Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

मेरी भी सुनो

यादें चार चवन्नी की!

पैसे की अहमियत बच्चे पैदा होते ही समझने लगते हैं। मेरी बचपन की शुरुआत भी 5 और 10 पैसे से हुई थी। उस समय 5-10 पैसे में ही कमपटें आ जाया करती थी। धीरे-धीरे समय बदला और वहीं कमपटें आधुनिक समय की टॉफी बन गयी जो 25 पैसे में आया करती थी। लेकिन उस 25 पैसे को बचपन से ही चवन्नी कहना सिखाया गया था। जैसे-जैसे महंगाई बढ़ी 5-10 पैसे ने बाजार में अपना दम तोड़ दिया। अब बाजार में केवल चवन्नी को पहचाना जाता था। दिन भर के काम खत्म कर जब पिताजी घर आते तो मैं उनसे चवन्नी मांगा करता था। उनके पूछने पर ”क्या लोगे?”  तो मेरे मुंह से एक ही जबाव निकलता था ”टॉफी”  वो चुपचाप से एक चवन्नी निकालकर मेरे हाथ में थमा देते।

पैसे की अहमियत बच्चे पैदा होते ही समझने लगते हैं। मेरी बचपन की शुरुआत भी 5 और 10 पैसे से हुई थी। उस समय 5-10 पैसे में ही कमपटें आ जाया करती थी। धीरे-धीरे समय बदला और वहीं कमपटें आधुनिक समय की टॉफी बन गयी जो 25 पैसे में आया करती थी। लेकिन उस 25 पैसे को बचपन से ही चवन्नी कहना सिखाया गया था। जैसे-जैसे महंगाई बढ़ी 5-10 पैसे ने बाजार में अपना दम तोड़ दिया। अब बाजार में केवल चवन्नी को पहचाना जाता था। दिन भर के काम खत्म कर जब पिताजी घर आते तो मैं उनसे चवन्नी मांगा करता था। उनके पूछने पर ”क्या लोगे?”  तो मेरे मुंह से एक ही जबाव निकलता था ”टॉफी”  वो चुपचाप से एक चवन्नी निकालकर मेरे हाथ में थमा देते।

ऐसे ही, मां को जब अपना कोई काम करवाना होता था तो वो कहती-  ”बेटा जाओं ऐसा काम कर दो मैं तुम्हें चवन्नी दूंगी।”  उस चवन्नी की लालच में सारे घरेलू काम भी कर दिया करता था। बूढ़ी दादी भी अपनी चारपाई पर लेटी-लेटी अपने काम बताती रहती थी और जब न करों, तो उसी चवन्नी का लालच फिर से सामने आ जाया करता था। चवन्नी के नाम से मुंह में पानी आ जाया करता था। चवन्नी से चार टॉफियां जो खरीदी जा सकती थी। लालच चवन्नी का फिर कैसे न होता। टॉफी की मिठास घोल देती थी, चवन्नी। घर से स्कूल जाओं तो मां से चवन्नी ही मिलती थी। उस चवन्नी से स्कूल के बाहर बैठे बूढ़े बाबा के चन्ने खाया करता था और साथ में उनके पास रखी एक कपड़े की बनी चिड़िया का खेल भी देखा करता था। इतना ही नहीं बुढ़ा बाबा साथ में गाना भी सुनाता था।

उस चवन्नी से न जाने कितने काम किये जाते थे। उस समय तक हमारी दुनिया उसी चवन्नी तक ही सीमित थी। अगर घर में बड़ी बहन को एक चवन्नी कोई/कहीं से ज्यादा मिल जाए तो मेरा तो तन-बदन सुलग उठता था। फिर घर में महाभारत छिड़ जाती थी। ऐसी थी उस चवन्नी की कहानी। पर अब चवन्नी की कोई कीमत नहीं। चवन्नी अब बाजारों में नहीं दिखेगी। यह अब सरकारी संग्रहालयों में नजर आने वाली पुरातत्व वस्तु बन गयी है। इसमें एक इतिहास समाया हुआ है। वो नारा भी अब नहीं लगाया जाएगा ”चार चवन्नी चांदी की जय बोलो माता रानी की”  जो नवदुर्गा आते ही शुरू हो जाया करता था। नवदुर्गों में सवा रुपये का प्रसाद, सवा रुपये की पंड़ित जी को दक्षिणा और न जाने क्या-क्या बदल जाएगा?  रुपये में सवा का हिसाब-किताब अब खत्म हो चुकेगा। यह बात सुनने में बड़ी ही दुखदयी लगती है। पर यही सही है। महंगाई ने न जाने कितनी इकन्नी, दुआन्नी, पंजू, दसू, बीस्सू और चवन्नियों को इतिहास में शुमार कर दिया है। देश की अर्थ व्यवस्था में शुमार मुद्रा का एक चैथाई भाग भी अब मुद्रा दर बढ़ने से खत्म हो गया है।

महंगाई इस कदर बड़ी है कि न केवल समान खरीदने में लोगों को जेबे खाली करनी पड़ रही है बल्कि अब तो अपने बचपन की यादों को भी समेटना मुश्किल पड़ रहा है। मेरी तरह और न जाने कितनों के बचपन की कहानी इस चवन्नी से जुड़ी होगी। कई किस्से हैं जो चवन्नी पर निर्भर करते थे। पर आज वो किस्से इतिहास बन चुके है। रिजर्व बैंक के आदेशानुसार 30 जून से चवन्नी के चलन को बंद कर किया गया। सरकारी भाषा में कहें तो 25, 20, 10 और 5 पैसे के सिक्के लीगल टेंडर नहीं रह गये हैं। चवन्नी के गायब होते ही जो चीजें यादों में सिमट कर रह गयी हैं। 15 अगस्त 1950 से सिक्कों का भारतीय बाजार में प्रचलन शुरू हुआ।

एक आना मतलब छह पैसे हुआ करता था। इस लिहाज से 25 पैसे को चार आना या चवन्नी कहते थे। एक रुपए का मतलब 16 आना हुआ करता था। 1957 में दशमलव पद्धति के आने के बाद आना को समाप्त कर एक रुपए को 16 आने के बजाय 100 पैसे के समतुल्य माना गया। 1963 में तीन पैसे के सिक्के की शुरुआत हुई, 1968 में 20 पैसे का सिक्का प्रचलन में आया। महंगाई के बढ़ने के साथ ही 1970 में एक, दो और तीन पैसे के सिक्कों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 1982 में एशियाड के वक्त दो रुपए का सिक्का बाजार में उतारा गया। 1992 में चवन्नी से थोड़ा बड़ा पांच रुपए का सिक्का चलन में लाया गया। वहीं 2006 में 10 रुपए का सिक्का जारी किया गया। और आगे न जाने कितने सिक्के महंगाई की बलि चढ़ेंगे? आज चवन्नी ने अपनी मीठी यादें छोड़ी हैं कल अठन्नी और फिर एक रुपये भी अपनी चमक छोड़ देगा। अगर कुछ रह जायेगा तो वो है सिर्फ यादें।

लेखक जितेन्द्र कुमार नामदेव गाजियाबाद में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...