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अभिव्यक्ति की आजादी का आकाश ‘भड़ास4मीडिया’ की आठवीं वर्ष गाँठ

खाली अंटी पहुंचे इस फटीचर के पास आर्शीवाद और मर्म से जन्मी शुभकामनाओं के अलावा कुछ है भी तो नहीं देने के लिए । इस लिए हे – यशवंत , तेरा तुझ को ही अर्पण…

ज्वालामुखी से निकला जीवाश्म जिसके यशवंत बनने की कहानी , ब्रह्माण्ड में जीवाश्म से मानव बनने की कहानी से कम रोचक नही है । उन्हीं के शब्दों में ——

“ मेरे पास दुनयाबी होने लायक कोई वजह नहीं थी । सो सच-झूठ , युद्ध-शान्ति , भला-बुरा , धर्म-अधर्म , जीवन-म्रत्यु आदि के परम्परागत विवादों से दो चार होते , सीखते एक दिन ऐसा आया , तय कर लिया कि अब नौकरी नही करनी । अमर उजाला , दैनिक जागरण और आईनेक्स्ट अखबारों में 12 – 13 साल नौकरी करचुक था । ट्रेनी पद से लेकर संपादक तक का सफ़र तय करने के बाद , नौकरी नही करनी ? ईमानदारी , आदर्श , कठोर मेहनत , दुस्साहस , अराजकता , लफंगई-लंठई —- आदि के छोरों-दायरों में घूमता-तैरता एक वक्त ऐसा आया जब मेनस्ट्रीम  मीडिया में मेरे लिए जगह नहीं थी । अब नौकरी नहीं के संकल्प के साथ , अंतःविरोधी स्वभाव और अबूझ उदंडता के कारण मै खुद के लिए पहेली बनता गया । एक दिन ऐसा आया कि तय कर लिया जो मन में है उसे करो , बको ,निकालो जो द्वन्द है उसे प्रकट करो , सुनाओ , चिल्लाओ —और ये सब खुल कर करो , खुलेआम करो , नाम-पता-पहचान के साथ करो ।

खाली अंटी पहुंचे इस फटीचर के पास आर्शीवाद और मर्म से जन्मी शुभकामनाओं के अलावा कुछ है भी तो नहीं देने के लिए । इस लिए हे – यशवंत , तेरा तुझ को ही अर्पण…

ज्वालामुखी से निकला जीवाश्म जिसके यशवंत बनने की कहानी , ब्रह्माण्ड में जीवाश्म से मानव बनने की कहानी से कम रोचक नही है । उन्हीं के शब्दों में ——

“ मेरे पास दुनयाबी होने लायक कोई वजह नहीं थी । सो सच-झूठ , युद्ध-शान्ति , भला-बुरा , धर्म-अधर्म , जीवन-म्रत्यु आदि के परम्परागत विवादों से दो चार होते , सीखते एक दिन ऐसा आया , तय कर लिया कि अब नौकरी नही करनी । अमर उजाला , दैनिक जागरण और आईनेक्स्ट अखबारों में 12 – 13 साल नौकरी करचुक था । ट्रेनी पद से लेकर संपादक तक का सफ़र तय करने के बाद , नौकरी नही करनी ? ईमानदारी , आदर्श , कठोर मेहनत , दुस्साहस , अराजकता , लफंगई-लंठई —- आदि के छोरों-दायरों में घूमता-तैरता एक वक्त ऐसा आया जब मेनस्ट्रीम  मीडिया में मेरे लिए जगह नहीं थी । अब नौकरी नहीं के संकल्प के साथ , अंतःविरोधी स्वभाव और अबूझ उदंडता के कारण मै खुद के लिए पहेली बनता गया । एक दिन ऐसा आया कि तय कर लिया जो मन में है उसे करो , बको ,निकालो जो द्वन्द है उसे प्रकट करो , सुनाओ , चिल्लाओ —और ये सब खुल कर करो , खुलेआम करो , नाम-पता-पहचान के साथ करो ।

