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संत परंपरा ही संचार का आदिस्रोत है : माता प्रसाद

: वर्धा में ‘संत परंपरा और प्रभावी संचार’ विषयक गोष्‍ठी आयोजित : कबीर के समकालीन संत रविदास की भक्ति निर्लोभ और छलरहित है। वे सामाजिक एकता और सौहार्द के प्रतीक थे यही संत परंपरा ही संचार का आदिश्रोत है। उक्त उद्भोधन अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डॉ. माताप्रसाद ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग द्वारा संत रविदास की 634वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विशेष मीडिया संवाद कार्यक्रम के अंतर्गत ‘‘संत परंपरा और प्रभावी संचार’’ विशेषयक संगोष्ठी में कहा। संचार की वाचिक परंपरा को एक प्रभावी संचार माध्यम बताते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति काल में इसी संचार का प्रयोग होता था और मेरा मानना है कि आज की तकनीकी संचार माध्यमों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावी साबित हुआ। कबीर दास जी ने कहा था, ‘‘जात पात पूछे न कोई हरि को भजे सो हरि का होई’’ इस कथन को संत रविदास ने चरितार्थ किया। अपने मानवतावादी सोच और विचारों को घूम-घूम कर और गाकर आम लोगों तक पहुंचाया जो सचमुच वाचिक परंपरा का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करता है।

: वर्धा में ‘संत परंपरा और प्रभावी संचार’ विषयक गोष्‍ठी आयोजित : कबीर के समकालीन संत रविदास की भक्ति निर्लोभ और छलरहित है। वे सामाजिक एकता और सौहार्द के प्रतीक थे यही संत परंपरा ही संचार का आदिश्रोत है। उक्त उद्भोधन अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डॉ. माताप्रसाद ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग द्वारा संत रविदास की 634वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विशेष मीडिया संवाद कार्यक्रम के अंतर्गत ‘‘संत परंपरा और प्रभावी संचार’’ विशेषयक संगोष्ठी में कहा। संचार की वाचिक परंपरा को एक प्रभावी संचार माध्यम बताते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति काल में इसी संचार का प्रयोग होता था और मेरा मानना है कि आज की तकनीकी संचार माध्यमों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावी साबित हुआ। कबीर दास जी ने कहा था, ‘‘जात पात पूछे न कोई हरि को भजे सो हरि का होई’’ इस कथन को संत रविदास ने चरितार्थ किया। अपने मानवतावादी सोच और विचारों को घूम-घूम कर और गाकर आम लोगों तक पहुंचाया जो सचमुच वाचिक परंपरा का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करता है।

इस कार्यक्रम में पूर्व कुलपति व मीडियाविद डॉ. प्रेमचन्द पातंजलि ने कहा – संतों का जो हमारे जीवन में प्रभाव है, उसे हमें भूलना नहीं चाहिए पत्रकारों का साहित्य से कोई लगाव नहीं रहेगा तो पत्रकारिता का कोई औचित्य नहीं बचेगा पत्रकारिता विभाग को दिल्ली में शुरू करने के पीछे मेरा मकसद उन सभी लोगों को अवसर प्रदान करना था, जो निम्न वर्गीय हो और जिनमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व का एहसास हो। संत न तो शिक्षित थे और न ही उनके पास कोई संसाधन। आज के संत आर्थिक आवश्यकताओं की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। कबीरदास की संचार शैली ज्यादा संप्रेषनीय थी, जो अपनी बातों को श्रोताओं के सम्मुख उनकी अपनी भाषा में रखते थे, आज प्रवचन प्रायोजित होते है। हमें उन संतों को नहीं भूलना चाहिए जो हमें अच्छे आचरण और सत बुद्धि का उपदेश देते थे। आज आम जनता वैज्ञानिक तरीके से सोच नहीं रही है। सिर्फ शिक्षा ग्रहण करने से आदमी शिक्षित नहीं होता उसके लिए आदमी को खुद की समझ होनी चाहिए तभी संत रविदास कहते है, ‘‘मन चंगा तो कटौती में गंगा’’।

महामहिम डॉ. माताप्रसाद कहते हैं, ‘संत वे होते हैं जो मूर्तिपूजा नहीं करते, भक्त वे होते हैं जो देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं, संत भ्रमणशील परंपरा के होते हैं।’ वर्तमान जाति व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा जब तक जाति रहेगी तब तक मनुष्य आपस में नहीं मिल पायेंगे। गौतम बुद्ध कहते हैं किसी ग्रंथ में जो लिखा है उसे नहीं मानो या जो मैं कहता हूं उसे भी मत मानो, अपना बुद्धि और विवेक जो कहे उसे ही मानो। रविदास जी का वैक्तित्व निरपेक्ष था, जिसे उन्होंने इन पंक्तियों से व्यक्त किया – वे कहते है, ‘‘मस्जिद सो कुछ घिन्न नही, मंदिर से न प्यार।’’ डॉ. उमेश कुमार सिंह ने संगोष्ठी का धन्यवाद ज्ञापन किया। मंच का संचालन करते हुए जनसंचार विभाग के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार राय ‘अंकित’ ने वर्तमान संचार व्यवस्था और संतों की जीवन्त संचार पर गंभीर टिप्पणी करते हुए संत परंपरा के संचार प्रणाली को प्रभावी बताया। इस व्याख्यान में विश्वविद्यालय के शोधार्थी एवं छात्रों की सक्रिय भागीदारी रही।

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