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समाज-सरोकार

अन्‍ना और रामदेव को ललकारने वाली सत्‍ता जनता को भूल गई है

आशीष वशिष्‍ठ भ्रष्टाचार और कालेधन के विरूद्व जो मुहिम अन्ना और रामदेव ने छेड़ी है वो फिलहाल तो किसी मुकाम पर पहुंचती नजर नहीं आ रही है, लेकिन अनशन, आंदोलन और जनविरोध ने केन्द्र सरकार का ब्लड प्रेशर और तनाव जरूर बढ़ा रखा है। अभी शुरुआती मामला है क्योंकि जो विचार या मुद्दा एक बार उठता है वो कभी न कभी अपनी मंजिल तक पहुंच भी जरूर जाता है। अभी तक सरकार सभी मुद्दों और मसलों पर सरकार सांप की भांति कुंडली मारकर चुपचाप बैठी हुई थी। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार, काले धन की वापसी और लोकपाल बिल रूपी सांप को सरकारी बांबी से बाहर निकालने के जैसे ही बीन बजाई बरसों-बरस से नींद की बेहोशी में मस्त सरकारी अमला और उनके आका हरकत में आ गए। जंतर मंतर पर अन्न्ना के अनशन को हलके में लेने वाली सरकार और उसके नुमांइदों को 24 घंटे के भीतर ही अपनी औकात समझ में आ गई थी।

आशीष वशिष्‍ठ भ्रष्टाचार और कालेधन के विरूद्व जो मुहिम अन्ना और रामदेव ने छेड़ी है वो फिलहाल तो किसी मुकाम पर पहुंचती नजर नहीं आ रही है, लेकिन अनशन, आंदोलन और जनविरोध ने केन्द्र सरकार का ब्लड प्रेशर और तनाव जरूर बढ़ा रखा है। अभी शुरुआती मामला है क्योंकि जो विचार या मुद्दा एक बार उठता है वो कभी न कभी अपनी मंजिल तक पहुंच भी जरूर जाता है। अभी तक सरकार सभी मुद्दों और मसलों पर सरकार सांप की भांति कुंडली मारकर चुपचाप बैठी हुई थी। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार, काले धन की वापसी और लोकपाल बिल रूपी सांप को सरकारी बांबी से बाहर निकालने के जैसे ही बीन बजाई बरसों-बरस से नींद की बेहोशी में मस्त सरकारी अमला और उनके आका हरकत में आ गए। जंतर मंतर पर अन्न्ना के अनशन को हलके में लेने वाली सरकार और उसके नुमांइदों को 24 घंटे के भीतर ही अपनी औकात समझ में आ गई थी।

भारी जनदबाव व कारपोरेट लाबी के प्रेशर के चलते, चूंकि उस समय आईपीएल सीजन चल रहा था,  अन्ना के अनशन के कारण आईपीएल की टीआरपी में गिरावट को देखते हुए कारपोरेट लॉबी ने सरकार पर दबाव बनवा कर आनन-फानन में लोकपाल बिल की मसौदा समिति में सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को शामिल कर अपनी जान छुड़ाने की कोशिश की थी। लेकिन सरकार और सिविल सोसायटी की दो महीनों में नौ बैठकों के बाद भी दोनों पक्षों में कुल मिलाकर छह बिंदुओं पर मतभेद बने हुए हैं। सरकार के अड़ियल रूख के चलते अन्ना ने 16 अगस्त को एक बार फिर अनशन का ऐलान किया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने धमकी भरे लहजे में अन्ना को ये चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने दुबारा अनशन किया तो उनका हाल रामदेव की तरह होगा, हां बयान देने के बाद ही अपनी पुरानी आदत के चलते दिग्गी राजा अपने बयान से पलट गए,  लेकिन उन्होंने जो कहना था वो तो कह दिया,  अब अगर अन्ना समझदार हों तो समझ जाए नहीं तो उन्हें सत्ता से टकराने का अंजाम भुगतना होगा।

