’गांधी’ में ही है रास्ता!

: अन्ना और सरकार के बढते द्वंद्व : अन्ना हजारे ने अपने हालिया बयान से जहां कांग्र्रेस को थोड़ा परेशान किया है, वहीं अनेक ऐसे लोगों को जो अन्ना के आंदोलन को पार्टी और सत्ता के सियासी जोड़तोड़ से अलग समाज में व्यापक राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का वाहक समझते थे, उन्हें निराशा हुई है. अन्ना ने कहा है कि यदि जनलोकपाल विधेयक संसद के शीत सत्र में पारित नहीं हुआ तो वो अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी का विरोध करेंगे. उनका मानना है कि चूंकि कांग्रेस पार्टी केंद्र की यूपीए सरकार की सबसे प्रभावी घटक है, इसलिए जनलोकपाल कानून के अमल में न आ पाने की जिम्मेदारी भी उसी पर है.

गांधी या जेपी नहीं हैं अन्ना!

गिरीशजीअन्ना हजारे-  महात्मा गांधी या जेपी नहीं हैं. लेकिन सच है कि उनके आंदोलन ने देश में ही नहीं, विदेशों में भी लोकतंत्र को लेकर बहस तेज कर दी है. इस माहौल में एक विचारक की ये पंक्तियां ताजी हो गई हैं कि – ‘लोकतंत्र एक ऐसा हैट है जिसे हर किसी ने लगाया है. यह हैट अब शेपलेस हो गया है और हालत यह है कि यह हर किसी के सिर में फिट हो जाता है.’  सरकार कह रही है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है. उसे निर्देशित या ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता. देश के सबसे बडे़ कानून संविधान ने उसे यह स्थिति प्रदान की है. उधर, अन्ना के साथ आंदोलित व्यापक तबका भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हुए देश को इस बीमारी से निजात दिलाना चाहता है.

46 साल बाद माफीनामा!

: ये कहानी सिर्फ पायलट कैस हुसैन और फरीदा सिंह की ही नहीं है, आम जज्बातों की अभिव्यक्ति भी है : पिछले दिनों पाकिस्तानी वायुसेना के पूर्व पायलट कैस हुसैन ने जब 46 साल के बाद उस हमले के शिकार पीडित परिवार की बेटी को पत्र लिखकर माफी मांगी जिस में गलती से भारतीय नागरिक विमान के पायलट समेत आठ लोग मारे गए थे, तो सभी चौंके थे. बात 1965 के सितंबर महीने की है. उस हादसे में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता, उनकी पत्नी, तीन सहायक, एक पत्रकार और दो पायलटों के साथ उड़ रहे भारतीय नागरिक विमान को पाकिस्तान ने सीमा के एकदम नजदीक इस गलतफहमी में मार गिराया था कि वो भारत का लडाकू हमलावर विमान है, जो पाकिस्तानी क्षेत्र में घुस रहा था.

नॉर्वे के कत्लेआम का जवाब – ‘गांधी’

गिरीश जी दुनिया में अपने शांत स्वभाव के लिए मशहूर नॉर्वे में जब पिछले सप्ताह 32 साल के एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक ने लेबर पार्टी की युवा शाखा के कार्यक्रम में बम विस्फोट और घातक हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी करके लगभग 90 लोगों को बेवजह दर्दनाक मौत दी, तो सभी हिल उठे. एक द्वीप पर डेढ घंटे तक चले इस तांडव को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को भी पहुंचने में देर हुई क्योंकि नॉर्वे में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ था और काफी हद तक ऐसे हादसों से अनजान नॉर्वे में खुद पुलिस को भी अनेक बार ऐसे हथियार लेकर चलने की इजाजत अब तक नहीं है. तब अटलांटिक पार बराक ओबामा से लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून तक सभी ने इसे इस्लामी आंतकवाद की नई वारदात मानते हुए बयान भी जारी कर दिए कि वे संकट की इस घड़ी में नॉर्वे के ‘संघर्ष’  में उसके साथ हैं.