एक लैपटॉप , एक वेबसाइट दिन 17 मई 2008 , दिन-रात लिखने उपलोड करने में जुट गया । छः महीने की अथाह पीड़ा — रोती हुयी पत्नी , सहमे हुए से बच्चे , अन्नविहीन किचेन , दोस्त विहीन मै । हर पल यातना और संघर्ष का चरम । मेरे पास उस सब का सामना करने अथवा मर जाने के आलावा कोई विकल्प नहीं बचा था । मैंने अकेले अपना काम जारी रक्खा , झूठ , छल , फरेब के हर संभव ताने-बाने बुने और इससे दो तीन पांच दस हजार रुपये इधर उधर से आये जो पत्नी के हाथ रक्खे , अन्न खरीदा घर-ग्रहस्ती की गाडी आगे सरकाई । झूठे-सच्चे बहानो के जरिये कर्ज पर कर्ज लेता रहा । क्यों कि अपुन के पास कोई ऐसा भी नहीं था जो मोटी रकम उधार दे सके । “

यशवंत के ही शब्दों में ये सब इस लिए कोट किया ताकि लोगों को समझ आये कि आखिर ये  —— यशवंत — है क्या बला ? जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया के लोग — पतित , दलाल , झूठा , मक्कार , फरेबी , धनलोलुप , यशलोलुप , स्वनामधन्य तथाकथित पत्रकार और भी जाने क्या क्या नहीं कहते ।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त करते हए वामपंथी विचारों और नक्सलवादी सरोकारों के लिए पूर्ण कालिक कार्यकर्ता , यशवंत वर्षो प्रिंट मीडिया में रह कर अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए संघर्ष करने के बदले अपने ही बिरादर भाईयों का सहयोग न पा सके । उनको सहयोग के बदले सौगात में मिले –  षड्यंत्र , जुल्म और  झूठे इल्ज़ामात । इन सब से जंग लड़ते-लड़ते यशवंत ने वर्ष 2012 में भुगती 68 दिनों की जेल यात्रा। जेल से बाहर आकर फिर यशवंत ने , न पीछे मुड़कर देखा न , कदम ही पीछे हटाये । मीडिया कर्मियों में कंडे की आंच की तरह सुलग रही अभिव्यक्ति की आज़ादी को खुला आकाश देने के लिए आठ वर्ष पूर्व भड़ास4मीडिया का अवतरण हुआ । आठ वर्ष पूर्व ,भड़ास4मीडिया के सृजन के साथ जिस अंतहीन यात्रा की शुरुआत यशवंत ने की थी यूँ तो 17 मई को वह आठ वर्ष पूरे कर चुकी है । 11 सेप्टेम्बर को  उसकी आठवीं वर्ष गाँठ , उन्ही सरीखे पत्रकारों ने एक जुट हो कर मनाई ।

आज यशवंत अकेले नही हैं । इस यात्रा में सैकड़ों पत्रकारों का कारवां उनके पीछे पीछे चल रहा है ।  इस कारवाँ में यशवंत के साथ वो हैं जिनके अनुभव कम या ज्यादा उन्ही की तरह हैं । पीड़ाओं को झेलते हुए और अपने आत्मसम्मान और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कायम रखने के हिमालयी संघर्ष करने वालों की जमात में यूँ तो हजारों उनके साथ हैं , पर देश के कम से कम 12 प्रदेशों से आये सैकड़ों पत्रकारों ने इस आयोजन में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी ।

दिल्ली में लोकतन्त्र के मंदिर माने जाने वाली संसद की छाँव में स्थित कोंस्टीच्यूशन क्लब के सभागार में , शुरुआत यूँ तो  ध्यानेंद्र मणी त्रिपाठी के भोजपुरी गीत-संगीत के दौर से हुयी । श्री त्रिपाठी पेशेवर गायक नहीं अपितु एक वरिष्ठ बिजनेस एक्जीक्यूटिव हैं । गीत-संगीत उनका पैशन (जनून) है । गीत-संगीत के दौर का अंत — “ वो तेरे प्यार का गम एक बहाना था सनम , मेरी किस्मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया  —– “ की स्वर लहरी से बने वातावरण में —

