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खरी बात कहने-सुनने की शैली रामानंद ने ही शुरू की थी

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : सामाजिक सुधार को समर्पित स्‍वामी रामानंद : भक्ति में जात-पात। ना बाबा ना। यह अनर्थ कम से कम मुझसे तो हर्गिज नहीं होगा। चाहे मैं इस सम्‍प्रदाय में रहूं या ना रहूं। स्‍वामी रामानन्‍द ने तो कम से कम यही कहा होगा, जब उन्‍हें अपने देशाटन के दौरान कथित विधर्मियों अथवा छोटी जाति के लोगों का छुआ खाने पर प्रायश्चित करने को कहा गया होगा। मगर रामानंद इन शर्तों पर तैयार ही नहीं हुए। नतीजा, उन्‍हें अपने गुरू का संप्रदाय छोड़ना ही पड़ा। लेकिन भक्तिमार्ग को सर्वोच्‍च प्राथमिकता देने वाले इस संत ने इन शर्तों के आगे सिर ना झुकाने के साथ ही एक और भी नजीर कायम की, जो इतिहास में एक अनुपम अभियान के तौर पर हमेशा हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी है। कम से कम कड़ी जाति परंपराओं को तोडने में रामानंद का यह प्रयोग अप्रतिम ही कहा जाएगा।

कुमार सौवीर

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : सामाजिक सुधार को समर्पित स्‍वामी रामानंद : भक्ति में जात-पात। ना बाबा ना। यह अनर्थ कम से कम मुझसे तो हर्गिज नहीं होगा। चाहे मैं इस सम्‍प्रदाय में रहूं या ना रहूं। स्‍वामी रामानन्‍द ने तो कम से कम यही कहा होगा, जब उन्‍हें अपने देशाटन के दौरान कथित विधर्मियों अथवा छोटी जाति के लोगों का छुआ खाने पर प्रायश्चित करने को कहा गया होगा। मगर रामानंद इन शर्तों पर तैयार ही नहीं हुए। नतीजा, उन्‍हें अपने गुरू का संप्रदाय छोड़ना ही पड़ा। लेकिन भक्तिमार्ग को सर्वोच्‍च प्राथमिकता देने वाले इस संत ने इन शर्तों के आगे सिर ना झुकाने के साथ ही एक और भी नजीर कायम की, जो इतिहास में एक अनुपम अभियान के तौर पर हमेशा हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी है। कम से कम कड़ी जाति परंपराओं को तोडने में रामानंद का यह प्रयोग अप्रतिम ही कहा जाएगा।

उन्‍होंने अपने इस मिशन में न केवल हर जाति को शामिल कर लिया बल्कि मुसलमान भी उनके शिष्‍य हो गये। और तो और महिलाओं तक को उन्‍होंने भक्ति परम्‍परा में श्रेष्‍ठ ओहदों पर प्रतिष्‍ठापित करा दिया। सामाजिक न्‍याय का आंदोलन अगर पौराणिक गाथाओं में राम से शुरू हुआ माना जाता है तो ज्ञात इतिहास में इसका श्रेय रामानंद को ही दिया जाएगा।

यह बात भारत में मुगलिया सल्‍तनत के संस्‍थापक जहीरूददीन मोहम्‍मद बाबर के ठीक पहले की है। यानी ईसा की सोलहवीं शताब्‍दी का शुरुआती दौर चल रहा था तब। तैमूर लंग के समय से ही पूरा भारत अराजकता और लूटपाट की चपेट में आ चुका था। विरोध के स्‍वर हर स्‍तर पर उठना ही चाहते थे कि उनका सिर कुचल दिया जाता था। उधर इस संक्रमणकाल के चलते हिन्‍दू समाज में भी जातीय बंधनों की गांठें लगातार कसती जा रही थीं। लैंगिक भेदभाव तो सारी सीमाएं ही तोड़ने पर आमादा था। अचानक अवसाद के इन गंभीर क्षणों में रामानंद जैसे किसी फरिश्‍ते के तौर पर अवतरित हुए। कहा जाता है कि सन 1299 में रामानंद का जन्‍म प्रयाग में हुआ था। कुल था ब्राह़मण और पारिवारिक विचारधारा थी रामानुजी सम्‍प्रदाय। रामानंद ने बारह साल तक वेदांत का अध्‍ययन किया और श्री वैष्‍णव मत के आचार्य राघवानंद का शिष्‍य बन कर विशिष्‍टाद्वैतवादी हो गये। बाद में जब देश को समझने वे तीर्थयात्रा पर निकले तो ध्‍यान अध्‍ययन पर रहा, जातिगत रूढियों पर नहीं। इसी कारण खानपान के भेद और छुआछूत से वे अलग ही रहे। वापस लौटने पर यही बात गले की फांस बन गयी।