मुंबई हो या कंदहार – आतंक का जवाब लोकतंत्र

गिरीश मिश्र : राजदूत बनते तो जान बच जाती : मुंबई 2008 में 26/11 के आतंकी हमले के बाद फिर से पिछली 13 जुलाई को धमाकों की शिकार हुई. 1993 के बाद पांचवीं बार हुई इस आतंकी वारदात में लगभग बीस लोग मारे गए और अनेक घायल हुए. पिछली दो-ढाई साल से शांत मुंबई में ऐसा लग रहा था कि अब आतंक को काबू में कर लिया गया है, लेकिन ऐसा न हो सका. इसके ठीक एक दिन पहले अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के छोटे भाई अहमद वली करजई की कंदहार में उनके विश्वस्त सुरक्षाकर्मी ने घर पर ही गोली मार कर हत्या कर दी. इसकी जिम्मेदारी तालिबान ने ली. वैसे तो हर आतंकी वारदात न जाने कितनों को बेसहारा छोड़ जाती है, संपत्ति की क्षति और दहशत के आलम के अलावा परिजनों-मित्रों और समाज के भावनात्मक रिश्तों पर जो गहरी चोट लगती है, उसकी भरपाई लंबे समय तक नहीं हो पाती.

ये न्यायिक सक्रियता के प्रमाण हैं या फिर दखलंदाजी

गिरीश जी: क्या कहती हैं नजीरें : ब्रिटेन में लोकतंत्र का हजार वर्षों का इतिहास है. वहां मानवाधिकारों को लेकर ‘मैग्नाकार्टा’ घोषणा पत्र 1215 में जारी हुआ था. 1688 में ‘ग्लोरियस रिवोल्यूशन’  हुआ, जिसे दुनिया रक्तहीन क्रांति के नाम से जानती है. फिर दुनिया में मध्यवर्गीय क्रांतियों के रूप में 1776 की अमेरिकी क्रांति और 1789 की फ्रांसीसी क्रांति का सूत्रपात हुआ. बाद में बीसवीं सदी में अनेक देशों में समाजवादी क्रांतियां भी हुईं. लेकिन हर आधुनिक व्यवस्था खुद को बेहतर लोकतांत्रिक साबित करने के लिए केंद्रित शक्ति की अवधारणा से हट कर माँटेस्क्यू द्वारा प्रतिपादित ‘शक्तियों के पृथक्करण’  को अपने-अपने ढंग से लागू करती रही.

भारतीय लोकतंत्र को आप की देन क्या है आडवाणीजी!

गिरीशजी: जम्हूरी संस्कार के पर्याय ‘नेहरू’ : भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पिछले दिनों यह लिखा कि कश्मीर समस्या भारतीय लोकतंत्र को नेहरू गांधी परिवार की देन है. आडवाणी ने अपने ब्‍लॉग में टिप्पणी की है कि  जवाहरलाल नेहरू में यह साहस ही नहीं था कि वो कश्मीर मसले को हल कर पाते. नेहरू और शेख अब्‍दुल्‍ला के चलते ही कश्मीर का मसला जिंदा रहा, वर्ना यह आजादी के दौरान ही हल हो गया होता, जब 561 रियासतों का भारत में विलय हुआ था. आडवाणी ने नेहरू गांधी परिवार की असफलता के संदर्भ में श्रीमती इंदिरा गांधी का भी जिक्र किया है कि 1971 के युद्ध में जब  लगभग एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों ने बांग्‍लादेश निर्माण के समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में समर्पण किया तब भी कश्मीर समस्या को भारत चाहता तो निपटाया जा सकता था, लेकिन तब भी चूक हुई.

लौटें अवाम की ओर!

गिरीशजी: हमेशा नैतिक जनशक्ति ही निर्णायक रही है-  गांधी का रास्ता भी यही है : क्या बर्मा की प्रख्यात लोकतांत्रिक गांधीवादी नेता और नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सूकी की तुलना भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल को लेकर आंदोलनरत अन्ना हजारे से की जा सकती है? जाहिर है यह सवाल चौकाता है. लेकिन इस पर विचार के पहले सूकी के बारे में इस खबर पर कृपया गौर करें कि सूकी ने बर्मा में लोकतंत्र लाने के लिए गांधी के अहिंसक रास्ते को छोड़ने तक की बात कही है. उन्होंने हिंसा की वकालत की है.

सवाल आधी आबादी के सम्मान का!