अपनी किस्मत का आलेख खुद लिखने वाले पत्रकारों का सम्मान

भड़ास की ओर से  मीडिया का “ सरोकार सम्मान “ कार्यक्रम में भोपाल से आयीं मल्हार मीडिया डॉट कॉम की ममता यादव को  – जो देखा वो लिखा जिसने जनसत्ता के शुरूआती दौर की यादें ताजा करा दी । रेनबो न्यूज पोर्टल के – शशिकांत सिंह को । जल , जंगल और जमीन के लिए मलेथा आंदोलन में महिलाओं को भी लामबंद करने और सफलता पाने तक 11 महीने निरंतर आंदोलित रह कर दुस्साहसिक जंग लड़ने के लिए समीर रतूड़ी को । कैची हेडलाइन के साथ सामाजिक सरोकारों के मुद्दे  यूट्यूब पर ब्लॉग लिख कर धनार्जन की राह दिखाने वाला प्रजेंटेशन देने वाले युवा आशीष गुप्ता को । व अन्य कई पत्रकारों को सम्मानित किया गया ।

अपने किस्म की अलग प्रतिभा के धनि विख्यात कुमार सौवीर , मेरी बिटिया डॉट कॉम के बूते वेब जॉर्नलिज्म के माध्यम से साहसिक और सरोकार वाली पत्रकारिता करने के लिए ।  गाजीपुर के ब्रज भूषण दुबे को उनके विलक्षण तरीके से समाज और देश हिट में सोंचने और उसे जमीनी हकीकत बनाने के लिए । पुलिस राजनेता और प्राशन के सामने जब ब्रज भूषण सिंह का नाम आता है तो सब मानते हैं कि यह अजीब मिटटी का बना है ।

मजीठिया वेज बोर्ड की जंग के सिपहसालारों का सम्मान

इसी क्रम में देश के अलग अलग प्रदेशों जैसे राजस्थान से आलोक शहर , उत्तराखंड से अरुण श्रीवास्तव , उ0प्र0 से अशोक चौधरी , दिल्ली से प्रदीप सिंह और श्रीकांत सिंह , चंडीगढ़ से भूपेंद्र सिंह , हिमांचल से रविन्द्र अग्रवाल , हरयाणा से मुन्ना प्रसाद आदि जो अपने अपने प्रदेशों में पत्रकारों को एकजुट कर मजीठिया वेज बोर्ड की साहसिक लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं को सामूहिक रूप से  विभिन्न प्रान्तों के सैकड़ों पत्रकारों के लिए “ सरोकार सम्मान “ मुम्बई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह को प्रतीकात्मक रूप से प्रदान किया गया । (इस जंग में भागीदारी करने वाले पत्रकारों की लड़ाई के प्रेरणा श्रोत यशवंत तो हैं ही , वे इस की रीढ़ की हड्डी भी है । इसकी कहानी को एक आलेख तो क्या किताब में समेटना भी थोडा है)

साहसिक उद्यमधर्मिता के लिए सम्मान

नौकरी पाने , नौकरी बचाये रखने और नौकरी चली जाने पर नयी नौकरी ढूंढने में सैकड़ो साथी जिंदगी गुजार देते है । अपनी ईमानदारी , आत्मा , आत्मसम्मान से समझौते की पीड़ा के दंश से अपने को मुक्त कर लेने का दुहःसाहस करने और अपनी उद्यमधर्मिता के बल-बूते अपनी किस्मत का आलेख खुद लिख बड़ा मुकाम हांसिल करने वाले पत्रकारों – संजय शर्मा , अशोक दास और विवेक सत्यमित्रं को इसबार सरोकार सम्मान से सम्मानित किया गया ।

मध्य प्रदेश के विकास संवाद , एनजीओ से मनोज गुप्ता , गुंजन मेंहदी रत्ता , और राकेश मालवीय को
हर साल तीन दिवसीय आयोजन कर देश भर के सजग और समझ वाले पत्रकारों , एक्टिविष्टों , समाजसेवियों को कभी जल कभी जमीन कभी स्वास्थ तो कभी पर्यावरण के मुद्दों पर प्रशिक्षण देने के जनूनी कार्य करने के लिए मध्य प्रदेश के विकास संवाद एनजीओ से मनोज गुप्ता , गुंजन मेंहदी रत्ता और राकेश मालवीय को सम्मानित किया गया ।

