: आसान नहीं है पीपी सिंह होने का मतलब : सबसे जल्दी और सबसे बाद में जाने वाले एचओडी थे : मैंने रविशंकर जी के विचारों को पढ़ा। जिस तरह के सवाल पिछले कुछ महीनों में माखनलाल पत्रकारिता विवि में उठे हैं, उनमें ऐसे आरोप लाजमी हैं। एक कुलपति के लिए इस तरह का आयोजन मुश्किल नहीं है। मैं पत्रकार हूं। भोपाल से हूं तो लाजिमी तौर पर मेरा रिश्ता माखनलाल पत्रकारिता विवि से होगा ही। वावजूद इसके कि मैंने कैंपस से पढ़ाई नहीं की। माखनलाल विवि से संबद्ध एक कॉलेज से एमजे किया। लेकिन भोपाल के पत्रकारिता के छात्रों और पीपी सर का रिश्ता कुछ ऐसा है कि उसमें अपरिचय जैसा कुछ रह नहीं जाता। एक बार उनसे मिलिए, बताइए कि सर, यह दिक्कतें हैं और वे हर मुमकिन मदद को तत्पर रहते हैं। उनका विभाग न केवल दूसरे विभाग के छात्रों बल्कि हर उस छात्र की मदद को तत्पर रहा है जिसकी आखों में पत्रकारिता के सपने पलते हैं।
इसलिए रवि शंकर जी ने जो आरोप लगाए हैं, उनसे ऐसा लगता है कि वे न तो कभी माखनलाल विवि गए हैं और न ही वहां की कार्यप्रणाली से वह परिचत रहे हैं। माखनलाल के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि इसे अपने कद के हिसाब से कभी सुविधाएं नहीं मिलीं। हर कदम पर दिक्कतें थीं, इस बीच बैच दर बैच छात्र आते रहे और विवि चलता रहा। विवि की कार्यसंस्कृति में ट्विस्ट तो अब आया। जब 2003 में पीपी सिंह, सर एचओडी बने, उसके बाद से पत्रकारिता विभाग का एक ही मकसद था, छात्रों को ऐसा एक्सपोजर देना, जो उन्हें मुकम्मल खबरनवीस बना सके। दिनदिन भर संवाद। हस्तियों के व्याख्यान और देर रात तक लैब में अखबार का ककहरा समझना।
जर्मनी, अमेरिका के पत्रकारों और उनके विश्वविद्यालयों के फैकल्टीज से लेकर, शांति निकेतन तक के फैकल्टी और दिल्ली के तमाम बड़े लेखकों से लेकर आरके लक्ष्मण और डॉ. नामवर सिंह, डॉ विजय बहादुर सिंह जैसे नामचीन अगर माखनलाल के पत्रकारिता विभाग से सतत संवाद, इसलिए रखते थे, क्योंकि, सर हर विचारधारा और विद्धान को विवि में लाने को लालयित रहते थे ताकि उसके बच्चों को रोज कुछ नया सीखने को मिले। इस सूची में पी साईंनाथ के यादगार भाषण का जिक्र बेहद जरूरी है।
दूसरे विभागों के एचओडी, विवि के कुलपति शाम पांच-छह बजे के बाद अपने घर पर होते या भारत भवन और बड़ी झील के इर्द-गिर्द की महफिलें में रमे होते, मगर पीपी सर कॉलेज में डटे रहते। संडे या छुट्टी का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था, उनके सारे सरोकार तो छात्रों से संवाद, वास्तविक कार्य प्रशिक्षण से ही थे। यह थोड़ा मुश्किल तो होगा उनके लिए यकीन करना, जो या तो एकेडमिक हैं या प्योर जर्नलिस्ट। क्योंकि दोनों यह नहीं समझ पाते कि पत्रकारिता की पढ़ाई आखिर होनी किस तरह से चाहिए। एक क्लासरूम से बाहर नहीं निकल पाता तो दूसरा क्लास और किताबों से संवाद को उतना महत्व ही नहीं देता, क्योंकि ट्रेंड जर्नलिज्म का दौर पूरी तरह आया नहीं है।