गिरीशजीहाल में महिलाओं की स्थिति को लेकर चौंकाता हुआ एक सर्वे प्रकाशित हुआ है, जिसमें बताया गया है कि अफगानिस्तान, कांगो, पाकिस्तान, भारत और सोमालिया में महिलाओं की हालत बहुत खराब है. इन देशों को महिलाओं के लिए खतरनाक भी बताया गया है. पहले स्थान पर अफगानिस्तान है, जहां 87 फीसदी महिलाएं निरक्षर हैं, और 80 फीसदी का विवाह जबरदस्ती कराया जाता है. 100 में से 11 की मौत प्रसवकाल के दौरान हो जाती है. दूसरे स्थान पर कांगो है, जहां हर साल चार लाख महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं. तीसरे पायदान पर पाकिस्तान है, यहां भी महिलाओं की स्थिति बहुत खराब है. यहां हर साल एक हजार को ‘ऑनर किलिंग’ का शिकार होना पड़ता है. सोमालिया में भी महिलाएं निरक्षरता और बलात्कार की शिकार हैं. वहां उनकी स्वास्थ्य सेवाओं में भी भारी कमी है.

क्या 9/11, 26/11 जैसा था पाक का 22/05!

गिरीशजीक्या अमेरिका के 9/11 और मुंबई के 26/11 की तरह ही पिछले हफ्ते पाकिस्तान के कराची में 22/05 का हमला था? यह सवाल पाकिस्तान और पश्चिमी दुनिया के अखबारों में इस समय प्रमुखता से उठ रहा है. वैसे पिछली दो मई को ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी सैनिकों द्वारा खोज कर मारे जाने के ठीक बीस दिनों बाद कराची के मेहरान स्थित नौसेना केंद्र पर हुए इस भीषण आतंकी हमले को दुनिया बहुत गंभीरता से ले रही है. हालांकि इसमें मरने वालों की संख्या सिर्फ 14 है, लेकिन इसे पाकिस्तान के इतिहास में अपने ढंग का ऐसा पहला हमला माना जा रहा है, जिसकी तुलना 9/11 और 26/11 से की जा रही है. अंतर सिर्फ यह है कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के 9/11 और मुंबई के 26/11 में जहां अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकियों ने आम नागरिकों को अपना निशाना बनाया था. वहीं 22/05 को तालिबानियों ने आम नागरिकों की जान लेने की जगह पाकिस्तान सरकार और उसके सबसे बडे़ सैन्य केंद्रों में से एक को नुकसान पहुंचाना चाहा है और करोड़ों अमेरिकी डॉलर यानी कि अरबों की सैन्य सम्पत्ति को क्षति पहुंचाई है.

इन चुनावी नतीजों के असल संकेत क्या हैं!

गिरीश मिश्रहाल के विधानसभाई चुनावों के नतीजों को क्या क्षेत्रीय-आंचलिक लोकतंत्र की मजबूती का संकेत माना जाए और यह समझा जाए कि 1967 में जो गैर कांग्रेसी सरकारें विभिन्न राज्यों में पहली बार प्रमुखता से सामने आईं थीं, उस प्रवृत्ति ने अब मजबूती से नई शक्ल अख्तियार कर ली है ? या फिर यह माना जाए कि राष्ट्रीय पार्टियों की जगह अब क्षेत्रीय अस्मिता नई सियासी शक्ल के रूप में सामने आ रही है. या फिर बडे दलों से लोगों का मोहभंग हो रहा है? मतदान का औसतन 80 फीसदी होना और कहीं 85 प्रतिशत तक इसका पहुंचना क्या यह नहीं बताता कि अब लोग कहीं ज्यादा जागरूक हैं और वे चुनाव जैसे लोकतांत्रिक पर्व में अपनी अहमियत बखूबी समझ रहे हैं.

‘बेबी लादेन’ हमजा को कौन हजम कर गया!

ओसामा बिन लादेन का 20 साल का बेटा हमजा लादेन गायब है. वो कहां गया, कुछ पता नहीं. पिछले दिनों जब एबटाबाद में आधी रात हेलिकाप्टरों में सवार अमेरिकी सैनिकों ने लादेन के ठिकानेवाली हवेली पर धावा बोला था, तो बताया गया कि लादेन और उसके बेटे हमजा की गोलीबारी में मौत हो गई थी. लेकिन बाद में पता चला कि लादेन के साथ उसके बेटे की मौत जरूर हुई लेकिन मरनेवाला हमजा नहीं था, बल्कि वो 22 वर्षीय खालिद लादेन था. खालिद भाई है हमजा का.

लादेन की हवेली ‘धरोहर’ बनेगी?

