नीतीश कुमार 2017 नहीं, 2019 के लिए यूपी में सक्रिय हैं

बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की सक्रियता यूपी में लगातार बढ़ रही है. इसकी शुरुआत शराबबंदी को लेकर सम्मान समारोह से हुई. नीतीश का लखनऊ में महिलाओं ने सम्मान किया. ये सिलसिला अब मण्डलों में कार्यकर्ता सम्मेलन के नाम पर जारी है. इस बीच उन्हें जब भी मौका मिल रहा है वे यूपी आने को आतुर दिख रहे हैं. बसपा छोड़ चुके आरके चौधरी के बुलावे पर नीतीश का लखऩऊ आना तो इसी ओर इशारा कर रहा है. लेकिन, लोगों के मन में सवाल ये है कि आखिर नीतीश यदि यूपी में दो चार सीटें जीत भी जायें तो इससे क्या फर्क पड़ेगा. लेकिन, फर्क पड़ेगा….

बिहार का चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा को पंख लग गये हैं. जिस तरह से पूरे देश में बीजेपी को मात देने का सेहरा उनके सर सजा उससे उन्हें ये लगने लगा है कि एन्टी बीजेपी धड़े को अब उनके ही झण्डे का सहारा है. यही वजह है कि नीतीश लगातार ऐसे फैसले ले रहे हैं जिससे उनकी राष्ट्रीय स्तर पर छवि तैयार हो सके. यूपी में होने वाले विधानसभा के चुनावों की अहमियत नीतीश कुमार बखूबी समझते हैं. इसीलिए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चमकने के लिए यूपी को ही अपना लॉचिंग पैड बनाया है. इसकी शुरूआत एक बेहद भावनात्वक मुद्दे की आड़ में हुई जब नीतीश कुमार का लखनऊ में महिलाओं ने शराबबंदी को लेकर सम्मानित किया. इसके बाद तो नीतीश कुमार ने धड़ाधड़ दौरे शुरु कर दिये. वे कुछ दिनों के अंतराल पर यूपी के सभी मण्डलों में कार्यकर्ता सम्मेलन कर रहे हैं. मिर्जापुर, वाराणसी, इलाहाबाद और नोएडा में सम्मेलन कर चुकें हैं…6 अगस्त को कानपुर में रैली प्रस्तावित है. नीतीश ने बड़ी होशियारी से यूपी चुनाव के लिए एक ही मुद्दा उछाला है…शराबबंदी का.. बिहार में सफल शराबबंदी का उदाहरण देकर वे यूपी में भी इसकी मांग कर रहे हैं. शराबबंदी का मुद्दा ऐसा है जिसका जातियता या धर्म से कोई लेना देना नहीं है. नीतीश को लगता है कि लोग इस मुद्दे की बदौलत उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देंगे. जैसा कि वो बिहार की कहानी यूपी के लोगों को सुनाते हैं.

अब सवाल उठता है कि भावनात्मक मुद्दे से वोट कितने मिलेंगे. इसका तोड़ भी नीतीश कुमार ने तलाश लिया है. वोटों के लिए नीतीश की नजर दोतरफा काम कर रही है. बिहार में भाजपा को हराने का दोतरफा लाभ नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर पर भी लेना चाहते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि चमकी है. गौर फरमाइये…. राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदा दौर में कोई भी राजनीतिक दल इस स्थिति में नहीं है जो भाजपा का मुकाबला कर सके. कांग्रेस धराशायी है. वो तो उठ खड़ी हो यही बड़ी बात है, सीटों की रेस कहां से कर पायेगी… मुलायम सिंह के नेतृत्व में जो खेमेबन्दी हो रही थी उसकी भी पिछले दिनों हवा ही निकल गयी. ऐसे में बिहार में जीत के उदाहरण के साथ नीतीश कुमार ही एकलौते ऐसे नेता बच जाते हैं जिनमें भाजपा को पछाड़ने वाली छवि दिखाई देती है. इसके लिए नीतीश कुमार ने भी दिन रात एक कर रखा है. बसपा से अलग हुए आरके चौधरी के बुलावे पर रैली में आना यही दिखाता है. असल में नीतीश की नजर भाजपा के विरोधी खेमे पर है लेकिन, तमाम राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने वो जमीन कब्जा कर रखी है. जैसे कि यूपी में सपा और बसपा. ऐसे में नीतीश कुमार को मौका तब मिल जाता है जब ऐसी पार्टियों से कोई अलग हो जाता है.
आरके चौधरी का उदाहरण तो यही बताता है. इतना ही नहीं नीतीश कई और छोटे छोटे दलों के साथ नजर आ सकते हैं. यूपी में उन्हें दूसरा सबसे बड़ा फायदा अपना दल में मची टूट की वजह से मिलता दिख रहा है. अपना दल कुर्मी वोटरों के सहारे खड़ा हुआ था लेकिन, सोनेलाल पटेल के निधन के बाद उनकी बेटियां अनुप्रिया और पल्लवी राजनीतिक विरासत को सम्हालकर नहीं रख सकीं और आपस में भिड़ गयीं. अनुप्रिया पटेल और उनकी मां कृष्णा पटेल के आपसी झगड़े से कुर्मी वोटर नया नेतृत्व तलाश रहा है. नीतीश को लगता है कि ये उनका परम्परागत वोटबैंक है. बिहार में बहुत हद तक है भी. अनुप्रिया की विरोधी उनकी छोटी बहन पल्लवी ने नीतीश से बात करने के बारे में एक बार बयान दिया था लेकिन,. जनता दल यू के नेता ये सुनकर बौखला गये. क्योंकि उन्हें मालूम है कि जनता दल यू को अपना दल का राजनीतिक स्पेस हासिल करना है

नीतीश कुमार की सक्रियता से ये लगता है कि वे यूपी विधानसभा के चुनावों में कुछ सीटें जीतना चाहते हैं लेकिन, ऐसा नहीं है. असल में वे 2017 के यूपी विधानसभा की नहीं बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं. विधानसभा में सीटें जीतना एक छोटा लक्ष्य हो सकता है लेकिन, यूपी में सक्रियता बढ़ाकर असल में वे भाजपा विरोधी खेमे की गोलबन्दी कर रहे हैं. वे ये बताना चाहते हैं कि बिहार की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर भी उनका नेतृत्व ही भाजपा को परास्त कर सकता है. बिहार में मिली जीत के बाद नीतीश कुमार का अब एक ही लक्ष्य शेष रह गया है. राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ाना जिससे खुद ब खुद दूसरी पार्टियां ये कहने लगें कि प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के सामने हमारा चेहरा नीतीश कुमार होंगे…. कांग्रेस उनसे कदम से कदम मिला ही रही है और पीके यानी प्रशांत किशोर रणनीति बना ही रहे हैं.

मनीष कुमार
टीवी पत्रकार
लखनऊ
9336622973

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