बड़ी मुश्किलों से कुछ वर्षों पहले माखनलाल विवि को अपना भवन मिला, लेकिन इस बीच पीपी सर बच्चों को तमाम संसाधनों और विवि के प्रयासों के इतर केवल अपने बूते संवारने में लगे रहे। एकदम, अकेले। निपट अकेले। उनके सामने एक नाम रखिए कि सर, फलां को बुला लें, विभाग में। उनकी अमुक विषय पर मास्टरी है, पता चला बच्चे तो भूल गए मगर वह व्यक्ति अगले कुछ दिनों में विभाग में अपनी प्रतिभा सबसे साझा कर रहा है। वह विवि में सबसे पहले आने वाले और सबसे आखिर में जाने वाले संभवत: अपनी किस्म के देश के पहले एचओडी हैं।
हर दीवाली, होली और ईद पर छात्रों के साथ खुशियां मनाने निकल पडऩे वाले शख्स का नाम है, पीपी सिंह। चौबीसों घंटे बच्चों के लिए जुटे रहने वाले सर की दिनचर्या को देखकर यकीन करना मुश्किल है कि ऐसे आदमी का कोई घर-परिवार भी है। ये है, पीपी सिंह होने का मतलब। पत्रकारिता की कार्यविधि दूसरी नौकरियों की तरह नहीं है, हम सब जानते हैं। इसलिए सर ने बच्चों को दिन-रात काम करने और जमकर मेहनत करने के संस्कार दिए। उनके प्रयासों से ही विवि में विकल्प का प्रकाशन संभव हुआ, जिसने केवल पत्रकारिता विभाग ही नहीं बल्कि पूरे विवि के छात्रों को अपनी प्रतिभा निखारने का अवसर दिया।
लेकिन आज पीपी सिंह, सर को कठघरे में खड़ा किया गया है। वह जो भद्रता के मिसाल हैं, उस पर अभद्रता के आरोप हैं। यह आरोप इसलिए हैं ताकि पत्रकारिता विवि को भी दूसरे सरकारी संस्थानों सरीखे, क्लर्की वाले तौर तरीकों से चलाया जा सके। खैर, लगने दीजिए आरोप। चलिए यह भी हो जाने दीजिए। लेकिन मैं उन तमाम लोगों से यह बात इस मंच से कहना चाहती हूं जो किसी न किसी रूप में माखनलाल से जुड़े रहे हैं, भले ही वे छात्र हों या वहां से संवाद रखने वाले या फिर कुछ नहीं तो जर्नलिस्ट ही सही। अगर, आज हम चुप रहे तो फिर कोई पीपी सिंह बनने की हिम्मत नहीं करेगा। कोई नई लीक नहीं बनाएगा। मशहूर लेखक रसूल हमजातोव, मेरा दागिस्तान में लिखते हैं- किसी देश युवाओं के लिए बेहद जरूरी है नई राह पर चलने का हुनर और इससे भी जरूरी है ऐसे शिक्षक, जो छात्रों को वह संस्कार दें, जो नई राह पर चलने के लिए जरूरी हैं। इसलिए, मित्रों आप जहां भी हैं, अपनी कलम और अपने कदम उठाइए। अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करिए, क्योंकि यह विषय पीपी सिंह सर के एचओडी होने या नहीं होने का नहीं है, बल्कि पत्रकारिता में मूल्यों और हक के संघर्ष का है। याद रखिए, अगर हम पत्रकार, जर्नलिज्म और उसके विवि के संघर्ष को सही अंजाम तक न ले जा सके तो यह हमारे लोक संघर्ष की काबिलियत और निष्ठा दोनों पर प्रश्रचिन्ह होगा।
लेखिका रेखा शर्मा जयपुर में स्वतंत्र पत्रकार हैं.