गिरीशजीअमेरिका ने सोचा था कि ओसामा बिन लादेन के शव को समुद्र में दफनाएंगे तो लादेन जैसे शीर्षस्थ आतंकी का कोई अवशेष नहीं बचेगा और उसकी कोई ऐसी मजार वगैरह नहीं बन पाएगी, जहां उससे सहानुभूति रखने वाले पहुंच सकेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. एबटाबाद की जिस हवेली में लादेन को मारा गया, अब उसे कौतूहलवश देखने के लिए ही भारी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं. इसमें पुरुष, महिला और बच्चे भी शामिल हैं. वैसे एबटाबाद पहले भी प्राकृतिक सुंदरता के चलते पयर्टक स्थल के रूप में मशहूर था. लेकिन अब उसके प्रति जिज्ञासा के और भी बढ़ने के आसार हैं. लादेन की सबसे छोटी पत्नी यमनी जो अंतिम समय उसके साथ थी ‘उसके द्वारा यह खुलासा होने पर कि लादेन पिछले पांच साल से वहीं रह रहा था’ अनेक मसले उठ गए हैं.

सीरिया के सवाल पर अमेरिका के खिलाफ भारत-पाक का सुर एक

गिरीशजी: अब मानवाधिकारों पर गोलबंदी : सीरिया में मानवाधिकार हनन के नाम पर नई अंतर्राष्‍ट्रीय गोलबंदी शुरु हो गई है. मुद्दा बताया जा रहा है आमजन के अधिकारों के हनन का, लेकिन पर्दे के पीछे सियासत कुछ और ही है! पश्चिमी खेमा अमेरिकी अगुवाई में दमिश्क के खिलाफ अंतर्राष्‍ट्रीय कार्रवाई के लिए लामबंद है, उसे लीबिया के घटनाक्रम से संतोष नहीं है. इसीलिए तो लीबिया के खिलाफ संयुक्त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद की कार्रवाई की तरह सीरिया के मसले में जब सुरक्षा परिषद में सफलता नहीं मिली तो फिर संयुक्त राष्‍ट्र मानवाधिकार परिषद में मामला उठाया गया. वहां सीरिया में राष्‍ट्रपति बशर अल असद की सरकार द्वारा मानवाधिकार हनन की निन्दा ही नहीं की गई, बल्कि परिषद ने जांच कराने का फैसला भी किया है.

अमेरिका-पाक के खराब होते रिश्ते!

गिरीश : भारत की आतंक की चेतावनी अब सच साबित हो रही : लंदन के ‘गार्जियन’  अखबार ने सरकारी अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद से अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्ते इतने खराब कभी नहीं रहे, जितने कि आज हैं. पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर की तल्खी को उद्धृत करते हुए लिखा गया है कि पाकिस्तान अब अमेरिका के इन आरोपों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के गुप्त रिश्ते अफगानिस्तान और कश्मीर के आतंकी गुटों और तालिबानियों से हैं. बशीर आईएसआई पर लगने वाले ‘डबल गेम’  खेलने का आरोप भी गलत बताते हैं. ऐसे ही बयान पाकिस्तान के गृह मंत्री रहमत मलिक ने भी दिए हैं कि अमेरिका की ओर से ‘ब्लेमगेम’  बंद होना चाहिए. और, अब तो दोनों देशों को आपसी रिश्ते फिर से नए सिरे से शुरू करने की जरूरत है.

अमेरिका फिरकापरस्ती पर उतरा!

गिरीशजीअमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट में विकिलीक्स का ताजा खुलासा प्रकाशित हुआ है कि सीरिया के राष्‍ट्रति बशर अल असद को कुर्सी से हटाने के लिए अमेरिका ने वहां असद विरोधी सशस्त्र प्रदर्शनकारियों को साठ लाख डालर की मदद की है. यही नहीं, लंदन में 2009 में एक नए टीवी चैनल ‘बराडा’ को भी शुरू कराने में मदद की, जो असद विरोधी खबरों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रसारित करे. वैसे तो ये सब राष्‍ट्रपति बुश के समय से जारी था, लेकिन इसे बराक ओबामा के समय भी जारी रखा गया. यहां दिलचस्प ये है कि एक ओर सीरिया में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों को वाशिंगटन मदद कर रहा है तो दूसरी ओर वह सीरिया से रिश्ते सुधारने का दिखावा भी कर रहा है.

