जिस तरह से एकजुट होकर किसान भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं उसे देख कर तो यही लगता है कि जल्द ही अगर इस कानून में बदलाव नहीं लाया गया और किसानो के हितों की और अनदेखी की गई तो आगे चल कर निश्चित रूप इसके दुष्परिणाम किसान विद्रोह के रूप में हमारे सामने आयेंगे. अधिग्रहण को ले कर उत्तर प्रदेश के भट्टा-परसौल के किसानो के आंदोलन की यादे अभी धुंधली भी नहीं पड़ी हैं कि मध्यप्रदेश के छिंदवाडा जिले के चौरई ब्लाक के चौसरा, भुलामोहगांव, हिवरखेडी, धनौरा, डागावानी, पिपरिया तथा टेकाथावरी आदि गांव के किसान भी इसी राह पर निकल पड़े हैं.
मध्यप्रदेश विद्युत मंडल द्वारा इनकी जमीनों का अधिग्रहण थर्मल पॉवर बनाने के नाम पर आज से लगभग 20 वर्ष पूर्व किया गया था. मुआवजे के तौर पर प्रति एकड़ डेढ़ से दस हजार रुपए, प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने के साथ-साथ जिस भाव पर बिजली बनेगी उसी भाव पर छिन्दवाडा के लोगो को बिजली प्रदान करने की बात कही गई थी. किन्तु मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल द्वारा न तो थर्मल पॉवर बनाया गया और न ही विस्थापित परिवार के किसी व्यक्ति को नौकरी दी गई. बल्कि मध्यप्रदेश सरकार ने किसानो से अधिग्रहित की गई भूमि को उनके पुर्नवास एवं पुनः स्थापन की समस्या के निदान के बिना ही 10 लाख रूपये एकड़ के हिसाब से अदानी पेच पॉवर लिमिटेड के पक्ष में हस्तानान्तरित कर दी. जब गांववालों को इस बात का पता चला तो उनका आक्रोशित होना स्वाभाविक ही है.
खास कर उस स्थिति में जब ये किसान आज भी अपनी भूमि पर काबिज हैं और लगभग बीस सालों से बेरोकटोक शांतिपूर्वक खेती कर रहे हैं और उनके जीवीकोपार्जन का एकमात्र साधन वही भूमि है। इन किसानो का कहना है कि उनकी जमीनों का अधिग्रहण थर्मल पावर प्लांट बनाने के लिए किया गया था और जब वह नहीं बना तो उनकी जमीनें लौटा दी जानी चाहिए थी न कि किसी अन्य प्राइवेट कंपनी को बेच दी जानी थी. इसके आलावा भी इस परियोजना का विरोध करने के कई वाजिब कारण इन गांववालों के पास हैं. उनका कहना है कि छिन्द्वारा जिले में पीने के पानी की अत्यधिक कमी है जिसकी वजह से कई गांव को हफ्ते में सिर्फ एक दिन ही पीने का पानी मिल पाता है. उनके लिए तो पेंच नदी ही जीवनदायनी है. पर इस नदी के ऊपर बनाये गये बाँध के पानी से जो बिजली बनती है वह सम्पूर्ण बिजली और पानी महाराष्ट्र और नागपुर को दे दिया जाता है. छिन्द्वारा जिले के नागरिको को इससे न तो बिजली मिलती है और न ही पानी.
