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वेलेंटाइन (1) : ये इश्‍क बड़ा मस्‍ताना

महारास की अद्भुत बेला है। राधा-कृष्ण के रमने की बेला। प्रेम बन जाने का लक्ष्य। प्रिया-प्रीतम दोनों लुटे हुये हैं। श्री कृष्ण राधा बन गये हैं। राधा श्रीकृष्ण हो गईं हैं। दोनों ही एक-दूसरे की प्रतिकृति हो गये हैं। चहुँ दिशा में बस राधा-कृष्ण हैं। कृष्ण राधा हैं। कृष्ण की बंसी और मोरपंख राधिका के काजल और केशपाश में गुंथी कली से एकाकार हो गये हैं। संपूर्ण सृष्टि एकाकार हो गई है। भारतीय परिवेश में प्रेम यही है। प्रेम राधाभाव है। कृष्णभाव है। महाभाव है। समष्टि चेतना है। लुट जाना है। वंचित हो जाना है। बेखुद हो जाना है। मिट जाना है। और अगर ज्ञानेन्द्रपति की कविता के भावो में कहें तो ’दुनिया की नजर में बर्बाद, पर दिल की दौलत से मालामाल’ हो जाना है। कबीर, तुलसी, सूरदास, मीराबाई और राधा-कृष्ण, रति-कामदेव, शकुंतला-दुष्यंत भारतीय प्रेम की परम अभिव्यक्ति हैं। पराकाष्ठा हैं। लैला-मजनूं, हीर-रांझा, शीरी-फरहाद, सोहनी-महीवाल, सस्सी-पुन्नू, सारंगा-सदावृक्ष, नल-दमयन्ती… जैसी लोकगाथाएँ आज भी प्रासंगिक हैं।

महारास की अद्भुत बेला है। राधा-कृष्ण के रमने की बेला। प्रेम बन जाने का लक्ष्य। प्रिया-प्रीतम दोनों लुटे हुये हैं। श्री कृष्ण राधा बन गये हैं। राधा श्रीकृष्ण हो गईं हैं। दोनों ही एक-दूसरे की प्रतिकृति हो गये हैं। चहुँ दिशा में बस राधा-कृष्ण हैं। कृष्ण राधा हैं। कृष्ण की बंसी और मोरपंख राधिका के काजल और केशपाश में गुंथी कली से एकाकार हो गये हैं। संपूर्ण सृष्टि एकाकार हो गई है। भारतीय परिवेश में प्रेम यही है। प्रेम राधाभाव है। कृष्णभाव है। महाभाव है। समष्टि चेतना है। लुट जाना है। वंचित हो जाना है। बेखुद हो जाना है। मिट जाना है। और अगर ज्ञानेन्द्रपति की कविता के भावो में कहें तो ’दुनिया की नजर में बर्बाद, पर दिल की दौलत से मालामाल’ हो जाना है। कबीर, तुलसी, सूरदास, मीराबाई और राधा-कृष्ण, रति-कामदेव, शकुंतला-दुष्यंत भारतीय प्रेम की परम अभिव्यक्ति हैं। पराकाष्ठा हैं। लैला-मजनूं, हीर-रांझा, शीरी-फरहाद, सोहनी-महीवाल, सस्सी-पुन्नू, सारंगा-सदावृक्ष, नल-दमयन्ती… जैसी लोकगाथाएँ आज भी प्रासंगिक हैं।

प्रेम की गली संकरी गली है। प्रेम की राह नाजुक राह है। सृष्टि के आरंभ से ही चली आ रही प्रेमभावना हर दिल में व्याप्त होती है। संपूर्ण जगत इस मधुर भाव से आसक्त है। देशों-विदेशों -महादेशों का इतिहास और साहित्य प्रेम-कथाओं से अटा पड़ा है। वैलेन्टाइंस डे ऐसी ही  महान प्रेम अभिव्यक्ति को सम्मान देने का दिन है। वैलेंटाइंस डे अनछुए अहसासों, नाजुक पलों को सलाम करने का दिन है। प्रेम के पुरोधा संत वैलेंटाइन को याद करने का, उन्हें नमन करने का दिन है। संकरी गलियों और नाजुक राहों से गुजरता प्रेम आज ग्लोबलाइज्ड हो गया है। वैश्विक गांव में मॉडर्न हो गया है। आज प्यार मोबाइल फोनों में है, रेडियो में है, टेलीविजन में है। पोस्टरों, बैनरों, सिनेमा, इंटरनेट में है। ऑरकुट में है। फेसबुक में है। बाजार में है। इसकी स्वीकृति और व्यापक हुई है।