(यहां भी उपरोक्त की भाँती यह टिप्पणी बनती है कि इन सभी पत्रकारों के संक्षिप्त जीवन यात्रा का परिचय विस्तार से फिर कभी)

उपरोक्त सभी सम्मान और स्म्रति चिन्ह इस “ कार्यक्रम में मीडिया और कालाधन “  विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित और मंचासीन  एन0के0 सिंह , ओम थानवी , आनंद स्वरूप वर्मा वरिष्ठ पत्रकार/संपादक और इनकम टैक्स कमिश्नर एस0के0 श्रीवास्तव ने कभी अलग अलग तो कभी सामूहिक रूप से भेंट किये ।

मीडिया और कालाधन

कानून में कही भी कालाधन परिभाषित नहीं है । यह आम बोलचाल और अखबारी भाषा का गढा गया शब्द है । अखबार और टीवी के मालिक कानूनी रूप से वैध धन निवेश करके संचालित हों तभी वह निर्भीक ,स्वतंत्र , स्वस्थ , रचनात्मक और निष्पक्ष बने रह सकेंगे । यह बात एनडीटीवी में पी0 चिदाम्बरम और उनके बेटे की अकूत दौलत लगी हुयी है की जांच कर रहे इनकम टैक्स कमिश्नर एस0के0 श्रीवास्तव ने कही । उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 से 2014 तक इन दस वर्षों में उनके साथ क्या क्या हुआ । उन्हें चिकित्सीय अभिलेखों के बूते पागल घोषित कर दिया गया । पागल खाने भिजवा दिया गया । उनहोंने स्पष्ट कहा कि चिदाम्बरम का टैक्स चोरी करके कमाया गया धन टीवी चैनल में लगा हुआ है ।  विदित हो कि श्री श्रीवास्तव का एक विस्तृत इंटरव्यूह जो यशवंत भाई ने किया था भड़ास में प्रकाशित हो चुका है । पाठक जरूर पढ़ें ।

पत्रकारों के पास इतना धन कहाँ कि वे अपने अखबार या टीवी चैनल खोल के पत्रकारिता कर सकें । इन सब के लिए धन तो (धनाढ्य उद्योग-धंधे) धनवान लोग ही लगाएंगे । एन0के0 सिंह ने एक और बात परामर्श स्वरूप ,  यशवंत को लक्ष्य करके कही कि  –   भड़ास की भड़ासी भाषा और कार्यशैली को अब नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर मोड़ने की जरूरत है । जनूनी पत्रकारों की इस मजलिस में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके मन में उसी समय सिंह साहब से ये पूँछने का ज्वार-भाटा न उठा हो कि – ऐसी टिप्पणी से पहले ये तो बता दिया होता कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने के लिए आपने अब तक कितने मीडिया मालिकों से कितने पंगे लिए हैं । लेकिन कार्यक्रम सब दिल-अजीज़ यशवंत भाई का है और एन0के0 सिंह उनके आमंत्रण पर आये है (अतिथि देवो भव) शायद यही वजह रही कि युवा पत्रकारों से खचाखच भरे सभागार में सब इस पीड़ा को पी गए । और भी बहुत कुछ कहा जिसमे सार्थक और अच्छी बातें भी थी जैसे उन्होंने भड़ास4मीडिया पर पत्रकारों को क्राइम रिपोर्टिंग को प्रभावशाली , उद्देश्य पूर्ण और ठोस कानूनी जानकारी के साथ करने की ट्रेनिंग देने के लिए अपनी सेवाएं निशुल्क देने की बात भी कही ।