रिकार्डतोड़ वोटिंग के संकेत क्या है?

गिरीशजीतमिलनाडु के मदुरई के तिरुमंगलम क्षेत्र की 78 साल की यसोदाई बुधवार को विधानसभाई चुनाव में वोट डालते समय चल बसीं. अस्वस्थ होने के बाद भी वोट देने की जिद थी. घर से 300 मीटर दूर पैदल चल कर वोट डालने बूथ पर गईं. ऊंगली पर वोट डालने का काला निशान भी लगा पर वोटिंग मशीन का बटन दबाने के पहले ही चल बसीं. वैसे तो चुनावों में ऐसे उम्रदराज बुजुर्ग वोट डालते ही हैं, लेकिन अस्वस्थता में भी वोट डालने की जिद और इस घटना को निम्न वास्तविकताओं के संदर्भ में देखा जाए तो बेहतर होगा.

लीबिया में हायतौबा, आइवरी कोस्ट और बहरीन पर खामोशी क्यों!

गिरीशजी: अरब जगत में अमेरिकी स्वार्थ : अरब जगत में बह रही लोकतंत्र, मानवाधिकार और आजादी की हवा के प्रति अमेरिका जैसी बडी ताकतों का रुख सिर्फ जैसे-तैसे अपने हितों को साधने का है या उन्हें वाकई जनता के जम्हूरी हकों को लेकर चिंता है? यह सवाल अहम इसलिए हो जाता है, क्योंकि पिछले दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने लीबिया में बमबारी रोकने के मोअम्मर गद्दाफी के अनुरोध पर साफ कहा कि अब गद्दाफी को तुरंत सत्ता ही नहीं छोड देनी चाहिए, बल्कि अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर निकल जाना चाहिए. हिलेरी का यह दिलचस्प बयान सिर्फ गद्दाफी के प्रति उनकी मंशा की ही अभिव्यक्ति नहीं है, यह बताता है कि पूरी अरब दुनिया में अमेरिकी अगुवाई में पश्चिमी खेमे का रुख सिर्फ अपने स्वार्थ पर निर्भर है, जिसमें लोकतंत्र, आजादी और मानवाधिकारों की बात तो सिर्फ ऊपरी मुलम्मे के तौर पर है.

आदिवासी और उनके संघर्ष : साजिशाना खामोशी!

गिरीशजी: जल-जंगल-जमीन संघर्ष को लोकतांत्रिक होना ही होगा : पिछले दिनों वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ’उग्र वामपंथञ पर दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्ठी हुई. देश के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों ने इसमें भाग लिया. चर्चा में अनेक मुद्दे बहस के विषय रहे. यहां उग्र वामपंथ से तात्पर्य नक्सलवाद से ही रहा और चिंता यही रही कि देश के 15 राज्यों के दो सौ जिलों में फैले नक्सली नेटवर्क की हिंसा बंद होनी चाहिए, और संघर्ष का रूप जम्हूरी होना चाहिए. लेकिन इस चिंता से ज्यादा नाराजगी का स्वर सरकारी हिंसा, आदिवासियों के भू-विस्थापन, उनके लगातार हो रहे शोषण पर ढुलमुल रवैये और शासन की उदासीनता, जल-जंगल-जमीन के लिए आंदोलनरत समाज की मांगों को अनसुना करके बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों और कारपोरेट तबकों को बढ़ावा देने पर था.

87 साल के बुजुर्ग ने दी पटकनी!

गिरीश जी: प. बंगाल, केरल में माकपा की चुनावी गणित के अंतर्द्वंद्व : वैसे तो किसी भी चुनाव से पहले सीटों को लेकर आपसी उखाड़-पछाड़ या फिर सहयोगी पार्टियों से तालमेल में सीटों की संख्या को लेकर विवाद होना आम बात है. विवाद, वार्ता, संतुलन, समन्वय, सहमति-ये सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शुमार हैं. लेकिन मजे का नजारा केरल और पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है और वो भी दर्शन, विचार, जनआकांक्षा और जनसंघर्ष की बात करने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी कि माकपा के अंदरूनी संघर्ष में. एक ओर पश्चिम बंगाल में अब तक मुख्यमंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य की अगुवाई में लेफ्ट सक्रिय हो गया है तो केरल में मुख्यमंत्री रहे वीएस अच्युतानंदन को चुनावी परिदृश्य से हटाने के लिए पिछले कई दिनों से जबरदस्त ड्रामा चलता रहा, लेकिन 87 साल का यह बुजुर्ग मैदान से हटने को तैयार नहीं है.

