सिविल सोसाइटी के पांच लोग 121 करोड़ भारतीयों की वास्‍तविक नुमाइंदगी करते हैं?

राहुल : अन्ना हजारे की मुहिम अंजाम तक पहुंच पाएगी : गांधीवादी अन्ना हजारे देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के नए नायक बनकर उभरे हैं। उन्होंने 96 घंटों के आमरण अनशन में ही केन्द्र सरकार को बैकफुट पर ला खड़ा किया। सरकार ने लोकपाल विधेयक बनाने के लिए अन्ना की शर्तो को मान लिया है। केन्द्र ने वित्त मंत्री की अध्यक्षता वाली एक कमेटी गठित करके उसे नोटिफाई कर दिया है। जिसमें पांच सरकार और पांच ही सिविल सोसाएटी के नुमाइंदे शामिल हैं। यह कमेटी लोकपाल बिल के मसौदे का ब्लूप्रिंट तैयार करेगी। जिसे मनमोहन सिंह सरकार कैबिनेट के सामने रखने के बाद आगामी मानसून सत्र में बिल को लोकसभा में लाऐगी।

यह मुहिम उस वक्त परवान चढ़ी जब पूरा देश विश्व कप क्रिकेट में मिली जीत की खुमारी में डूबा हुआ था। अन्ना ने दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन शुरू कर दिया। देखते ही देखते देश का हर तबका उनके पीछे खड़ा होता नजर आया। गौरतलब है कि पिछले 42 सालों के दौरान किसी भी सरकार ने लोकपाल बिल पास कराने की ईमानदार कोशिश नहीं की। लेकिन अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का शंखनाद करके देश में नए सिरे से उम्मीदें जगाई हैं। अगर संसद में कमेटी द्वारा तैयार किया गया बिल पास हो गया तो वो दिन दूर नहीं जब भ्रष्ट जन प्रतिनिधियों पर कानून का शिकंजा कसता दिखेगा।

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे 21 वी शताब्दी के भारत में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम छेड़ने वाले पहले व्यक्ति हैं। उनके पहले 1977 में जय प्रकाश नारायण और 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करके केन्द्र सरकारों को हिला चुके हैं। वीपी के 1987 में शुरू हुए आंदोलन को खड़ा करने में तो मीडिया की बड़ी भूमिका रही। लेकिन उनके पूर्ववर्ती आपातकाल के दौर में जेपी का आंदोलन बेहद महत्वपूर्ण था। उन्होंने इन्दिरा गांधी के खिलाफ पटना में आवाज उठाई और देखते ही देखते पूरा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था। ठीक उसी तरह आज अन्ना के आंदोलन में जेपी की झलक नजर आती है।

मौजूदा दौर में मीडिया आंदोलनों की पटकथा तैयार करता रहा है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं था। अन्ना हजारे ने लोकपाल बिल की मांग उठाकर दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की। भारतीय मीडिया खुद-ब-खुद अन्ना की मुहिम के पीछे खड़ा हो गया। क्रिकेट का तमाशा, भूत प्रेत और नाग नागिन दिखाने में महारथ हासिल कर चुके इलेक्ट्रानिक मीडिया में अन्ना की हर बात और अंदाज ब्रेकिंग खबर था। जिसका नतीजा यह था कि देखते ही देखते देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत खड़ा हो गया। ऐसे में केन्द्र की यूपीए सरकार ने अन्ना हजारे के सुर में ही अपना सुर मिलाना बेहतर समझा।

गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान देश एवं विभिन्न राज्यों में कई घोटाले उजागर हुए। मसलन, टूजी स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसायटी, कामनवेल्थ गेम्स, कर्नाटक में भूमि घोटाला, उत्तराखण्ड में स्टर्डिया भूमि मामला और जल विद्युत परियोजना आबंटन घोटाला वगैरह वगैरह। केन्द्र में रही किसी भी सरकार ने पिछले 42 सालों में लोकपाल बिल को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ हुंकार भरने में तत्परता दिखाई। एक के बाद एक सामने आ रहे घोटालों से त्रस्त देश के करोड़ों लोगों को उनमें एक नई उम्मीदें नजर आई।