क्योंकि जो सरकार रामलीला मैदान में अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर लाठी चलवा सकती है वो कल अपनी जान फंसती देख अनशन पर बैठे किसी समाजसेवी को गोली मरवा दे तो कोई बड़ी बात नही होगी। जिस तरह कांग्रेस पार्टी के सीनियर नेता और महासचिव दिग्विजय सिंह समाजसेवी अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के खिलाफ अपमानजनक, असंसदीय और धमकीभरे अंदाज में बयानबाजी और चेतावनी सारे देश की जनता और मीडिया के सामने दे रहे है उससे सरकार की नीति और नीयत उजागर हो जाती है अर्थात सरकार का साफ संदेश है कि जो सत्ता से टकराएगा सत्ता उससे पीस कर रख देगी,  चाहे उसके समक्ष गांधीवादी अन्ना हजारे हो या फिर कालेधन की वापसी की मांग करता कोई योगगुरु। संदेश खुला और स्पष्ट है अब अन्ना अगर न समझे तो वो उनकी गलती।

असलियत यह है कि कांग्रेस पार्टी ने बरसों बरस बड़े आराम से जनता को बेवकूफ बनाकर इस देश पर राज किया है। आज कांग्रेस थोड़ी अपाहिज व असहाय है क्योंकि उसे मजबूरीवश गठबंधन की सरकार का संचालन और नेतृत्व करना पड़ रहा है। गठबंधन धर्म और विभिन्न राजनीतिक दलों व विचारधाराओं की सरकार होने के नाते अकेली कांग्रेस मनमर्जी के मुताबिक हाथ-पैर फैला नहीं पा रही है, ऐसे में अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को एक छत के नीचे बनाए रखने के लिए भी कई बार उसे बेमन ऐसे निर्णय लेने पड़ जाते है,  जिनसे सिंद्वाततः उनकी पार्टी की विचारधारा मेल नहीं खाती है। अगर केंद्र में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार होती तो कांग्रेस अन्ना को सिर ही उठाने का कोई मौका न देती। चूंकि कांग्रेस इस सच्चाई से वाकिफ है कि केंद्र में किसी एक दल के लिए पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना आज की तारीख में दिवास्वपन से अधिक नहीं है,  ऐसे में वो बिना कोई पंगा लिए सत्ता का सुख भोग रही है। इस देश पर लगभग 55 वर्ष कांग्रेस पार्टी का राज रहा है,  जिसमें से कई दशकों तक कांग्रेस ने अकेले अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार का सुख भी भोगा। अगर आज हमारे सिस्टम में कोई गड़बड़ी या परेशानी है तो उसका सीधा ठीकरा कांग्रेस के सिर ही फोड़ा जाएगा आखिरकार जिस दल ने सबसे अधिक सत्ता सुख भोगा है,  वो भला किस मुंह से किसी ओर पर आरोप लगा सकता है।

संविधान के निर्माण से लेकर लोकपाल बिल इस देश में मौजूदा समय में जितने भी कानून या नियम है,  उनमें से 95 प्रतिशत से अधिक कांग्रेस के राज में बनाए गए हैं। सिस्टम की गड़बड़ी, वोट बैंक और जात-पात की राजनीति, भाई-भतीजावाद के चलते देश में भ्रष्टाचार आज चरमसीमा पर है,  ऐसे में अगर कोई समाजसेवी या संत उठकर सरकार और सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाता है जिसे भारी जनसमर्थन भी प्राप्त है,  सरकार ऐसे में उस शख्स की आवाज को अनसुना करने की कोशिश करे तों फिर उस व्यक्ति के पास अनशन, प्रदर्शन और आंदोलन के अलावा अन्य कोई दूसरा अहिंसक रास्ता शेष नहीं बचता है,  लेकिन सरकार को ये भी बर्दाश्‍त नहीं है। सरकारी अमले को ये कदापि बर्दाश्‍त नही है कि देश के आम आदमी की भीड़ में से कोई अन्न्ना हजारे या रामदेव उठकर सीधा उनके सिंहासन की ओर उंगुली उठाए। क्योंकि इस देश में आम आदमी की कीमत केवल एक वोट से अधिक नहीं है और एकबार वोट डालने के बाद पीछे मुड़कर देखने, सवाल पूछने की इजाजत उसे उस देश के कर्ताधर्ता और तथाकथित माईबाप नहीं देते हैं।