शक्ति हस्तांतरण और सियासी नेतृत्व से अवकाश के अर्थ क्या हैं?

गिरीशजी : दलाई लामा की नैतिक पहल : दलाई लामा सुर्खियों में हैं. लंदन के ‘गार्जियन’ अखबार में बारबरा ओब्रायन का लेख छपा है. शीर्षक है ‘दलाई लामा ने कदम पीछे खींचे हैं, लेकिन हटाए नहीं हैं.’ लेख उनका सियासी अवकाश लेने संबंधी उनके बयान के संदर्भ में है. दरअसल तिब्बती विद्रोह की 52वीं वर्षगांठ पर उन्होंने यह कहकर हलचल पैदा कर दी है कि अब निर्वासित तिब्बतियों के राजनीतिक नेतृत्व की व्यवस्था और भी ज्‍यादा लोकतांत्रिक होनी चाहिए और सत्ता या शक्ति का हस्तांतरण प्रवासी तिब्बतियों की संसद, प्रधानमंत्री और अन्य में होनी चाहिए. हालांकि दलाई लामा पहले भी ऐसी बातें कहते रहे हैं. पिछले सितंबर में भी 75 वर्षीय इस तिब्बती नेता ने जब ऐसा कहा था तो खुद तिब्बती समुदाय द्वारा ही विरोध हुआ था.

लोकतंत्र का ‘तांडव’

गिरीशजी: ट्यूनीशिया, मिस्र के बाद अब किसका नंबर : मध्य-पूर्व में लोकतंत्र की आंधी चल रही है. मिस्र और ट्यूनीशिया में सत्ता शिखर के दो टीले ढह चुके हैं, अन्य कई ढहने के कगार पर हैं. जनता उत्साह में है. वो हर हाल में आगे बढना चाहती है- उसे आजादी से कम कुछ भी स्वीकार नहीं. 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ अनेक समाजवादी देशों में भी ऐसी ही जम्हूरी हवा चली थी, जब देखते-देखते काफी कुछ बदल गया था. तब भी जनता इसी तरह खराब आर्थिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार-कुशासन-बेरोजगारी की मुखालिफत में और खुली-उदारवादी आजादी की मांग करते हुए सडकों पर उतर गई थी और सारे लौह आवरण छिन्न-भिन्न हो गए थे. सब कुछ ताश के पत्ते की तरह बिखर गया था. तब भी नया उभरता मध्य वर्ग बदहाल जनता का नेतृत्व कर रहा था और आज भी पश्चिमेशिया और उत्तरी अफ्रीका के अरब देशों में यही तबका नेतृत्वकारी भूमिका में है.

चिरंजीवी की करवट का असर!

गिरीश मिश्रक्या टॉलीवुड अभिनेता और 2008 में प्रजा राज्यम पार्टी (पीआरपी) स्थापित करने वाले चिरंजीवी के दलबल सहित कांग्रेस में शामिल होने से वाकई कांग्रेस को फायदा होने वाला है? क्या इससे आंध्र की राजनीति के गणित में कोई बदलाव होगा? कांग्रेस वाइएसआर के बेटे जगनमोहन रेड्डी को जवाब देने में सफल हो पाएगी? क्या 294 सदस्यीय विधानसभा में चिरंजीवी की पार्टी के महज 16 सदस्यों के सत्ता पक्ष के साथ आ जाने से किरण रेड्डी की सरकार को लाभ हो सकता है? या फिर इस सियासी समझौते में ज्यादा फायदा चिरंजीवी को ही होने वाला है, क्योंकि सिर्फ पिछले कुछ महीनों में ही उनकी पार्टी के 22 नेता उनका साथ छोड़ कर जा चुके हैं? सियासत में धार खो रहे चिरंजीवी ने 2009 में अपने जन्मदिन के मौके पर फिर से फिल्मों में लौटने की इच्छा क्या ऐसे ही व्यक्त कर दी थी? या फिर कांग्रेस से जुड़कर वो किसी बडे़ सियासी बदलाव के कारक भी हो सकते हैं?

होली-दिवाली जैसी क्यों नहीं मनती 26 जनवरी!

