा इतने लोग जो नया साल मना रहे हैं तो कोई गलत तो नहीं कर रहे. क्या फर्क पड़ता है कि साल बदला है संवत नहीं. हम भारतीय तो इसके बाद भी बने हुए हैं. मैंने अपना सवाल दोहराया. तो सेवक ने कहा कि महंगाई इतनी बढ़ गयी और देश के नेता कुछ कर नहीं पा रहे हैं इसलिए अब भगवान का ही सहारा है. यही वजह है कि मैं भी लाइन में खड़ा हो गया हूँ.

अब मैं क्या कहूं. हर भारतीय नए साल के जश्न में है और बड़ी नोट का सपना देखने से डरता है. फिर भी यही कहता है कि वो तरक्की कर रहा है. क्योंकि देश तरक्की कर रहा है. करो भईया. किसने मना किया है. महंगाई ने ऐसी कमर तोड़ी है कि प्याज तो क्या प्याज की महक से डर लगता है. देश के नेताओं से कोई उम्मीद नहीं है भगवान का ही सहारा है. मेरी हिम्मत नहीं हुयी कि संकट मोचन जी को जाकर बताऊं कि आपका सेवक भी अब लाइन में आ गया है. जब वो सामने पहुंचेगा तो मिल लीजियेगा. लगता है दोस्तों इस देश की तरक्की भगवान के ही भरोसे है. वैसे इतना बड़ा बोरिंग लेख पढ़ कर आपको ज़रूर नींद आ रही होगी. लेकिन मेरी एक राय मानियेगा कि सपना मत देखिएगा. जय हो संकट मोचन महाराज की.

लेखक आशीष तिवारी पत्रकार हैं. यह लेख उनके ब्‍लाग अग्निवार्ता से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...