मठ वालों ने ऐतराज जताया और कहा कि बिना प्रायश्चित के वे मठ में वापस नहीं आ सकते। सो त्‍याग दिया रामानुजी सम्‍प्रदाय का मठ और अपना एक अलग समूह बना लिया और इसी समूह ने बाद की सदियों तक देश में सामाजिक उद्धार का अलौकिक डंका बजाया। जाति की फौलादी जंजीरों को तोड़कर उन्‍होंने साथ उठने-बैठने खाने और सोचने के आंदोलन को मजबूत किया। अपने इसी क्रम में उन्‍होंने संस्‍कृत जैसी क्लिक हो चुकी भाषा के बजाय आम आदमी की बोली-भाषा को अपनाया। दरअसल, स्‍वामी रामानंद तो अपने सामाजिक परिवर्तन की सोच को बाकायदा एक युद्ध के तौर पर छेड़ना चाहते थे, जिसमें ना तो रक्‍तपात की तनिक भर भी गुंजाइश हो और ना ही सामाजिक विद्वेष को हवा मिले। शायद यही वजह रही कि स्‍वामी रामानंद ने अपने योद्धाओं को कभी सड़क पर बेसुध पडे़ उठाया तो कभी किसी को लहरतारा के विशाल सरोवर की सीढि़यों पर से। किसी शिष्‍य को अवसाद से मुक्ति दिलाकर जुझारू बनाया तो किसी को उसके अपने ही व्‍यवसाय में जुटे रह कर सामाजिक उत्‍थान का बीड़ा थमाया। इतना ही नहीं, उन्‍होंने अपने शिष्‍यों मे समाज के हर तबके को प्रश्रय दिया। यहां तक कि मुसलमानों को भी। कबीर इसका जीवंत उदाहरण हैं। उनके 12 शिष्‍यों में कबीर जहां मुसलमान थे, वहीं रविदास चर्मकार समुदाय से थे। अनंतानंद ब्राहमण थे तो सेन नाई जाति के थे। धन्‍ना जाट थे तो पीपा जी क्षत्रिय। औरतों को तो तब कोई दीक्षा देने के बारे में सोच तक नहीं सकता था, लेकिन रामानंद ने पदमावती और सुरसरि को बाकायदा दीक्षित कर समाजसेवा और सामाजिक नवजागरण में लगा दिया। सब के सब थे पूरी तरह मस्‍तमौला ही।

जैसा गुरू वैसा ही चेला। रामानंद के साथ यह बात बिलकुल फिट बैठती है। उन्‍होंने तब के समाज में जड़ें जमा चुके नैराष्‍य भाव को भांपा और मूढ़, और अपच धामिर्क अंधविश्‍वासों से अलग हटते हुए जनमानस को प्रेम और भक्ति का एक नया स्‍वर्णिम मार्ग अपनाने का रास्‍ता दिखाया। इस नये नजरिये में ना तो ऊंच-नीच का कोई स्‍थान था और ना ही जाति-पाति या यज्ञ, होम, जप जैसे कठिन आडम्‍बर। डाक्‍टर मोतीचंद का मानना है कि तब के भयातुर भारतीय जनमानस को पुनरुत्‍थान का रास्‍ता दिखाने और उस ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करने का पहना आंदोलन स्‍वामी रामानंद ने ही छेड़ा।

एक सौ पंद्रह साल की उम्र पाये स्‍वामी रामानंद के इन अलमस्‍त फकीरों ने बिना जाति, धर्म का भेद किये, रामानंद के विचारों और सपनों का झण्‍डा बुलंद किया और सामाजिक आंदोलनों को एक नया रूप दिया। कहना न होगा कि आज के सामाजिक आंदोलन में खरी बात करने, कहने और सुनने की जो शैली दिख रही है, स्‍वामी रामानंद ने ही इसकी शुरुआत की थी।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

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