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अब नही होता एक भी कैदी 15 अगस्त को आजाद!

कैदी: कारागारों में बढ़ती अव्यवस्थाओं को लेकर कैदियों में बढ़ता विद्रोह : जेलों में क्षमता से ज्‍यादा भरे पड़े हैं कैदी : अब पैरोल और होमलीव भी नहीं मिलती मंडल स्‍तर पर : जिला कारागारों में बढ़ती कैदियों की संख्या और स्‍टॉफ की कमी वहां अधिकारियों की मुसीबत बनी हुयी है। जेलों में मिलने वाला घटिया खाना तथा पैरोल व होमलीव न मिलने से कैदियों में विद्रोह की भावना पनप रही है, इसी का परिणाम है कि मथुरा तथा मेरठ जिला जेल से पिछले माह कई कैदी फरार हुये थे। कुछ दिन पूर्व मथुरा में इसी कुण्ठा के चलते कैदियों ने सामूहिक रूप से भोजन का बहिष्कार कर दिया था। किसी तरह जेल प्रशासन ने उन्हें मनाया था। प्रदेश सरकार की नीतियों और ब्यूरोक्रेटस के दबाव के चलते पैराल और होमलीव का अधिकार भी मण्डलायुक्त और जिलाधिकारी से छीन कर प्रदेश सचिवालय के हाथों में सौंप दिया गया है। प्रदेश की सभी जिला जेलों में क्षमता से अधिक कैदी ठूंस कर रखे गये हैं।

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कैदी: कारागारों में बढ़ती अव्यवस्थाओं को लेकर कैदियों में बढ़ता विद्रोह : जेलों में क्षमता से ज्‍यादा भरे पड़े हैं कैदी : अब पैरोल और होमलीव भी नहीं मिलती मंडल स्‍तर पर : जिला कारागारों में बढ़ती कैदियों की संख्या और स्‍टॉफ की कमी वहां अधिकारियों की मुसीबत बनी हुयी है। जेलों में मिलने वाला घटिया खाना तथा पैरोल व होमलीव न मिलने से कैदियों में विद्रोह की भावना पनप रही है, इसी का परिणाम है कि मथुरा तथा मेरठ जिला जेल से पिछले माह कई कैदी फरार हुये थे। कुछ दिन पूर्व मथुरा में इसी कुण्ठा के चलते कैदियों ने सामूहिक रूप से भोजन का बहिष्कार कर दिया था। किसी तरह जेल प्रशासन ने उन्हें मनाया था। प्रदेश सरकार की नीतियों और ब्यूरोक्रेटस के दबाव के चलते पैराल और होमलीव का अधिकार भी मण्डलायुक्त और जिलाधिकारी से छीन कर प्रदेश सचिवालय के हाथों में सौंप दिया गया है। प्रदेश की सभी जिला जेलों में क्षमता से अधिक कैदी ठूंस कर रखे गये हैं।

ताजा आंकड़ों के अनुसार प्रदेश की जेलों में 28 हजार कैदियों की अपेक्षा 90 हजार के करीब कैदी बंद है। उदाहरण के तौर पर मथुरा जिला कारागार में 554 कैदियों की क्षमता के विपरीत 11 सौ कैदी बंद है। जिनमें अधिकांश विचाराधीन कैदी है। जेल में आने के कारण इन्हें ढंग से खाना भी नहीं मिल पा रहा है। सूत्रों के अनुसार जेल मैन्युअल के आधार पर कैदियों को औसत दर्जे का भोजन दिये जाने का प्रावधान है। कैदियों को प्रातः चाय, एक बार नाश्ता एवं दो टाइम खाने के लिये प्रति कैदी अठारह या बीस रुपये की राशि शासन से निर्धारित है। इस छोटी सी रकम से एक व्यक्ति को ढंग से नाश्ता भी नहीं कराया जा सकता, खाना तो दूर की बात है। खाना, वो भी दो टाइम, कैसे खिलाया जा सकता है, समझना मुश्किल नहीं है।

