बिहार। विकसित राज्य। विकास प्रदेश। महिलाओं को आरक्षण। रोजाना विदेशी लोगों से मुख्यमंत्री की मुलाकात। ढेरों सारे सम्मान। कौन कह सकता है कि पंचायत चुनाव में गुंडई चल रही है। जी हां.. खुलेआम गुंडई। अभी बिहार के गांवों का माहौल गरम है। चाय, पान और पाउच की दुकान पर भीड़ बढ़ गई है। बक्सर जैसे इलाके में चर्चा है कि इस बार दुसधा को वोट नहीं देना है। ऐ बार चमरा के लइकवा के वोट दिआई। बड़ी जाति के लोगों का राज है। वे फिर से मलिकार बन गए हैं। उनके दरवाजे पर फिर से नथुनी दुसाध, मानरुप पासवान, अशोक चमार की भीड़ लगने लगी है। क्योंकि इनकी बीबीयां पंचायत चुनाव लड़ रही हैं। सबको चुनाव में सफलता चाहिए।
इसी कड़ी में मुजफ्फरपुर के पारु प्रखंड में समरस्तपुर गांव के रहने वाले एक इमानदार व्यक्ति जिला परिषद का चुनाव लड़ रहे हैं। नाम है दिनेश प्रसाद सिंह। बेचारे चौथेपन में हैं। समाजिक व्यक्ति हैं। कई मंदिर और स्कूलों में दान दे चुके हैं। गांव में अच्छा खासा नाम है। लेकिन परेशान हैं। परेशानी का सबब बन गए हैं एक सत्ताधारी दल के नेता। जो जुगाड़ से विधानपार्षद बन गए हैं। मुजफ्फरपुर के हैं। उनकी बीबी भाजपा की टिकट पर इस बार विधायक भी बन गई हैं। पहले जिला परिषद अध्यक्ष थीं। हालाकि यह लोग कभी जदयू के रहे नहीं। जब जदयू का वोल्टेज देखा तो इसमें तिकड़मबाजी से शामिल हो गए।
विधान पार्षद महोदय पारु प्रखंड के चुनाव को अपने ईगो का इश्यू बना चुके हैं। और उस इलाके के सबसे बड़े गुंड़े जिस पर विभिन्न थानों में 29 मामले दर्ज हैं। उसे चुनाव में इन्वाल्व करा चुके हैं। दीपक नाम के इस अपराधी पर हत्या, डकैती, लूटपाट, छिनैती और छेड़खानी के कई मामले भी हैं। दीपक की मां चुनाव में दिनेश सिंह के अपोजिट में खड़ी हैं। विधान पार्षद महोदय उसको सपोर्ट कर रहे हैं। इतना ही नहीं आचार संहिता को ताक पर रखकर मतदाताओं के घर में हैंडपाइप। शादी के लिए पैसा। दारू की भट्टी को फ्री कर दिया गया है।
अब बेचारे दिनेश सिंह परेशान हैं। अपने ही नाम वाले विधानपार्षद से। क्योंकि अपराधी चरित्र का दीपक लोगों को रात में धमकाता है। और दिन के उजाले में चोरी छिपे हैंडपाइप बांट रहा है। इतना ही नहीं। दिनेश सिंह मुजफ्फरपुर के मीडियावालों को फोन कर कहते हैं आपलोग क्यों नहीं कुछ करते हैं। पारू प्रखंड के उस गांव के लोगों से जब हमने बात की तो उनका जो कहना था काफी चौंकाने वाला था। सरमस्तपुर के एक 60 वर्षीय बुजुर्ग कहते हैं कि चुनाव कहां बबुआ… ई त सीधे धमकावता। ओकर कहनाम हई कि यदि हमर माई न जितलकई त हम त गांवें में आग लगा देब। अब रउये बताउ हमनी सब काहे वोट डाले जाइबसन।
सवाल है कि सुशासन में भी अपराध सुलझे हुए तरीके से हो रहा है। लालू जी के जमाने में अनसुलझे तरीके से होता था। हल्ला ज्यादा मचता था। उपर से दाद में खुजली की तरह दो साले थे। वैसे लोग कहते हैं कि लालू जी नीतीश जी से ज्यादा जमीन से जुड़े हुए नेता हैं। लालू जी के जमाने की एक घटना बड़ी प्रसिद्ध है। हुआ यूं कि लालू जी के करीबी रहे एक डाक्टर साहब की कार चोरी हो गई। बेचारे डाक्टर साहब का सीएम हाउस में आना-जाना था। एक दिन पहुंच गए लालू जी के आवास पर। वहां उन्होंने देखा कि लालू जी के आवास के कैंपस के पास में उनकी चोरी गई कार खड़ी है। और उस पर छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे हैं। वे लालू जी से बोले कि सर देखिए न मेरी करवा चोरी हो गई जो आपके कैंपस में खड़ी है। लालू जी ने कहा जरा गुटखा-उटखा खाने का दो चार लाख दे दीजिए और ले जाइए अपन ई करवा।
अब कार या बाइक चोरी होने पर कहीं खड़ी नहीं मिलती है। लोग सुशासन में शिक्षित हो गए हैं दस मिनट में बाइक को खोलकर जेनरेटर बना लेते हैं। और कार भेज देते हैं नेपाल। क्राइम उस समय भी होता था। लेकिन सवाल यह उठता है कि पंचायत चुनाव पर हम कैसे विश्वास करें। आखिर यह पूरा प्रशासनिक अमला जो है चुनाव कराने में लगा है। और दूसरी ओर एक अपराधी खुलेआम अपने पक्ष में वोट डालने की अपील कर रहा है। श्री कृष्ण बोले..हे धर्मराज। एक बार स्टेटस्मैन के एडिटर इन चीफ सीआर ईरानी ने मंगलवार के दिन अपने अखबार में एक कैविएट लिखा। उसका हेडिंग बनाया। सेंटर सोनिया सरराउंडिंग साइकोफंट्स। बड़ा पापुलर हुआ था। जबकि उस समय सभी कांग्रेसी उनके गुण गा रहे थे। इतना ही नहीं उनकी चापलूसी की तो हद हो गई थी। लेकिन सच कहने वाले ने कह ही दिया। हे तात.. इसी प्रकार इस पंचायत चुनाव का सच कहने की हिम्मत बिहार की मीडिया में अभी नहीं आया है। क्योंकि सब भिड़े हुए हैं दुहने में !
लेखक आशुतोष कुमार पांडेय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