आज आजादी के 64 सालों के बाद भी देश का किसान, मजदूर और गरीब गुलामी की जिंदगी बसर कर रहा है। अमीर और अमीर और गरीब और गरीब होते जा रहे हैं। देश के आम आदमी की सोच नाली, सड़क, लाइट, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं से आगे नहीं बढ़ पाई है। देश्‍ा के लाखों बच्चे या तो स्कूल ही नहीं जाते हैं,  और अगर हांक कर उन्हें स्कूल भेजा भी जाता है टीचर नदारद मिलते हैं। ऐसे में अगर कोई आदमी देश के आम आदमी का प्रतिनिधि बनकर हक और हकूक की बात करता है और सरकार को बताता है कि विदेशों में जमा लाखों-करोड़ों कालाधन अगर देश में वापिस आ जाएगा तो देश के गरीब, मजदूर और किसानों का भला होगा, कोई इस देश में भूखा नहीं सोएगा, कोई इलाज के अभाव में मरेगा नहीं और हर हाथ को काम मिलेगा तो इसमें आखिरकर बुराई ही क्या है? लेकिन सरकार और हमारे तथाकथित नेता मुख्य मुद्दे पर ध्यान न देकर सवाल करने वाले को ही घेरने, बदनाम करने और उसके चरित्र को दागदार करने की कवायद में सारी एनर्जी फूंक देते है। असलियत यह है कि शेर की खाल में हजारों भेड़िये इस देश को लूट-लूट कर खा रहे हैं और हम और आप सबकुछ जानने के बाद भी अपाहिज बने हुए हैं। क्योंकि इस देश का आम आदमी भी इस तथ्य से वाकिफ है के इस देश में जो भी सिद्धांत, सच्चाई, ईमानदारी और सिस्टम को बदलने की बात करेगा उसे सत्ता से टकराने का अंजाम भुगतना ही होगा। आज अन्ना जिस तरह खुले आम कह रहे हैं कि सरकार अगर गोली भी चलाए तो उनका अनशन जारी रहेगा,  ऐसी हिम्मत विरलों में होती है। जनपक्ष की बात सोचना एक बात है और उसे अमल में लाना दूसरी। आज अन्ना दूसरी बात पर अमल कर रहे हैं अर्थात सत्ता को चुनौती दे रहे हैं।

गुण और दोष इस धरती पर जीवन यापन करने वाले प्रत्येक जीव में जन्मजात व्याप्त होते हैं,  लेकिन हमें सदा सकारत्मक विचारधारा और गुणों की ओर ही ध्यान देना चाहिए। अन्ना और रामदेव ने जो भी मुद्दे उठाए है वो सिंद्वाततः सही हैं। अन्ना का भूतकाल और रामदेव का वर्तमान अगर हम कुछ समय के लिए भुला दें तो इन महानुभावों ने आखिरकर क्या गुनाह किया है। इनका गुनाह यही है कि वो देश की जनता को सुखी देखना चाहते हैं और चाहते है कि देश की व्यवस्था चुस्त-दुरूस्त, पारदर्शी, निष्पक्ष, ईमानदार और सत्य की राह पर चलने वाली हो। अगर केंद्र सरकार ये सोचती है कि वो रामलीला मैदान में डंडे चलवाकर या फिर अन्ना को धमकी देकर इस देश के आम आदमी की आवाज को दबा सकती है तो वो उसकी भूल है क्योंकि मुद्दा वहीं रहता है नेता चाहे बदल जाएं,  अगर अन्ना और रामदेव में कोई बुराई है तो उसका फैसला जनता करेगी,  क्योंकि देश की जनता ने उन्हें अपना नेता और मुखिया माना न कि केंद्र सरकार या फिर किसी राजनीतिक दल ने। वैसे भी लोकतंत्र में सारे फैसले लोक को ही करने होते हैं। आज सत्ता के नशे मे जो सरकार चूर है कल उसे भी जनता के दरबार में हाजिरी लगानी है। और अगर सरकार सोचती है कि देश की जनता और उसके दो नुमांइदे एक अदने से दिग्विजय सिंह की धमकियों से डर जाएंगे तो ये उसकी गलतफहमी है और जितनी जल्दी सरकार इस गलतफहमी या खुशफहमी को दूर कर लेगी,  उतना उसके स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार तथा लखनऊ के निवासी हैं.

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