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शक्ति हस्तांतरण और सियासी नेतृत्व से अवकाश के अर्थ क्या हैं?

गिरीशजी : दलाई लामा की नैतिक पहल : दलाई लामा सुर्खियों में हैं. लंदन के ‘गार्जियन’ अखबार में बारबरा ओब्रायन का लेख छपा है. शीर्षक है ‘दलाई लामा ने कदम पीछे खींचे हैं, लेकिन हटाए नहीं हैं.’ लेख उनका सियासी अवकाश लेने संबंधी उनके बयान के संदर्भ में है. दरअसल तिब्बती विद्रोह की 52वीं वर्षगांठ पर उन्होंने यह कहकर हलचल पैदा कर दी है कि अब निर्वासित तिब्बतियों के राजनीतिक नेतृत्व की व्यवस्था और भी ज्‍यादा लोकतांत्रिक होनी चाहिए और सत्ता या शक्ति का हस्तांतरण प्रवासी तिब्बतियों की संसद, प्रधानमंत्री और अन्य में होनी चाहिए. हालांकि दलाई लामा पहले भी ऐसी बातें कहते रहे हैं. पिछले सितंबर में भी 75 वर्षीय इस तिब्बती नेता ने जब ऐसा कहा था तो खुद तिब्बती समुदाय द्वारा ही विरोध हुआ था.

गिरीशजी

गिरीशजी : दलाई लामा की नैतिक पहल : दलाई लामा सुर्खियों में हैं. लंदन के ‘गार्जियन’ अखबार में बारबरा ओब्रायन का लेख छपा है. शीर्षक है ‘दलाई लामा ने कदम पीछे खींचे हैं, लेकिन हटाए नहीं हैं.’ लेख उनका सियासी अवकाश लेने संबंधी उनके बयान के संदर्भ में है. दरअसल तिब्बती विद्रोह की 52वीं वर्षगांठ पर उन्होंने यह कहकर हलचल पैदा कर दी है कि अब निर्वासित तिब्बतियों के राजनीतिक नेतृत्व की व्यवस्था और भी ज्‍यादा लोकतांत्रिक होनी चाहिए और सत्ता या शक्ति का हस्तांतरण प्रवासी तिब्बतियों की संसद, प्रधानमंत्री और अन्य में होनी चाहिए. हालांकि दलाई लामा पहले भी ऐसी बातें कहते रहे हैं. पिछले सितंबर में भी 75 वर्षीय इस तिब्बती नेता ने जब ऐसा कहा था तो खुद तिब्बती समुदाय द्वारा ही विरोध हुआ था.

दरअसल निर्वासित तिब्बतियों की बहुत बड़ी संख्या यह मानती है कि बिना दलाई लामा के उनके आंदोलन का न तो वह महत्व रह जाएगा और न ही अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर पहले जैसी स्वीकारोक्ति. खुद प्रवासी तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री सामढांग रिम्पोछे यह कहते हैं कि तिब्बती संसद अभी यह विचार करेगी कि दलाई लामा के अनुरोध को स्वीकार किया जाए या नहीं, और संभव है कि उसे अस्वीकार कर दिया जाए. दलाई लामा के पावन व्यक्तित्व और उनकी अपार जनस्वीकार्यता का हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं है, ऐसे में तिब्बती समुदाय उन्हें राजनीतिक नेतृत्व छोड़ने की इजाजत भला कैसे दे सकता है?

सवाल है कि दलाई लामा ने ऐसा वक्तव्य पिछले गुरुवार को ठीक 1959 के तिब्बती विद्रोह की सालगिरह के मौके पर दिया ही क्यों? क्या राजनीतिक नेतृत्व या अधिकार छोड़ने के पीछे भी तो कोई राजनीति नहीं? खुद दलाई लामा जिस मुद्दे पर आजीवन जी-जान से संबद्ध रहे हैं, उससे अलग होने की बात वो कर ही क्यों रहे हैं? खासकर तब, जबकि सारी दुनिया में चीन की लाख आलोचनाओं के बाद भी उन्हें अथाह सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती रही है, खुद मंगोल और तिब्बती शब्दों से बने ‘दलाई लामा’ शब्द का तात्पर्य ही सर्वोच्च ज्ञान से है – ऐसे में ये अलगाव की बात क्यों? डॉ. राममनोहर लोहिया हमेशा कहा करते थे ‘धर्म दीर्घकालिक राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म.’ महात्मा गांधी ने भी राजनीति और धर्म के रिश्तों को खुद अपने संदर्भ में व्यक्त करते हुए लिखा कि ‘मूलतः मैं धार्मिक व्यक्ति हूं लेकिन राजनीति ने सांप की तरह मुझे चारों ओर से घेर रखा है. और मैं इससे मुक्त नहीं हो सकता.’ इन परिप्रेक्ष्यों में जब दलाई लामा के वक्तव्य को विश्लेषित किया जाए तो तस्वीर थोड़ी साफ होती दिखती है.