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या जन लोकपाल बिल बन जाने मात्र से भ्रष्टाचार का सफाया हो जाऐगा? देश के कमोबेश डेढ़ दर्जन राज्यों में लोकायुक्त  नियुक्त हैं तो क्या उन राज्यों से भ्रष्टाचार का सफाया हो गया है? क्या लोकपाल बिल कमेटी मे शामिल हुए सिविल सोसाएटी के पांच देश के 121 करोड़ लोगों की वास्तविक नुमाइंदगी करते हैं? अन्ना हजारे की नीयत पर तो किसी को शक नहीं है, लेकिन क्या अन्य इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं? क्या शांति भूषण और प्रशांत भूषण यह दावा करने की स्थिति में हैं कि उन्होंने कभी भी बतौर वकील किसी गलत आदमी या मुद्दे की पैरवी नहीं की? मैं किसी पर भी सवालिया निशान नहीं खड़े कर रहा हूं। लेकिन समाज के विभिन्न तबकों की बीच यह सवाल उठ रहे हैं।

बाबा रामदेव पहले ही लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी पर वंशवाद का अरोप लगा चुके हैं। ये बात और है कि बाद में उन्होंने अपने बयान को बदल दिया। गौरतलब है कि खुद रामदेव भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के अलम्बरदार रहे हैं। बाबा अपने योगा कैम्प में बड़े जोर-शोर से काले धन और भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते रहे हैं। अब ये बात और है कि वह उतनी गंभीरता नहीं दिखा पाए जितनी कि अन्ना हजारे ने दिखाई। बाबा रामदेव की गंभीरता का अंदाज इसी से हो जाता है कि वह कभी कहते हैं कि अलाने मंत्री ने मुझसे रिश्वत मांगी तो कभी फलाने ने। महत्वाकांक्षी रामदेव हवा में तीर छोड़ते हैं और फिर शांत हो जाते हैं।

लेकिन अन्ना की हालिया मुहिम के मायने अलग हैं। उनका सार्वजानिक जीवन बेदाग और संघर्षशील रहा है। यही वजह है कि देश का जनमानस क्रिकेट की खुमारी से बाहर निकलकर उनके पीछे खड़ा हो गया। इस मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था के सभी अंगों को सामूहिक तौर पर काम करना होगा। ये सोलह आने सच है कि सियासतदानों ने देश में भ्रष्टाचार के बीज डालकर उसे व्यवस्था में पनपाया है। लेकिन व्यवस्था में विधायिका की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लिहाजा उससे जुड़े लोगों को सिरे से चोर साबित करने बजाय उनको जनता के प्रति जबाबदेह और पारदर्शी बनने के लिए बाध्य किए जाने की जरूरत है। सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप करने और जन लोकपाल बिल बन जाने मात्र से ही भ्रष्टाचार का खात्मा होने वाला नहीं है।

इसमें कोई शक नहीं है कि अन्ना हजारे ने महात्मा गांधी की सोच को साकार करने की दिशा में एक भागीरथ प्रयास किया है। अब व्यवस्था के सभी अंगों को भ्रष्टाचार मिटाने के लिए गंभीरता से ईमानदार प्रयास करने चाहिए। खासतौर पर अन्ना के पीछे खड़े लोगों को अब ज्यादा सूझबूझ का परिचय देना होगा। नेताओं को ही सिरे से चारे साबित करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है, क्योंकि एनजीओ और उनसे जुड़े लोगों पर सवाल उठते रहे हैं। वैसे भी सिर्फ भाषणबाजी और नारेबाजी करके या फिर मोमबत्ती लेकर खड़े हो जाने भर से यह बीमारी खत्म होने वाली नहीं है। उम्मीद करनी चाहिए कि अन्ना हजारे की ताजा मुहिम अपने सही अंजाम तक पहुंचेगी।

लेखक राहुल सिंह शेखावत नैनीताल में ईटीवी के संवाददाता हैं.

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