गिरीशजीआज 26 जनवरी है. हमारा 61वां गणतंत्र दिवस. लेकिन यह बात हमें ही नहीं, बहुतों को सालती होगी कि 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्‍ट्रीय दिवसों को होली-दिवाली-ईद की तरह क्यों नहीं मनाया जाता? इन राष्‍ट्रीय दिवसों को लोग उन त्यौहारों की तरह क्यों नहीं मनाते, जिनसे पूरा समाज और उसकी इकाई यानी कि हर व्यक्ति जुडता सा प्रतीत होता है? महीने भर पहले से जो उत्साह आम जनता के स्तर पर सामाजिक और सामुदायिक त्यौहारों के प्रति दिखता है वो पहल, लगाव, अपनत्व और जिजीविषा इन राष्‍ट्रीय दिवसों के प्रति क्यों नहीं? ऐसा क्यों है कि ये राष्‍ट्रीय दिवस 365 दिनों में बस एक दिन आकर चले जाते हैं? हम इनके साथ सामाजिक स्तर पर वैसा तादात्म्य क्यों नहीं स्थापित कर पाते, जैसा कि महाराष्‍ट्र में गणेशोत्सव, बिहार-उत्तर प्रदेश में सूर्य पूजा या छठ, मकर संक्रांति, पंजाब में लोहडी और दक्षिण में पोंगल के साथ रिश्तों की आम लेकिन सघन बुनावट देखने को मिलती है?

तेलंगाना कितना संभावित!

गिरीशजीतेलंगाना मुद्दे पर न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण समिति की लंबी-चौड़ी रिपोर्ट से आंध्र में आंदोलन की आग और भभक उठी है. इस विस्तृत रिपोर्ट में वैसे तो तेलंगाना को लेकर छह विकल्प सुझाए गए हैं और व्यापक संदर्भों में अनेक तुलनात्मक स्थितियों का जिक्र है, लेकिन आलोचकों का यही मानना है कि इसमें कुछ भी नया नहीं है. सिर्फ उन्हीं बातों को तेलंगाना, रायलसीमा, तटीय आंध्र और हैदराबाद के बारे में बतौर विकल्प उठाया गया है, जिन्हें लोग दशकों से बातचीत में उठाते रहे हैं. खुद समिति ने अपने छह विकल्पों या सुझावों में से शुरुआती चार को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि वे अव्यवहारिक हैं और शेष दो यानी विकल्प संख्या पांच और छह ऐसे हैं, जिन्हें व्‍यवहारिक माना गया है. इनमें से एक में आंध्र के बंटवारे और तेलंगाना के गठन की बात है तो दूसरे में संयुक्त आंध्र को कुछ क्षेत्रीय स्वायत्त समितियों के गठन के साथ स्वीकार किया गया है. लेकिन समिति का जोर अंतिम विकल्प यानी कि संयुक्त आंध्र के पक्ष में ही है. कुल मिलाकर स्थिति ढाक के तीन पात जैसी है.

24 सितंबर की आशंकाएं

गिरीश मिश्रा : 92 नहीं हो सकता 2010 : अयोध्या पर 24 सितंबर को आने वाले हाईकोर्ट के फैसले को लेकर भारी आशंकाएं हैं. प्रधानमंत्री से लेकर विभिन्न नेताओं, राजनीतिक पार्टियों, संस्थाओं की ओर से शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील की जा रही है. कुछ के द्वारा कहा जा रहा है कि वे अपना रुख फैसला आने के बाद तय करेंगे. लेकिन, कुल मिलाकर देखें तो किसी के द्वारा ऐसा संकेत नहीं है कि किसी भी रूप में 1992 जैसी स्थिति की पुनरावृत्ति हो सकती है, जब विवादित ढांचा गिरा था और दंगों की श्रृंखला-सी शुरू हो गई थी. निश्चित रूप से इन संकेतों का स्वागत ही होना चाहिए. वैसे भी लगता नहीं कि कोर्ट के फैसले को लेकर कोई आसमान टूटने वाला है. लेकिन, यहीं रुक कर ये भी सोचा जाना चाहिए कि क्या ये भूला जा सकता है कि आखिर छह दिसंबर 1992 के पहले भी तो सभी स्तरों पर ऐसे ही दावे किए गए थे.

कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं हमारी

गांधी जी: सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा : कल 15 अगस्त है. स्वतंत्रता दिवस. लम्बे संघर्ष के बाद तिरसठ साल पहले हासिल आजादी का यादगार दिन. उल्लास-जोश का पर्याय दिवस. हर साल जब यह दिन आता है तो अपने साथ भावनात्मक और जहनी स्तर पर ढेरों खुशियां भी लाता है. वैसे ये कहने की कम, महसूस करने की घड़ी ज्यादा होती है. याद आता है 1947 को इसी दिन की आधी रात, जब दुनिया सो रही थी और भारत आजादी की नई सुबह में जाग रहा था. जवाहरलाल नेहरू का वो ‘टिन्स्ट विद डेस्टिनी’ का ऐतिहासिक भाषण, जब लाल किले की प्राचीर से उठती इस आवाज को सारा देश  दम साधे सुन ही नहीं रहा था, गुन भी रहा था. आखिर जिस दिन का, जिस घड़ी का इंतजार था-उस जश्न को मनाने का मौका जो था. लेकिन उसी खुशी के आलम में दिल्ली से सैकड़ों मील दूर नोआखली के भयंकर सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका से अकेला, निहत्था निपटता और एक झोपड़ी में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे का शोक मनाता देश का इकलौता बुजुर्ग ‘महात्मा’ भी था, जो उस वक्त न खुल कर रो सकता था और न हंस सकता था.

पश्चिम के ऑक्टोपस और पूरब के तोते के पीछे

यूरोप में अब भी बड़ी जमात ऐसे लोगों की है, जो भारत को सपेरों और जादू-टोनों में यकीन करने वालों का देश कहते हैं, लेकिन जर्मनी के ऑक्टोपस बाबा पॉल की भविष्यवाणियों से जिस तरह पूरा यूरोप सराबोर है और अखबार तथा टीवी लगातार खेल के ज्योतिषीय नतीजों को जिस तरह परोसते जा रहे हैं, वो खुद में अनेक सवाल पैदा कर रहा है. सारा ज्ञान-विज्ञान, प्रगति के बढते ग्राफ, आधुनिकता-तार्किकता – सभी कुछ जैसे भावनात्मक उद्वेग में बहा चला जा रहा है, क्योंकि पॉल बाबा की अब तक की कई भविष्यवाणियां सच हो चुकी हैं और उन्होंने अब फुटबॉल में स्पेन के नंबर एक होने और नीदरलैंड्स के दूसरे स्थान पर आने का संकेत दे दिया है.

कीचड़ को कीचड़ से नहीं, साफ पानी से धोएं

गिरीश मिश्रनेहरू-गांधी परिवार के साथ दशकों से संबद्ध रहा क्षेत्र अमेठी सुर्खियों में है. वजह है अमेठी का नाम बदलकर अब छत्रपति शाहूजी महाराज नगर कर दिया गया है. आगामी चुनावों, खासकर कुछ समय बाद होने वाले विधानसभाई चुनावों के संदर्भ में मायावती सरकार का इसे बड़ा राजनीतिक कदम माना जा रहा है. मजे की बात तो ये है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी न तो इसका विरोध कर पा रही है, और न ही इसे पचा पा रही है. यह ठीक है कि दलितों और अन्य कमजोर तबकों के बीच प्रभाव विस्तार और उन्हें नया सियासी संदेश देने के लिए मायावती पहले भी समतावादी समाज में यकीन रखने वाले महापुरुषों के नाम पर जिलों और संस्थाओं का नामकरण करती रही हैं, लेकिन इस बार उनका निशाना कहीं ज्यादा गहरा है.

ऐसे चित्र मीडिया में कभी नहीं छपे

मर चुकी महिला से ये कैसा व्यवहार!: हममें-उनमें फर्क होना ही चाहिए : पिछली छह अप्रैल को दंतेवाड़ा के चिंतलनार में जब 76 सुरक्षाकर्मियों की नृशंस हत्या माओवादियों ने की थी, तो देशभर में इसकी जबरदस्त निन्दा हुई थी. यह घात लगाकर किया गया नियोजित हमला था. इस हमले में लगभग आधा दर्जन सुरक्षाकर्मी जिंदा बचे थे. उन्होंने बताया था कि किस क्रूर तरीके से नक्सलियों ने हत्याकांड को अंजाम दिया था, जिसमें कई घायल सुरक्षाकर्मियों के गले को रेतना भी शामिल था. कोई भी संवेदनशील व्यक्ति ऐसा सुन कर सिहर सकता था.