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माखनलाल-3 : लोकतांत्रिक रही है विश्‍वविद्यालय की परम्‍परा

साथियों … मैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय का छात्र हूं. यूनिवर्सिटी से छोड़े लगभग ९ साल हो गए लेकिन ताउम्र इस विश्वविद्यालय का छात्र रहूंगा, वजह ये नहीं है कि यहां से पढ़कर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दाखिला फिर नौकरी मिली। वजह ये है कि यहां से जीने और सवाल करने का सलीका, लोकतंत्र में आस्था और बहस तलब के लिए तैयार जमात का हिस्सा बना। उद्वेलित इसलिए नहीं हूं कि पीपी सिंह को यूनिवर्सिटी ने निलंबत किया है, वो मेरे शिक्षक थे, हैं और रहेंगे, लेकिन अगर अंश मात्र भी वो दोषी हैं तो उन्हें सज़ा मिलने का मैं पक्षधर हूं। जहां तक मेरी जानकारी है राज्य महिला आयोग उनके मामले की सुनवाई 28 सितंबर को करेगा। ऐसे में सुनवाई से पहले सज़ा सुनाना शायद थोड़ी जल्दबाज़ी होगी। खैर इस मामले पर मैं और जानकारी लेने के बाद तफसील से चर्चा करूंगा।

साथियों … मैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय का छात्र हूं. यूनिवर्सिटी से छोड़े लगभग ९ साल हो गए लेकिन ताउम्र इस विश्वविद्यालय का छात्र रहूंगा, वजह ये नहीं है कि यहां से पढ़कर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दाखिला फिर नौकरी मिली। वजह ये है कि यहां से जीने और सवाल करने का सलीका, लोकतंत्र में आस्था और बहस तलब के लिए तैयार जमात का हिस्सा बना। उद्वेलित इसलिए नहीं हूं कि पीपी सिंह को यूनिवर्सिटी ने निलंबत किया है, वो मेरे शिक्षक थे, हैं और रहेंगे, लेकिन अगर अंश मात्र भी वो दोषी हैं तो उन्हें सज़ा मिलने का मैं पक्षधर हूं। जहां तक मेरी जानकारी है राज्य महिला आयोग उनके मामले की सुनवाई 28 सितंबर को करेगा। ऐसे में सुनवाई से पहले सज़ा सुनाना शायद थोड़ी जल्दबाज़ी होगी। खैर इस मामले पर मैं और जानकारी लेने के बाद तफसील से चर्चा करूंगा।

फिलहाल दैनिक भास्कर के इंट्रो (पढ़ाई लिखाई छोड़ हंगामा, हड़ताल और प्रदर्शन के लिए पहचाने जाने वाले माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय) और रविशंकर जी ने भड़ास पर जो लिखा है (20 वर्षों में विश्वविद्यालय के स्तर का कोई प्रशासनिक ढांचा नहीं बन पाया था। इस कारण अकादमिक स्थिति काफी लचर बनी हुई थी। विश्वविद्यालय में अभी तक कोई रजिस्ट्रार नहीं था। ) इस पर कुछ बातें कह लूं, रवि जी यहां एक जानकारी मैं सबसे पहले दे देना चाहता हूं- विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार का पद कुछ सालों से रिक्त है, 2004 तक सच्चिदानंद जोशी रजिस्ट्रार थे। पहले विश्वविद्यालय में उपकुलपति नहीं डीजी और एक्जक्यूटिव डायरेक्टर की परंपरा थी। परामर्श के लिए विजन कमेटी थी। जिसकी अध्यक्षता प्रभाष जोशी जैसे वरिष्ठ पत्रकार करते थे। डीजी शरत चंद्र बेहार थे और ईडी रामशरण जोशी, गेस्ट-फैक्लटी की लिस्ट बहुत लंबी थी। कई बड़े पत्रकार, साहित्यकार, फिल्म निर्माता-निर्देशक, इतिहासकार विश्वविद्यालय से जुड़े थे। अब आप अगर इसे प्रशासनिक ढांचा मानने से ही इनकार कर दें तो फिर शायद समझ को थोड़ा ठीक करने की ज़रूरत है।