दरअसल तिब्बती विद्रोह की इस सालगिरह के ठीक दो दिन पूर्व चीन सरकार का वो वक्तव्य चौंकाने वाला था कि नए दलाई लामा का अवतार या देहधारण तिब्बत में ही होना चाहिए. बीजिंग का नया निर्देश है कि भारत में रह रहे 14वें दलाई लामा के बाद 15वें दलाई लामा का जन्म चीन में ही हो और जिन्हें चीन सरकार की मान्यता भी प्राप्त हो. जाहिर है कि चीनी मंशा यही है कि मौजूदा दलाई लामा के बाद किसी चीनी वफादार को ही दलाई लामा का तमगा मिले. विश्लेषक तो मानते हैं कि चीन सरकार बुजुर्ग 14वें दलाई लामा के बाद तिब्बती कम्युनिस्ट पार्टी के किसी प्रतिबद्ध सदस्य के बेटे को ही दलाई लामा बनाना चाहेगी. और फिर बीजिंग का पश्चिमी सरकारों पर दबाव यह होगा कि वे उसे दलाई लामा की मान्यता दें, न कि भारत में लामाओं द्वारा निर्वाचित किसी लड़के को. चीन ने यह भी कहा है कि दलाई लामा को अपना उत्तराधिकारी चुनने का हक नहीं है. उन्हें धार्मिक परंपरा और अवतारवाद मानना होगा.

स्पष्ट है कि चीन नियोजित तरीके से किसी पसंदीदा को दलाई लामा बनाना चाहता है. वैसे भी चीन हमेशा से दलाई लामा की मध्यमार्गी, अहिंसक, नैतिक नीति को पृथकतावाद ही नहीं कहता रहा, बल्कि उनकी निंदा ‘तिब्बतियों का खून चूसने वाले धोखेबाज व्यक्ति’ के रूप में करता रहा है. इस बार भी दलाई लामा की नई घोषणा को बीजिंग ने उनकी ‘नई चाल’ ही कहा है. सच तो यही है कि चीन ने भले ही दलाई लामा की आलोचना की हो, लेकिन दलाई लामा जैसे तिब्बतियों के स्वीकार्यता व्यक्तित्व ने बीजिंग को लोकतांत्रिक तरीके से माकूल जवाब देने की कोशिश भी की है. सभी जानते हैं कि दलाई लामा की नैतिक शख्सियत का कोई विकल्प तिब्बतियों के बीच नहीं है और उनका धार्मिक और मूल्य आधारित महत्व आगे भी बने रहने वाला है. लेकिन अब उनकी शक्ति हस्तांतरण योजना निर्वासित तिब्बतियों की सरकार और संसद को और भी ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की पहल है. अब इस नई पहल से निर्वाचित प्रधानमंत्री, तिब्बतियों के चार्टर में संशोधन और प्रवासी तिब्बतियों की संसद के और भी लोकतांत्रिक होने की संभावना है. निश्चित रूप से यह तानाशाह और आक्रामक चीन को सशक्त लोकतांत्रिक जवाब उस धार्मिक-नैतिक ताकत के द्वारा है, जिसे चीन सिर्फ एक व्यक्ति मानकर अब तक खारिज करता रहा है और तिब्बत मुद्दे पर जब-तब वो दलाई लामा को ही लक्ष्य करके लांछित करता रहा है. लेकिन अब चीन के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा.

