बचपन की कुछ बातें याद हैं मुझे / याद है मेरी मां का आशाओं से भरा वो चेहरा
सपनों से भरी वो आंखें / जिसमें उन्होंने कितनी उम्मीदों को पाला था
रातों को जाग-जागकर / मां का वो शांत सा चेहरा।
याद है मुझे / मेरे लिए देर तक खाने पर इन्तजार करना
और अपने हिस्से की मिठाई मुझे दे देना / मेरे लिए मंदिरों में जाकर देवी-देवीताओं से मन्नतें मांगना
लेकिन मेरी मां शायद ये नहीं जानती / कि इस युग में जहां हर चीज दौलत कि तराजू में तौली जाती हो
बड़े-बड़े चढ़ावे वालों की मन्नतें पूरी होती हों / वहां तेरी ये पवित्र मन्नतें
किसी भारी चढ़ावे के नीचे दबकर दम तोड़ देंगी।
मां को बचपन से देखता आ रहा हूं। लेकिन न जाने क्यों ऐसा लगता है कि मां वैसी की वैसी है जैसे मेरे स्कूल के दिनों में थी। स्कूल, कालेज तो बहुत पीछे छूट गया है। तब से लेकर अब तक ढेरों चीज जो इंसान बने रहने के लिए जरूरी है रोज किसी न किसी मोड़ पर छूटता ही जा रहा है। वक्त भाग रहा है। मां का शरीर बीमारियों का घर बन चुका है बावजूद इसके लगता है मां को कुछ नहीं हुआ है। अपने एक हाथ में मेरे स्कूल का बैग पकड़े और दूसरे हाथ में मेरा हाथ थामें चलती हुई मां जैसे मेरे साथ आज भी चल रही है। हालाकि अब वो मेरा हाथ थामे चलती हैं। लेकिन सच पूछिए तो ऐसा लगता है कि वो मुझे आज भी चलना सीखा रही हैं जीवन के राहों पर। मां वो एहसास है जो पल भर के लिए जुदा नहीं होती। हमेशा अपनी मौजूदगी का एहसास कराते हुए हमें जिदंगी भर चलने का रास्ता दिखाती है। जब वो होती है और जब वो इस दुनिया में नहीं होती।
इस बात का एहसास मेरे उन दोस्तों को खूब होगा जिनकी मां उनके साथ नहीं है। और खुलकर न सही अक्सर जिनकी पलकें मां की याद में भीग जाती है। गुजरे वक्त को लौटा लाना मेरे बस में नहीं है और न ही मैं ये कर सकता हूं। लेकिन अगर मैं ऐसा कर सकता तो मैं जरूर अपने बचपन के वो दिन लौटा लाता जो मैंने मां के साथ गुजारे हैं। हां मैं लौटा लाता वो सारे दिन जब मैं अपनी मां की नजरों से इस दुनिया को देखता था और यही दुनिया बहुत खुबसूरत जीने के लायक नजर आती थी और आज जब अपनी नजर ने देखता हूं तो अक्सर गहरी निराशा मेरे उम्मीदों पर हावी होती नजर आती है। अब आप समझ गए होंगे कि मेरे लिए मां का होना कितना जरूरी है। सुनता हूं दुवाओं में असर होता है सो इतना चाहता हूं कि आप मेरी मां की लम्बी उम्र की दुआ करें और मैं आपके मां के लिए। हम सारे लोग इतना तो जरूर कर सकते हैं वक्त से तेज भागती इस जिदंगी में थोड़ा सा वक्त निकालकर.
लेखक भास्कर गुहा नियोगी वाराणसी के निवासी हैं तथा हिन्दी दैनिक युनाइटेड भारत से जुड़े हुए हैं.