रही बात अकादमिक ढांचे की तो सुनिए- जनसंपर्क के एचओडी डॉ शशिकांत शुक्ला, जनसंचार की दविन्द्र कौर उप्पल, पत्रकारिता के कमल दीक्षित, ब्रॉडकस्ट के डॉ श्रीकांत सिंह और लाइब्रेरी साइंस के डॉ. बीएस निगम, यहां ख़ासतौर से जिक्र करना चाहूंगा कि दविन्द्र मैडम को इसरो ने 2 साल के लिए बुलावा भेजा था। हमारे रजिस्ट्रार भी इतने गुणी थे कि उन्हें मराठी नाटकों के लिए सर्वेश्रेष्ठ रंगकर्मी का पुरस्कार मिल चुका था। इनके अधीनस्थ भी सारे शिक्षक बेहद गुणी और लोकतांत्रिक थे। इन्हीं की बदौलत कम से कम 2003 बैच तक के ढेर सारे लड़के आपको अलग-अलग चैनल, अख़बारों, पत्रिकाओं या दूसरे वैकल्पिक मीडियम में अच्छे ओहदों पर मिल जाएंगे।

बात निकली है तो कुछ और वाकये भी सुना दूं- गुजरात में आए भूकंप के वक्त कुछ छात्रों ने तय किया की हमें वहां जाकर पीड़ितों की मदद करनी है। बस यकायक हम तैयार हुए। 27 की रात थी। 29 जनवरी से परीक्षा शुरू होनी थी। हमने फैसला यूनिवर्सिटी को सुना दिया। शिक्षक परेशान,  भुज में देखते गोली मारने के आदेश थे। उन्होंने हमें बहुत रोका, कहा हम खुद परीक्षा के बाद आपको वहां भेजने के इंतज़ाम कर देंगे, लेकिन हम नहीं माने। भोपाल स्टेशन से रात 11 बजे अहमदाबाद की विशेष ट्रेन थी। सारे शिक्षक हमें छोड़ने स्टेशन पहुंचे, वहां भी पिता की तरह हमें समझाने की कोशिश की। हम नहीं माने। 25 दिनों बाद जब हम लौटे तो लगा सेमेस्टर बर्बाद हो गया, लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब हमारे शिक्षकों ने ना सिर्फ हमारे लिए अलग से वक्त निकालकर हमें पढ़ाया, बल्कि अलग से परीक्षा भी आयोजित की।

गुजरात दंगों के वक्त हमने सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ नुक्‍कड़ नाटकों की एक सीरीज़ तैयार की। प्रशासन ने नाटक खेलने की इज़ाजत नहीं दी, लेकिन हमें कोना मिला विश्वविद्यालय में। उस वक्त “दस्तक” हम सभी की संस्था थी। हर उस दरवाजे पर दस्तक देने को एकत्र जो वैचारिक, सांस्कृतिक और सकारात्मक सोच रखते थे, अभिरूचि रखते थे, साथ ही हमारी दस्तक उन दरवाजों पर भी थी जो संवदेनशून्य ज़िंदगी जीते हैं। हमारा प्रयास था कि विश्वविद्यालय में ऐसी सांस्कृतिक धारा बहे जिसमें सभी अपनी अपनी भागीदारी सुनिश्चिचत कर सकें, अनुभव कर सकें। विश्वविद्यालय में कलात्मक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के सूनेपन को पाटने के प्रयास से सहज ही दस्तक का जन्म हुआ था। संस्था ने कई नाटकों के अलावा अभिव्यक्ति और अनायास जैसी दो सशक्त सांस्कृतिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया था। संस्था को की बार विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने अधीन करने की मंशा जताई, लेकिन कभी जबरन नहीं।

2000 में हमें पता लगा कि यूजीसी ने कई पाठ्यक्रमों की मान्यता रद्द कर दी है। फिर क्या था हमने परिसर में ताला मार दिया। पढ़ाई बंद।  हड़ताल। 6 दिनों तक हमारे कई साथी आमरण अनशन पर रहे। जिन अधिकारी-शिक्षकों के ख़िलाफ हम दिन में नारे लगाते थे, वही रात में हमारी देखभाल के लिए आते थे। घंटो तंबू में बैठकर हमें इमरजेंसी और आंदोलन के किस्से सुनाया करते थे। कहने की कोशिश यही है कि माहौल बहुत लोकतांत्रिक थे। शरत चंद्र बेहार सूबे के बहुत ताकतवर आईएएस अफसर थे। उनकी गाड़ी से हमने उन्हें उतार दिया। 6 दिनों तक चाबी अपने पास रखी, लेकिन ना पुलिस में कोई शिकायत ना कोई मामला। उल्‍टा वो रोज़ सुबह हमारा हाल-चाल पूछने आते थे। हमने ओपन बुक सिस्टम की वकालत की, वो हमें मिला। सीमित संसाधनों के बावजूद जो हमने मांगा, विश्वविद्यालय प्रशासन ने हमें दिया। एक और मज़ेदार वाकया है- कैंपस के बाहर एक चाय वाली चाची थीं। कुछ महीनों बाद नगर-निगम के दस्ते ने उनकी छोटे से ठेले को ज़ब्त कर लिया। भागे भागे हम जोशी साहब के पास पहुंचे। एक हुक्म और चाची गेट के अंदर स्टॉल लगाने लगीं।