अब इसी नदी पर पेंच डायवर्सन परियोजना के नाम से दूसरा बांध बनाया जा रहा है.जिसके फलस्वरूप ३१ गांव के डूब क्षेत्र में जाने की आशंका है. बाँध बनाते वक्त किसानो से यह कहा गया था कि खेतों में सिंचाई के लिए पानी इस बांध के जरिये मिलेगा पर अदानी पेंच पावर लिमिटेड की प्रोजेक्ट रिपोर्ट देखने से साफ़ पता चलता है कि इस बाँध का सम्पूर्ण पानी भी किसानो को न देकर बिजली बनाने के लिए इसी कंपनी को दिया जायेगा. इस योजना से जहाँ छिंदवाडा जिले की सबसे उपजाऊ भूमि डूब में जा रही है वही सरकार द्वारा इन किसानो के पुनर्वास के लिए जिन गांव को चुना गया है वह पहले से ही डूब क्षेत्र के गांव हैं. दूसरे सरकार द्वारा इतना कम मुआवजा दिया गया था कि ये लोग उससे कही अन्यत्र खेती के लिए जमीन नहीं खरीद पाए और वर्तमान में उनके पास पैसा भी नहीं है फिर जिस उद्देश्य के लिए उन्होंने अपनी जमीनें म.प्र. विधुत मंडल को दी थी वह तो पूरा नहीं ही हुआ बल्कि उनकी जमीनें अदानी पेंच पावर लिमिटेड को देने के कारण उनसे उनकी खेती की जमीन और सिंचाई का पानी दोनो ही छीने जा रहें है. फिर जिस तरह से पर्यावरण मंत्रालय से इजाजत मिले बिना ही इस कंपनी ने अपना काम शुरू कर दिया है वह इसी बात को दर्शाता है कि हमारे देश में सारे नियम-कानून सिर्फ गरीब, कमजोर और असहाय लोगों पर ही लागू होते हैं.
अदानी पेंच जैसी कंपनी के मालिकों को नियम-कानून तोड़ने की न सिर्फ छूट दी जाती है बल्कि शासन-प्रशासन और हमारी सरकारों की मौन स्वीकृति भी इन्हें हासिल होती है. और यह स्थिति तब और भी गंभीर हो जाती है जब कोई व्यक्ति इन किसानों की मदद के लिए आगे आता है तो उसे हतोत्साहित करने और रास्ते से हटाने के लिए तरह-तरह के हथकंडो को भी अपनाया जाता है. ऐसे ही हादसा किसान संघर्ष समिति के संस्थापक अध्यक्ष और मुलताई के पूर्व विधायक डॉ सुनीलम के साथ भी तब हुआ जब वे भूलामोहगांव में इन किसानों की एक बैठक को सम्बोधित कर लौट रहे थे. किसानो के आंदोलन की गति को कम करने के उद्देश्य से अदानी पावर प्रोजेक्ट पेंच व्यपवर्तन के गुंडों द्वारा रास्ते में न सिर्फ डा सुनीलम पर लाठी व फरसे से हमला किया गया बल्कि उन्हें जान से मारने की भी कोशिश की गई. जिस समय घटना घट रही थी उसी समय घटना की सूचना एस.पी छिंदवाडा को उनकी साथी एडवोकेट अराधना भार्गव द्वारा दी गई थी जो उस समय घटनास्थल पर उनके साथ ही मौजूद थीं. पर पूरी घटना की सूचना मिलने के बाद भी पूरे डेढ़ घंटे तक पुलिस वहाँ नहीं पहुंची. और हमलावरों का नाम बताने के बावजूद भी न तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया और न ही सही धाराओ में मुकद्दमा पंजीकृत किया गया.
ऐसी स्थिति सिर्फ यहीं की हो ऐसा नहीं है. भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी मामलो में ऐसे तमाम उदहारण मिल जायेंगे जिसमे विकास के नाम पर ऐसा ताना-बाना बुना जाता है जिससे किसानो के हितों की न सिर्फ अनदेखी होती है बल्कि उनके द्वारा इसका विरोध करने पर तमाम फर्जी धाराओं में मुकद्दमा पंजीकृत कर इन्हें किसान से अपराधी घोषित कर दिया जाता है. ऐसे में इन किसानो के पास आन्दोलन और अपनी ही सरकार के खिलाफ विद्रोह के अलावा कोई और रास्ता बचता है क्या …. जिससे उनकी वाजिब बातो को सुना जाये.
नूतन ठाकुर की रिपोर्ट