ओम थानवी ने मिडिया में अभिव्यक्ति की आज़ादी की निरंतर घटती जगह (यानी मीडिया घरानों के मालिकों की जुल्म और ज़्यादतियों तथा उनकी हित पोषक सरकारों और सरकारी मशीनरी के कारनामों का खुलासा करने के अवसर ) पर गहरी चिंता जताई । उन्होंने कहा कि एक वक्त था जब विशुद्ध पत्रकारिता के उद्देश्य से अखबारों का संचालन करने के लिए इस क्षेत्र में धन का निवेश किया जाता था । राजस्थान पत्रिका और जनसत्ता के मालिकों के कोई अन्य उद्द्योग धंधे नही थे । आज अखबारों और टीवी चैनलों के मालिक बड़े बड़े उद्द्योग घराने है । उनका उद्देश्य सरकारों और सरकारी मशीनरी और राजनेताओं के हित साध कर अपने व्यावसायिक मंतव्यों को पाना है । आज अधिसंख्य पत्रकार सरकारी सुविधाओं जैसे घर मकान व अन्य निजी हित साधते हैं कैसे निष्पक्ष हो कर अपनी बात कह सकेंगें । चिदाम्बरम के अवैध तरीकों से टीवी चैनल में निवेशित धन के बारे में श्री श्रीवास्तव की जांच के परिणाम किसी भी टीवी चैनल की ब्रेकिंग न्यूज नही बनेगी , यसवंत की इस टिपण्णी पर श्री थानवी ने इसे श्री श्रीवास्तव और श्री चिदाम्बरम के बीच का निजी मामला बताते हुए ब्रेकिंग न्यूज की बात को खारिज कर दिया ।

अंत में आनंद स्वरूप वर्मा ने बड़े ही तार्किक ढंग से भड़ास4मीडिया की भड़ास को सही ठहराया । उन्होंने परोक्ष रूप से श्री एन0 के0 सिंह और श्री थानवी की उन टिप्पणियों जिनमे भड़ास को  नकारात्मक बताते हुए सुधार करने की बात कही गयी थी को खारिज कर दिया । वर्ष 1966 में एक ट्रेनी पत्रकार के रूप में शुरू अपने कैरियर की बात करते हुए बताया की वर्ष 1974 में उन्हें आकाशवाणी से निष्कासित कर दिया गया था । वर्ष 1985 में सहारा समूह के मालिक को लखनऊ से साप्ताहिक राष्ट्रीय सहारा के प्रकाशन में मदद करने को अपने जीवन की बड़ी भूल बताते हुए कहा कि वे आज स्वतंत्र पत्रकार के रूप में ही पत्रकारिता कर्म को करते है । किसी सरकारी सुविधा जैसे विज्ञापन आदि के बिना आज भी वो “ तीसरी दुनिया “ नामक पत्रिका का सम्पादन और प्रकाशन कर रहे हैं । सभागार में बैठे सभी युवा पत्रकारों ने श्री वर्मा की बातों को बड़े मनोयोग से सुना और उनके जज्बे सलाम किया ।

कविता पाठ

कवी कृष्ण कल्पित उर्फ़ कल्बे कबीर की कविता पुस्तक  “ एक शराबी सूंक्तियां “ से किया गया कविता पाठ काफी सराहा गया । कृष्ण कल्पित के ही शब्दों में इस कविता पुस्तक का प्रकाशन लगभग 10 वर्ष पहले मात्र 501 प्रतियों के साथ हुआ था । इंटरनेट ने इसे दुनियां भर में फैला दिया । इन दस वर्षों में कोई दस हजार लोगों ने दुनियां भरसे मुझ से इस कृति के बारे में दूरभाष पर मुझसे बात की । इस छोटी सी किताबिया ने मुझे मशहूर और बदनाम दोनों कर दिया । बदनाम इस लिए कि लोग मुझे शराबी समझने लगे थे ।

मीडिया और आध्यात्म

अंत में मीडिया और आध्यात्म पर , कला आध्यात्म रेफोर्मर प्रत्यूष पुष्कर के गम्भीर दार्शनिक चिंतन , प्रश्न उत्तरों का खुला मंच चलते चलते जाने कितनी गहराईयों में खींच के ले जाता है । देश के विभिन्न कोनों से विभिन्न क्षेत्रों में जनून के साथ अपनी राह खुद तलाशने वालों और ऐसा करते हुए  कुछ कर कर गुजरने वालों तक पहुँच जाना — आखिर क्या बला है ये यशवंत ? यही सोंचते सोंचते – उड़ जहाज का पंछी पुनि जहाज पे आयो । ####

(यशवंत ने छः-छः घंटे की कम से कम दो बैठकों में समेटे जाने वाले इस कार्यक्रम को छः घंटे की एक बैठक में ही समेट दिया)

लेखक vinay oswal हाथरस के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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