घटिया स्तर का खाना मिलने एवं लम्बे समय से जेलों में बंद कैदियों को पैरोल पर रिहाई एवं होमलीव न मिलने से ये लोग डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। यहां सुधरने के बजाय गलत रास्ता अख्तियार करने को मजबूर है। इसके पीछे इन कैदियों का परिजनों से मुलाकात न हो पाना भी है। जेल प्रशासन के अनुसार कुछ दिन तक तो कैदियों के परिजन इनसे मिलाई (मुलाकात) के लिये यहां हफ्ते दस दिन के अंतराल पर आते रहते है, लेकिन धीरे-धीरे  यह क्रम टूट जाता है और कैदी मानसिक रूप से व्यथित होने लगता है। और गलत कदम उठाने को मजबूर होता है।

जेल प्रशासन के अनुसार सश्रम कैद की सजा भोग रहे लोगों को भी काम के लिये जेल से बाहर खेतों पर नहीं लाया जाता। इसके पीछे कर्मचारियों, बंदीरक्षकों की कमी मुख्य कारण है। यदि कैदियों को बाहर लाया जाए तो उनकी रखवाली आवश्यक है। साथही अब जेलों के पास भी पर्याप्त जगह भी नहीं बची है, यदि ये लोग काम में व्यस्त रहे तो इनका दिमाग किसी खुराफात (गलत कार्य) की ओर नहीं जायेगा। पैरोल और होमलीव पर कैदियों के न भेजे जाने के पीछे भी जेल प्रशासन की मजबूरी है।

पूर्व में कैदी को 15 दिन की होमलीव देने का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट को एवं पैरोल पर रिहाई स्वीकृति का अधिकार मण्डलायुक्त को था। लेकिन वर्ष 2007 में प्रदेश सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर ऐसी स्वीकृति प्रदेश स्तर से करने की घोषणा कर दी। कैदियों के परिजनो के लिये सचिवालय से पैरोल/होमलीव स्वीकृत कराना तो दूर की बात है, वहां प्रवेश पाना भी मुश्किल है। इसी तरह पूर्व में लम्बे अर्से से जेल में बंद सजा काट रहे या विचाराधीन कैदियों के अच्छे चाल-चलन की जेल अधिकारियों से मिली रिपोर्ट पर स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर प्रदेश सरकार द्वारा रिहा कर दिया जाता था। लेकिन अब वर्ष 2001 के बाद से पूरे प्रदेश की किसी भी जेल से एक भी कैदी की रिहाई नहीं की गई है।

पहले जेल से 14 वर्ष बाद कैदियों को नॉमिनलरोल प्रदेश सरकार को भेजा जाता था, अब वो व्यवस्था भी खत्म कर दी गई है। जिससे जेलों में कैदियों की संख्या तो बढ़ती ही जा रही है, लेकिन कर्मचारियों की भर्ती पर प्रदेश सरकार का कोई ध्यान नहीं है। मथुरा जिला कारागार भी इन समस्याओं से अछूता नहीं है। यहां कोई कुक या फॉलोअर तक तैनात नहीं है। जिसके कारण कैदियों को ही खाना पकाना पड़ता है। एक तो घटिया सामग्री और ऊपर से अप्रशिक्षित रसोइये, खाने का पूरा स्वाद ही बिगाड़ देते है।

बजट की कमी के चलते जेल प्रशासन कैदियों के मनोरंजन, या सुधार हेतु कोई कार्यक्रम भी नहीं करा सकता वहीं समाज सेवी संस्थाओं द्वारा प्रवचन, धार्मिक कार्यक्रम या योगा प्रशिक्षण कैम्प लगाने के प्रस्ताव दिये जाने पर जेल प्रशासन जगह की कमी की बात कह कर हाथ खड़े कर देता है। ऐसी स्थिति में कैसे जिला जेलों में बंदी कैदियों के आचरण में सुधार आ सकेगा। सिर्फ जिला कारागार को बंदी सुधार गृह नाम दे देने से कैदियों की मानसिकता नहीं बदली जा सकती, इसके लिये बुनियादी और आवश्यक सुविधाएं मुहैया करानी ही होगी। इस संबंध में जिलाधिकारी के मोबाइल पर बात करने का प्रयास किया गया। लेकिन वह दूरभाष पर उपलब्ध न हो सके। एसएसपी बीडी पाल्सन से जब बात की गई तो उन्होंने जेल प्रशासन को सिटी मजिस्‍ट्रेट द्वारा देखे जाने की बात कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया।

लेखक सुनील शर्मा पत्रकार हैं.

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