यही नहीं, एक बार प्रख्यात इतिहासकार इरफान हबीब का भाषण था। गांधीजी के बारे में उनकी कुछ टिप्पणी हममें से कई छात्रों को पसंद नहीं आई। हमने मध्यांतर में उनके खिलाफ पोस्टर लगाये। नारेबाज़ी की। आयोजन विश्वविद्यालय का था, बावजूद इसके प्रशासन के कई नुमाइंदे हमारे पास आए और हमें उनकी बातों के मायने समझाने की कोशिश की। कई बार विज़न कमेटी के दौरे-खर्चे पर हमने सवाल उठाये। आप ये जानकार हैरत में पड़ जाएंगे कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने हमें हर खर्च का ब्यौरा तक दिया। लब्बेलुआब ये है कि पहले पढ़ाने के लिए भी हर विचारधारा के लोग आते हैं।  छात्रों के एक अलग पर्सपेक्टिव बनता था, लेकिन आज लिस्ट उठाके देख लीजिए कि छात्रों को सिर्फ दक्षिणपंथ की घुट्टी पिलाई जा रही है, जो अलग सोचते हैं वो हाशिए पर हैं।

पढ़ाई का स्तर रवि जी, आप छात्रों के पास होने के प्रतिशत और इस बात से माप सकते हैं कि हमारे बैच की टॉपर वाई वंदना नायर की कॉपी आज भी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में पत्रकारिता के छात्रों के लिए रखी गई है। पत्रकारिता के कई नामचीन संस्थान आपको देशभर में मिल जाएंगे, लेकिन जो लोकतंत्र हमें माखनलाल में मिला वो कहीं नहीं दिखा। कहने की ज़रूरत नहीं है कि वो इसी विश्वविद्यालय की देन है। पहले भी यूनिवर्सिटी में कई छात्र वामपंथी थे, दक्षिणपंथी थे समाजवादी थे, न्यूट्रल थे। छात्रों में राजनीतिक झुकाव क्यों ना हो, ज़रूर होना चाहिए, लेकिन दिक्कत तब आती है जब कोई एक अपने डंडे से सबको हांकने की कोशिश करने लगता है। फासिसज्म वहीं से जड़े जमाने की कोशिश करने लगता है। आज यूनिवर्सिटी के साथ वही हो रहा है। हमारी गुजारिश है कि छात्रों को विचारधारा का वाहक ना बनाया जाए। उन्हें स्वच्छंद रहने दिया जाए। हर उदाहरण के पीछे आशय सिर्फ इतना था कि यूनिवर्सिटी पहले सांस्कृतिक, राजनीतिक और अकादमिक हर मोर्चे पर बहुत आगे थी।

मैंने जो लिखा है, वो मेरा एकालाप नहीं दस्तक की आवाज़ है। एक मुश्किल वक्त में गुस्से और करुणा का क्रंदन नहीं बल्कि विमर्श के लिए एक विषय देने की कोशिश। उम्मीद है पढ़ने वाले पत्रकारिता के इस इकलौते विश्वविद्यालय को इसके मेरिट्स पर तौलेंगे, सच और तर्क की कसौटी पर कसेंगे और फिर प्रतिक्रिया देंगे। हमारा मकसद कोई स्वार्थ सिद्ध करना नहीं है। हम अपनी अपनी दैन्दिनी में व्यस्त हैं, लेकिन जहां से इस व्यस्तता की नींव पड़ी। उसे इस हाल में नहीं छोड़ेंगे और ना किसी को उसे इस हाल में पहुंचाने देंगे। ये हमारा प्रण है। इसलिए ग़ुजारिश है आप किसी भी पंथ के प्रचारक हों, ये आपका निजी मामला है लेकिन जब पब्लिक फोरम पर बातें लिखें तो ज़रा तथ्यों के साथ।

लेखक अनुराग द्वारी माखनलाल चतुर्वेदी विश्‍वविद्यालय के छात्र है तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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