भारत में वेलेंटाइन डे प्रेम माह बसंत में आता है। हमारे समाजिक परिवेश में यह दिन घुलता जा रहा है। बसंतोत्सव हो गया है। प्यार मस्त हो गया है। बेबाक हो गया है। किसिंग, चैटिंग, डेटिंग हो गया है। वैलेंटाइन्स डे़ हो गया है। प्रेम माह का गुलाबी रंग लाल गुलाब की पंखुड़ियों में समाता है और इजहार-ए-मोहब्बत बन खिल जाता है। मौसम की चुहल टेडी-बियर के नटखटपने में घुल-मिल जाती है। प्रेम पगी फिजाओं की मिठास चॉकलेट-कैंडियों में समा गई है। ऋतुराज की खुमारी और नशा युवा दिलों को मदहोश किये देता है। कहना नहीं होगा कि प्रेम की- प्यार की वास्तविक मर्यादा ही मदहोश हो गई है। परिभाषा ही बदल गई है। उर्दू की तरह खुबसूरत प्यार नये सामयिक संस्करण के दौर से गुजर रहा है एकदम खुला। सबके सामने। कॉमन। लोकल। ग्लोबल। विरोधी लाख नाक-भौं सिकोडें। मगर यह प्रेम की नई बानगी है। नाटक है। खेल है।

आज के व्यस्त समय और जीवन के बेरंग और बेमानी हो जाने के बीच का स्पेस ही तो प्रेम नहीं बनता जा रहा? कहीं प्रेम हमारी प्रगति और आजाद खयाली का पर्याय तो नहीं बन रहा? क्या प्रेम एक अवसर है, आइडिया है, समारोह है? नहीं! प्यार सिर्फ प्यार है। अलौकिक अनुभुति है। यह अनुभुति जीवन को जड़ता से उबारती है। प्राणी मात्र को देह की भौतिक सीमाओं से परे- पार ले जाती है। पं. विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में “यही मानुष जन्म की सार्थकता है कि पुरूष नारी के लिये या नारी पुरूष के लिये जब आकर्षण से खिंचकर आकांक्षा करे, यह केवल प्यार का प्रारंभ हो, यह स्नेह की वह पहली बूंद हो, जो पानी से भरी थाली में गिरती है तो फैलते- फैलते थाली की बारी तक चली जाती है और थाली को कितना भी धोइए थाली को छोड़ने के लिये तैयार नहीं होती, कुछ न कुछ लगी ही रहती है, उल्टे धोने वाले हाथ को स्नेहिल कर देती है।“

वेलेंटाइन सप्ताह चल रहा है। प्रेम के नाम एक सप्ताह। एक सप्ताह जमीन से ऊपर चलने का। स्वयं को अनुभव करने का एक सप्ताह। गुलाबों, चॉकलेटों, टेडी बियरों, लुभावने गिफ्ट्स, आकर्षक ऑफरों का महकता, गुनगुनाता, प्यार लुटाता, मिठास लुटाता सप्ताह। आकर्षण सहज मानवीय स्वभाव है। प्यार चिरस्थायी अनुभव। उत्साह और मौज की अभिव्यक्ति शीघ्रता, तत्परता और उत्तेजनाओं से बची रहे। जीवन की केसरी सुरभि पूर्ण विकसित हो जाए। मन की अभिव्यक्ति पवित्र अभिव्यक्ति बन जाए। मर्यादा का सीमोल्लंघन प्रेम का पतन है। प्रेम प्रतीकों का अपमान है। हुल्लड़बाजी, सस्ती-मस्ती, लंपटता प्रेम नहीं।  प्रेम सुबास बिखेरे तो प्रेम है। प्रेम चाहना नहीं। न्योछावर हो जाना है। प्यार महज ऐन्द्रिक व्यापार न बन जाये। उपभोक्ता-संस्कृति की बलि न चढ़ जाये।

बसंत की शुरुआत है ठण्‍ड की मारी, झुलसी, पीत पत्तियां झड़ रही हैं। पत्तियों के विरह से ठूंठ हुये पेड़ की तरह की हम आसक्त न हो जाएं। प्रेम पगी नयी पत्तियां हमारे प्यार को फिर से हरा कर देंगी। प्रेम को महसूसना जरूरी है। प्रेम परितृप्ति बनकर समस्त सृष्टि की प्यास बुझा रहा है। हमारे अंदर ऐसी परितृप्ति ऐसी प्यास उमड़े तो प्रेम है। वैलेंटाइन डे है। हर दिन है। हर पल है। हर क्षण है। प्रेम कलुषित न होने पाये। तभी संत वैलेंटाइन को सच्ची श्रच्दांजलि है। यह सबका है, सबके लिए है और उल्लास से भरा है। इसे बदरंग और बाजारू बनने से बचाना है और बचना है।

लेखिका सविता पांडेय मेरठ के जागृति विहार की निवासी हैं.

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