वैसे दलाई लामा ने 1960 में निर्वासित तिब्बतियों की संसद स्थापित कर दी थी. 2001 में तिब्बतियों ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का चुनाव भी किया. लेकिन अभी भी अनेक कार्यपालक अधिकार दलाई लामा में निहित हैं. उन्हें संसद को भंग करने और किसी भी आदेश को रद्द करने का अधिकार है. लेकिन अब दलाई लामा ने अपनी शक्ति या सत्ता के हस्तांतरण की पहल से तिब्बती आंदोलन को ज्यादा जनतांत्रिक बनाने का ही प्रयास किया है. हस्तांतरण की प्रक्रिया के बाद अब जब चीन से बाहर दुनिया भर में रह रहे डेढ़ लाख वयस्क तिब्बती अपना कालोन त्रिपा (निर्वासित तिब्बती सरकार का प्रधानमंत्री) चुनेंगे तो उसका आधार ज्यादा व्यापक होगा. उसके अधिकार और जवाबदेही भी ज्यादा होगी. जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री के चुनाव के लिए वैसे नाम तो अनेक चर्चा में हैं, लेकिन अंत में दो तरह के नामों के सामने आने की उम्मीद है. चीन द्वारा समर्थित और दूसरा व्यापक तिब्बती जनता द्वारा समर्थित.

दरअसल, दलाई लामा पूर्व में करमापा और पंचेन लामा मसले पर चीन की गतिविधियों की पुनरावृत्ति नहीं चाहते. 1995 में पंचेन लामा के रूप में जिस लड़के को दलाई लामा ने चुना था, उसे चीन ने नजरबंद करके दूसरे को पंचेन लामा बनाकर बैठा दिया था. और फिर जब इधर 2007 से चीन सरकार नए दलाई लामा के अवतारीकरण को लेकर खासतौर पर प्रयासरत रही है, ऐसे में इस पहल को षडयंत्र का जम्हूरी जवाब ही कहा जा सकता है. माना यह भी जा रहा है कि लोकतंत्रीकरण की इस सोच के पीछे भारत सरकार की रजामंदी भी शामिल है. जाहिर है कि इससे चीन सरकार की बौखलाहट बढ़ी है, भले ही इस निर्वासित सरकार को भारत समेत किसी भी देश की मान्यता न हो, लेकिन बीजिंग तिब्बत मसले पर लगातार चिंतित तो रहा ही है.

चीन समर्थक तबका पहले भी आरोप लगाता रहा है कि दलाई लामा प्रोपेगेंडा ज्यादा करते हैं कि वो निर्वाचित नेतृत्व को अपनी सरकार का काम सौंपना चाहते हैं. आरोप ये भी है कि यदि वो इतने ही धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक हैं तो उन्होंने इतने समय तक निर्वासित तिब्बतियों पर एकछत्र राजनीतिक सत्ता का प्रयोग क्यों किया? खुद वो तिब्बत में सामंती धार्मिक व्यवस्था क्यों लाना चाहते थे? एक ओर वे अहिंसक-नैतिक आंदोलन की बात करते हैं और साथ ही चीन से तिब्बत को हथियाने की हर तरह की योजनाएं क्‍यों बनाते रहे हैं? दरअसल ऐसे सवाल या आरोप उठ सकते हैं, लेकिन समझा जाना चाहिए कि दलाई लामा कोई पद या व्यवसाय नहीं है, जिसमें कोई रिटायर हो सके. इस भूमिका के पीछे तिब्बती लोगों का इतिहास, लोककथा और आध्यात्मिकता – सभी का समावेश है. उनकी पवित्रता, देवत्व और महत्व उनके भिक्षु रूप में और शिक्षक के रूप में हमेशा ही विद्यमान रहेगा. उनकी राजनीतिक जिम्मेदारियों के थोडे़ नेपथ्य में जाने के बाद भी तिब्बतियों की एकता-एकजुटता के प्रतीक तो दलाई लामा ही रहेंगे. और ऐसे समय जब दुनिया के अनेक देशों में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन चल रहे हों – खुद पहल करके तिब्बतियों को ज्यादा अधिकार देने और अपने ही अधिकारों के हस्तांतरण की बात से जहां उनका कद नैतिक धरातल पर और बढ़ा है, वहीं विरोधियों को माकूल जवाब भी मिला ही है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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